उत्तराखंड परिपेक्ष में कंडाळी /सिशुना/ बिच्छू घास की सब्जी ,औषधीय व अन्य उपयोग और इतिहास
आलेख : भीष्म कुकरेती
Botanical Name-Urtica ardens
Common Name- Himalayan Nettle
उत्तराखंडी नाम – कंडाळी /कनाली ,सिशुना
नेपाली नाम – सिशुना
हिंदी नाम – बिच्छू घास
हिंदी नाम – बिच्छू घास
रहन सहन – पाकिस्तान से नेपाल व चीन की हिमालयी क्षेत्र में पाये जाना वाला पौधा है । 1000 से 4500 मीटर की ऊंचाई पर 1 . 5 मीटर ऊंचा पौधा। इसके तने पर झीस /स्पाइक्स होते हैं।
कंडाळी में केरोटीन (विटामिन A ), विटामिन C, प्रोटीन, खनिज बहुतायत से पाया जाता है।
–
–
कंडाळी की सूखी हरी सब्जी
कंडाळी को केवल जाड़ों में खाया जाता है।
कंडाली के कोमल डंठल -पत्तियों को काट कर लाया जाता है। कपड़े की सहायता बिच्छू घास को पकड़कर से जलती आग में घुसाकर एकदम से निकाला जाता है जिससे झीस जल जायं।
फिर कंडाली की हरी सब्जी वैसे ही बनायी जाती है जैसे पालक / राइ की सब्जी बनाई जाती है।
–
कंडाळी का कपिलू /फाणु याने तरीदार सब्जी
किन्तु बिच्छू घास का उत्तराखंड करी /तरीदार साग के रूप में अधिक उपयोग होता है।
पहले बिच्छू घास की हरी सब्जी जैसे तेल में हींग के साथ भूना जाता है फिर उसमे चार पांच घंटे भीगे झंगोरा /चावल /गहथ को पीसकर बने पेस्ट को मिलाया जाता है। गरम मसाले व अन्य मसालों को मिलाकर पानी के साथ पकाया जाता है।
–
कंडाळी की चाय
कंडाळी के धुले पत्तों को पानी में उबालिये और जितनी स्ट्रांग चाय चाहिए उत्तना उबालिये। चीनी मिलाइये। यदि बहुत ठंड है तो गुड़ मिलाइये और कुछ देर उबालें। फिर कप में छानकर डालें व कुछ बूंदें अपने स्वाद अनुसार नीम्बू निचोड़ें और गरमागरम पी लीजिय।
–
सुक्सा बनाने की विधि
कोमल पत्तों को डंठल के साथ पहले दो रात सूखने दें फिर दो तीन दिन सूखने दें। सूखी पत्तियों को पॉलीथिन बैग में भर लें।
–
कंडाळी पेस्ट प्रिजर्वेसन
आजकल कंडाळी का मिक्सर ग्राइंडर में पेस्ट बना दिया जाता है और जार में रखकर डीप फ्रीजर के सेफ कैबिन में रख देते हैं और जब चाहें कंडाळी उपयोग करते हैं।
अन्य उपयोग
बिच्छू घास से रेशे मिलते हैं रस्सियां भी बनाई जाती हैं।
बिच्छू घास का औषधीय उपयोग भी है।