(भीष्म कुकरेती से लिखाभेंट)
लघु परिचय
नाम – बलबीर सिंह राणा अडिग
माता पिता – माता स्व. श्रीमती लीली देवी राणा, पिता स्व. श्री कलम सिंह राणा
जन्म तिथि – 25 फरवरी 1976
आजीविका – भारतीय थल सेना से सेवानिवृत एंव वर्तमान एन.सी.सी. प्रशिक्षक
कहानी संख्या प्रकाशित (इंटरनेट माध्यम सहित) – 125 से अधिक, गढ़वळि व हिन्दी मिलाकर
कहानी संग्रह प्रकाशित – गढ़वळि कहानी संग्रह ‘विदै अर हौरि कहानियां’
प्रकाशाधीन – एक हिन्दी कहानी संग्रह, गढ़वळि – एक लोक कथा, एक लघु कथा और एक कथा संग्रह ।
भीष्म कुकरेती: लेखन की शुरुआत और प्रेरणा
बलबीर: लेखन की शुरुआत स्कूल समय से है और प्रथम प्रेरणा मेरे पिताजी (लोक आशु कवि) एवं मेरे प्राईमरी के गुरुजी श्री विश्वेश्वर दत्त गौड जी जिन्हाने पहली कविता पढ़ने पर पुरस्कृत किया था।
भीष्म कुकरेती: आपने लिखना कब और कैसे शुरू किया? क्या कोई खास घटना थी जिसने आपको प्रेरित किया?
बलबीर: लेखन की शुरुवात उपरोक्त बता दी है व लेखन के लिए खास घटना ये थी विद्याालय पाठ्यक्रम में जब मैं कवियों और कहानीकारों का जीवन परिचय पढ़ता था तो मन में ये विचार आता कि ये कौन लोग होते होंगे ? क्या ऐसा मैं भी लिख सकता हूँ ? यही सवाल कक्षा सात में अपने गुरुजी पुंडीर से किया, गुरुजी का जबाब था कि हाँ बेटा आप भी किताबों में छप सकते हो लेकिन इसके लिए अच्छी पढ़ायी करनी होगी, खूब साहित्य पढ़ना होगा व ज्ञान अर्जन करना होगा। तब गुरुजी के सहयोग से कादम्बनी में एक छोटी हिन्दी बाल कविता छपी थी।
भीष्म कुकरेती: आपकी कहानियों के मुख्य विषय (जैसे ग्रामीण जीवन, सामाजिक मुद्दे) कहाँ से आते हैं?
बलबीर: गुरुजी कहानियों के विषय हमारा लोक संसार, सैन्य जीवन, व सामायिक सामाजिक मुद्दे जो बीता गया व चल रहा है। लेकिन काफी लोक कथाओं को मैने लिपिबद्ध किया है जो पुस्तक रूप में आना बाकी है।
भीष्म कुकरेती: आपके पसंदीदा लेखक कौन हैं और उन्होंने आपको कैसे प्रभावित किया ?
बलबीर: हिन्दी कहानीकारों में मुंशी प्रेम चन्द, महादेवी बर्मा, गढ़वळि में मोहन लाल नेगी व रूसी कहानीकार लियो टॅल्स्टॉय की कहानियों से ज्यादा प्रभावित हुआ हूँ।
भीष्म कुकरेती: लेखन प्रक्रिया और शैली क्या है?
बलबीर: गुरुजी लेखन प्रक्रिया में कविताएं तो कम समय में बन जाती है लेकिन कहानियों के काफी समय व एंकात चाहिए होता है। कहानी शैलियों में चित्रात्मक, भावात्मक, आत्मकथात्मक व विवरणात्मक शैली को ज्यादा रखने की कोशिस करता हूँ फिर भी सुधी पाठक ही मेरी कहानियों की शैली का सही आंकलन कर बता सकते हैं।
भीष्म कुकरेती: आप अपनी कहानियों के लिए रिसर्च कैसे करते हैं?
बलबीर: गुरुजी रिसर्च की आवश्यकता ज्यादा नही होती है, भोगा अतीत व चल रहा वर्तमान ही विषय व भाव देता है हाँ विषय व पात्र की गहराई से परख जरूरी हो जाता है और इस क्रम में लेखन में कई रिटेक लग जाते हैं। यर्थात विषय, पात्र, व चित्रण एक कहानीकार की कल्पना से मजबूत होता है तो यर्थात रखना ही लिखना पहली शर्त मानता हूँ।
भीष्म कुकरेती: आपकी लेखन प्रक्रिया क्या है ? क्या आप योजना बनाते हैं या लिखते हुए सोचते हैं?
बलबीर: योजना तो नही बनाता लेकिन जैसे विषय मन में बैठा जाता नोट पर अंकित कर देता हूँ, अनुकूल समय मिलने पर लिखना सुरू करता हूँ, पर अक्सर कहानी का तयसुदा समय में पूरा होना संभव नही होता।
भीष्म कुकरेती: आपकी लेखन शैली (जैसे यथार्थवादी, व्यंग्यात्मक) कैसे विकसित हुई?
बलबीर: गुरुजी सैनिक चरित्र और सही अवलोकन से जो बन पता उसे उकेरता हूँ।
भीष्म कुकरेती: कथाकार के रूप में चुनौतियाँ ?
बलबीर: गृहस्थ में रहते हुए नोट पेड पर अंकित कहानी का समय पर पूरा होना।
भीष्म कुकरेती: एक लेखक के रूप में आपको किन सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
बलबीर: जीजीविषा। लेखन स्कूली समय से था, फिर नौकरी मिली 24 घंटे अति चुस्त दुरस्त व व्यस्त संस्था भारतीय सेना, वो भी गढ़वाल राइफल्स जैसी मार्शल रेजीमेन्ट। नैतिक डियूटी पूरी करने के बाद स्वयं के आराम के समय को खपा कर लिखता था। हाँ अब सेवानिवृत के बाद यदा कदा पसंदिदा समय निकाल लेता हूँ, लेकिन अंर्तजाल सुपर सौनिक की रफ्तार के साथ समय का टोटा जैसा सभी को लगता है वैसे मुझे भी।
भीष्म कुकरेती: क्या आपको कभी लगता है कि आपकी कहानियों की गलत व्याख्या की गई है?
बलबीर: वर्तमान में गढ़वाळि पाठक हि नि छन त व्याख्या क्या होण, पर जति बि समिक्षा साहित्यकारों बिटे ऐनी सु मिथैं बाटू बताण वळा रन्दन।
भीष्म कुकरेती: आप अपनी कला में सच्चाई और कल्पना को कैसे संतुलित करते हैं?
बलबीर: गुरुजी मैं कोई बड़ा कहानीकार नहीं हूँ ना इी हार्रर या जासूसी कहानीकारों के जैसे महाकल्पनाशील। मैं यर्थात पर ही भरोसा करता हूँ इसलिए कहानी लिखने में अनियोचित कल्पना को सार्थक नहीं समझता हूँ।
भीष्म कुकरेती: कैरियर और जीवन ?
बलबीर: दोनों मस्त, संतोष जनक व अन्तरात्मा से खुद के लिए खुद पहले प्रेरक बनू कि जीवन अनचाहे मैं भी रोंग साइड ना चले।
भीष्म कुकरेती: क्या आपकी पत्नी/परिवार का आपके काम पर कोई प्रभाव रहा है?
बलबीर: जी बिल्कुल रहा। पती पत्नी साईकिल के दो पहिए बाराबर चलना बराबर घिसना उसी के हिस्से का समय कागजों पर उतरता है। फिर पतिाजी ठेठ ग्रामिण व लोक आशु कवि थे, बड़ा बेटा खुद लेखक कवि और फिल्म मेकर है तो परिवार में पढ़ने व लिखने का सकारात्मक माहोल बना रहता है।
भीष्म कुकरेती: आप अपने जीवन और काम के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं? आप सफलता और पहचान को कैसे देखते हैं युवा लेखकों के लिए सलाह ?
बलबीर: गुरुजी संतुलन बनता नहीं बनाना होता है, जीवन में संयम और लक्ष्य है तो सब संभव हो जाता है। सत कर्मों का फल ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता व पहचान, वसरते वह एक छोटे से समाजिक दायरे तक क्यों न हो। असली सफल व्यक्ति वो है जो अपने कर्म व जीवन से संतुष्ट है। लेकिन संतुष्टी वो भी अनुशासित संतुष्टी।
भीष्म कुकरेती: युवा व नए लेखकों को आप क्या सलाह देंगे जो अपनी पहचान बनाना चाहते हैं?
बलबीर: जिस प्रकार एक अच्छे वक्ता बनने के लिए एक अच्छा सुनने वाला होना जरूरी होता है वैसे ही एक अच्छे साकित्यकार के लिए अच्छा अध्यनकर्ता होना पहली शर्त है। फिर लोगों की प्रतिक्रीय बगैर सतत सृजन, अपने ध्येय पर अडिग रहना। वर्तमान प्रचार प्रसार को इग्नौर ना करें, डिजीटल प्लेटफार्म पर सक्रीयता वर्तमान की जरूरत है। राइट वे राइट अचीवमेन्ट।
भीष्म कुकरेती: क्या आपको लगता है कि आज के दौर में कहानी कहने का तरीका बदल रहा?
बलबीर: गुरुजी हर क्षेत्र में सामयिक बदलाव हो रहा है तो कहानियों में भी होना नीतिपरक है, सभी संसारिक रीति नीति बदल रही हैं तो कहानी कहने का तरिका क्यों ना बदले।