(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि – 14 जुलाई 1974
माता पिता नाम – श्री हरेन्द्र सिंह नेगी
श्रीमती सरस्वती देवी
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – गौं गड़कोट, नारायणबगड़, चमोली, परगना बधाण, पट्टी पिण्डरवार
शिक्षा –
आधारिक – अपर स्कूल गड़कोट
मिडल /हाई स्कूल जूनियर स्कूल गड़कोट / राइका नारायणबगड़
उच्च शिक्षा – हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्याालय, श्रीनगर गढ़वाल
आजीविका – सरकारी सेवा
सम्प्रति – अध्यापन
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
प्रीतम – इंटर कालेज के हिन्दी प्रवक्ता स्व. श्री बुद्धि बल्लभ थपलियाल गुरुजी ने साहित्यिक रुझान दिया। गांव की चांचड़ी चौंफुलौं ने लोक साहित्य की ओर भेजा जबकि नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गीतों ने गंभीरता से गढ़वाली भाषा का मार्ग दिखाया।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
प्रीतम – रटी तो थी….लाठी लेकर भालू आया, पर समझ से पढ़ी थी….यदि होता किन्नरनरेश मैं, सिर पर मुकुट चमकता।
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार – यह बता पाना मुश्किल है क्योंकि अध्ययन बहुत किया। पहली कविता शायद “बुग्याल” पत्रिका में छपी श्री कैलाश बहुखण्डी ‘जीवन’ जी की थी।
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
प्रीतम – कविता और गीतों के संकलन हैं:
चकोर
उमर बुण्दि जा
प्रीतम सतसई
गीतूं की बरात मा
गढ़वाली गद्य हैं: यकुलांस (उपन्यास)
गढ़वाल की पृष्ठभूमि पर हिन्दी में ‘गांव के बयान’
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
प्रीतम -हिन्दी काव्य हैं : ध्वनियों के शिखर
मेरी रचना (बाल विग्यान कविता)
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
प्रीतम – गढ़वाली में लेखन (म्यसाना) तो 1988 से शुरू किया था पर वे सब काचे गगराणे थे। उनमें से कई रचनाएं बनाते ही फेंक दी जाती।
आकाशवाणी से जुड़ने पर जब श्री चन्द्र सिंह राही, गोपाल बाबू गोस्वामी, हीरा सिंह राणा, राम रतन काला, केशव अनुरागी, जैसे धुरन्धरों की रचनाएं सुनी तो अपना लिखा हुआ कूड़ा लगने लगा।
पूरन पंत पथिक जी ने “गढ़वाळै धै” अखबार, और मदन मोहन डुकलान जी ने “चिट्ठी पत्री” भेजनी शुरू की तो गढ़वाली साहित्य का विस्तार मिलता चला गया। इन दोनों संपादकों ने कुछ रचनाओं में सुधार किया तो अपनी समझ बढ़ती गयी।
इस बीच कानों में पर्वतों का सबसे स्नेहिल स्वर पड़ा ‘नरेन्द्र सिंह नेगी’ जी का। उनके शब्द चयन और भाव संगुंफन ने निश्चित ही मोहित किया और गढ़वाली भाषा को गंभीरता से सीखने समझने के लिए बाध्य कर दिया।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
प्रीतम – हिन्दी की “कामायनी” और “उर्वशी”। ये दोनों काव्य साहित्य, जीवन, मानवपन, ऐन्द्रीय से अतीन्द्रिय अनुभव प्रदान करते हैं। जीवन के भविष्य का दिशाबोध भी इनमें समाहित है।
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
प्रीतम – महाकवि कन्हैया लाल डंडरियाल जी रचित (नेगी जी द्वारा गाए गये उसके कुछ ही पद हैं) कालजयी रचना ‘दादू मि परवतूं को वासी’। इसलिए कि यह रचना संसार के समस्त पर्वतवासियों का परिचय है। हमारी मातृभाषा में होने के कारण गढ़वालियों के लिए सहज ग्राह्य है पर इसका भाव समस्त पर्वतों पर एक समान महसूस होता है।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
प्रीतम – प्रकृति, समाज, व्यवस्था, मानव मन, भावनाएं और दुख।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
प्रीतम – इसे तो कोई तीसरा पाठक ही बता सकता है पर इतना अवश्य है कि मैंने संस्कृति को विकृत नहीं होने दिया है। रचनाओं में व्यक्तिगत नामों से भी मैं बचकर लिखता हूं।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
प्रीतम – जी, कुछेक हैं
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
प्रीतम – नई कविता प्रयोगधर्मी है। छंदमुक्त और कभी कभी सपाटबयानी जैसी, परन्तु इसके विषय विचारणीय हैं। यदि इसमें कवि जटिलता का मोह छोड़ दें, आसानी से समझने योग्य बना दें, तो नई कविता भी साहित्य को समृद्ध ही करेगी।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
प्रीतम – निश्चित ही, कोशिश रहती है कि उसका गढ़वालीपन बना रहे। एक उदाहरण देना चाहूंगा…..
समळुणु छौ त्वेकू मि ब्याळि रात भर
आज अनासुर्त फोन मा तेरी रील दिखे, हे तेरी रील दिखे
.
अंछरि सी नचणी छयी डांडा बाटा मा
हिरणि सी हिटणी छयी घास माटा मा
फुलु का बीच फूल सी तु दिप्प कनी रै
वीड्यो मा तु डाळा बोटूं टक्क ह्यनी रै
फेसबुक्या बांद छोरी आज फोन मा तेरी रील दिखे….।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
प्रीतम – सच कहूं तो अचणचक्क होती है। कोई बात, कोई घटना, कोई खबर जब भी ‘क्लिक’ करती है तो रचना का फ्रेम मिल जाता है। हां, रचना पूरी होने में कभी समय भी लग जाता है। बारामास के फूलों का गीत रचने में दो साल लगे हैं।
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
प्रीतम – पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों में ‘हिमवन्तवासी’ (मन्याडर), ‘सिंह’ (सिंहनाद), ‘कंकाल’ (फुर घिंदुड़ी), भीष्म कुकरेती (छठों भै कठैत), अबोध जी (भूम्याळ), डंडरियाल जी (चांठौं का घ्वीड़), महेश तिवाड़ी (गंगा माई), नरेन्द्र सिंह नेगी (बाळा स्ये जा दी) आदि कई आदरणीय हैं। जबकि नई पीढ़ी में मदन डुकलान, गिरीश सुन्द्रियाल, आशीष, हरीश जुयाल, धर्मेन्द्र नेगी, कमल रावत, गणी भाई, ओम बधाणी, ओम प्रकाश सेमवाळ, जगदम्बा चमोला, उमेश चमोला, मुरली दीवान, नवीन ‘बादल’, गजेन्द्र नौटियाल, प्रीतम भरतवाण, जैसे बहुत रचनाकार हैं। बहुत ही महिलाएं भी गढ़वाली में सतुत्य कार्य कर रही हैं। स्व वीणापाणि जोशी, बीना बेंजवाल, रिद्धि भट्ट, प्रेमलता सजवाण, उपासना, आदि कई बहनें निरन्तर और विचारणीय लिख रही हैं। कान्ता घिल्डियाल का अनुवाद कार्य और धाद के शान्ति जिज्ञासु जी के प्रयास अभिनन्दनीय हैं। बहुत सारे रचनाकारों का नाम अभी स्मरण नहीं हो पा रहा है। मैं सभी से कुछ न कुछ सीखने का प्रयास करता हूं।
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
प्रीतम – आत्मरंजन और लोकरंजन
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
प्रीतम – कुछ हद तक। नेत्रसिंह असवाल और देवेन्द्र जोशी की कविताएं कमाल की हैं परन्तु वे समाज तक पूरी शिद्दत से नहीं पहुचीं। सच यह भी है कि समाज को उद्वेलित करने वाली रचनाओं से कवि परहेज कर रहे हैं। इसके अलग कारण हैं। मंचों से भी ऐसी रचनाएं पढ़ी नहीं जाती।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
प्रीतम – बहुत बार। भाव के अनुरूप शब्द ही ढूंढने में रह जाता हूं। कई बार तो शब्द का सटीक अर्थ जानने के लिए रचना ही स्थगित हो जाती है।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
प्रीतम – समय साक्ष्य देहरादून को दे देता हूं, या कुछ को सोसियल मीडिया के हवाले कर देता हूं।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
प्रीतम – उत्तराखण्ड की भाषाओं का एक गीत एससीईआरटी के लिए लिखा है, बस।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
प्रीतम – नहीं।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
प्रीतम – इस मामले में बहुत आलसी हूं, कुछ नहीं करता। करना आता भी नहीं है।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
प्रीतम – अभी तक तो ना के बराबर पर अब एक रूपरेखा बनाई है। इसमें ढंग के वीडियो बनाकर भेजूंगा। जल्द ही आप तक भी लिंक भेजूंगा।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
प्रीतम – नहीं।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
प्रीतम – नहीं
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
प्रीतम – हां, होने को तो है, पर अभी सुप्तावस्था में है। शीघ्र ही इसका कायाकल्प होगा।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
प्रीतम – अभी तक नहीं।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
प्रीतम – लोक साहित्य के सभी तत्व जैसे सामूहिकता, सरलता, सहजता, भाषा, लोकप्रज्ञा आदि।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
प्रीतम – जो आपको थिरका दे, भाव प्रवण कर दे, फिर पाठक चाहे हंसता रहे, रोता रहे, नाचता रहे या गंभीर होकर सोचता रहे।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
प्रीतम – कभी कभी
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
प्रीतम – व्यवस्थागत प्रश्न है। विस्तार से अभी नहीं बता सकता।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
प्रीतम – बच्चों के साथ मिलकर गाते बांचते हैं। यह बात जरूर है कि गढ़वाली रचनाओं के बजाय अपनी कुमांउनी रचनाओं को ही प्रयोग कर सकता हूं क्योंकि मैं कुमायूं में कार्यरत हूं।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
प्रीतम – और सार्थक रचनाएं जिन्हें गढ़वाली भाषा की पहचान के तौर पर स्वीकारा जाए।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
प्रीतम – कोई सांगठनिक व्यवस्था नहीं है। सारे प्रकाशन व्यक्तिगत प्रयास ही हैं। गढ़वाली प्रकाशन ट्रस्ट जैसी कोई संस्था होनी चाहिए।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
प्रीतम – ग्रामीण पुस्तकालयों की स्थापना, प्रत्येक शैक्षिक संस्था में लोक साहित्य कार्नर बनना चाहिए।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
प्रीतम – अध्ययन करें, शब्दों का मिजाज, सटीकता, भाव सामर्थ्य आदि का ध्यान रखें। रचना में लोकतत्वों का समावेश बनाए रखें।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
प्रीतम – कहानी, उपन्यास व निबंध
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
प्रीतम – स्वागत है
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
प्रीतम – मैं ऐसी हायार्की के बारे में नहीं सोचता। स्थान के लिए नहीं लिख सकता हूं। लिखना ही मेरे लिए अभीष्ट है।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
नहीं जानता। मैं तो ‘अपछ्यांण’ ठैरा।