(भीष्म कुकरेती के साथ लिखाभेंट )
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भीष्म कुकरेती – कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये?
साहित्यकारों नवोदित लेखकों को प्रोत्साहित करने वाले नवाचारों हेतु सादर प्रणाम सहित अपने बारे में जानकारी सादर साझा करते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं
नाम – विवेकानंद जखमोला
जन्म तिथि -०१अप्रैल १९७७
माता पिता नाम -श्रीमती प्रेमा देवी एवं श्री मंगतराम जखमोला
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – ग्राम पत्रालय गटकोट सिलोगी पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड
पट्टी मल्ला ढांगू।
शिक्षा – स्नातकोत्तर अंग्रेजी HNBGU श्रीनगर गढ़वाल
आधारिक -आ०वि०गटकोट(GPS गटकोट)
मिडल /हाई स्कूल – ज०इं०का०गटकोट मांडलू (द्वारीखाल) व इंटरमीडिएट, किसान इंटर कॉलेज मवींकला मेरठ से
उच्च शिक्षा -रा०स्ना०म०वि०कोटद्वार
आजीविका -शिक्षण
सम्प्रति -स०अ० रा०प्रा०वि०काण्डा (कल्जीखाल)
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
विवेका नन्द जखमोला -सेवा में आने से पूर्व जब प्राथमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण संस्थान चड़ीगांव पौड़ी गढ़वाल में आधारभूत प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था तो यह महसूस किया कि अपनी बात को काव्यात्मक रूप से कहना अधिक प्रभावी होता है इसी ने साहित्य की ओर झुकने के लिए प्रेरित किया।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी?
उत्तर-यूं तो बाल्यावस्था में प्राथमिक से लेकर कक्षा १२वीं तक की सभी कविताओं को पढा परंतु मैथिलीशरण गुप्त जी की कविता “नर हो न निराश करो मन को” ऐसी कविता थी जिसने भविष्य की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
विवेका नन्द जखमोला -यह मौका भी डायट चड़ीगांव में ही प्रशिक्षण के दौरान पुस्तकालय में मिला था जहां पर गढ़वाली तो नहीं पर कुमाउनी के सुप्रसिद्ध लेखक गिरीश तिवारी गिर्दा की कविता “जैंता एक दिन त आलो वो दिन यो दुनी में” पढने को मिली थी।”
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
विवेका नन्द जखमोला -स्व पुस्तकों के रूप में तो नहीं परंतु फेसबुक व इ-पत्रिकाओं आदि के माध्यम से तथा एक दो साझा काव्य संग्रहों के माध्यम से लगभग पांच सौ लघु तुकबन्दी प्रकाशित कर चुका हूँ।
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
विवेका नन्द जखमोला -व्यक्तिगत संग्रह तो नहीं पर रावत डिजिटल नोएडा द्वारा प्रकाशित साझा संग्रह और लखनऊ से प्रकाशित केदार स्मारिका में मेरी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है।
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
विवेका नन्द जखमोला -मैंने लिखना उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के समय से ही शुरू कर दिया था। पढने के लिए मैं मेरठ गया तो वहां पर अपनी भाषा का अभाव सा लगता था इसलिए उस अभाव को दूर करने के लिए मैंने गढ़वाली भाषा में लेखन चुना।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
विवेका नन्द जखमोला – गिर्दा की ही कविता “जैंता एक दिन त आलो वो दिन यो दुनी में” क्योंकि यह कविता एक आशावादी विचारधारा को पोषित करती है।
भी . कु. – किसी दूसरे कवि की गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों?
विवेका नन्द जखमोला – गढ कवि स्व० कन्हैया लाल डंडरियाल जी कविता “दादू अब किलै नि दिखेंदू डांड्यूं मा चौमास”।क्योंकि यह बदलते पहाड़ के सांस्कृतिक सामाजिक और भौगोलिक बदलाव का यथेष्ट दर्शन कराती है।
भी . कु. – अपनी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों?
उत्तर-गढ़वाल के सौंदर्य को वर्णित करती कविता “जान से प्यारू लगदू मिथैं म्यारु गढ़वाळ ।”पहाड़ी हूँ पहाड़ पर ही सेवारत हूँ तो पहाड़(विशेष रूप से गढ़वाल) ही रचनात्मकता की प्रेरक शक्ति है इसलिए इसकी शोभा का बखान करने वाली कविता ज्यादा पसंद है।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
विवेका नन्द जखमोला – मेरी कविताएं प्राकृतिक सौंदर्य, पलायन, भ्रष्टाचार और जनजागरण आदि विषयों पर आधारित होती हैं।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
विवेका नन्द जखमोला – सच कहूँ तो ऐसा कुछ है ही नहीं कि वर्गीकरण कर सकूं। मेरे भाव टूटे फूटे शब्दों को तुकबन्दी में पिरोने मात्र हैं।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
विवेका नन्द जखमोला -जैसे कि पहले भी कह चुका हूं कि विधाओं की ज्यादा जानकारी नहीं है, परंतु गजल व गीत लिखने का प्रयास भी किया है। कोरोना काल में जब विषम परिस्थितियां पर पार पाने के बाद भारत कोरोना वैक्सीन बना चुका था तब हिन्दी में लिखने का प्रयास किया था
“गम के बादल दूर उड़ जा आ गया है वो समां”
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
विवेका नन्द जखमोला – आज तो बहुत सारे पटल हैं और निश्चित रूप से उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत युवा अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन करने की ललक रखते हैं तो नित नए कीर्तिमान स्थापित करने की दिशा में काम हो रहा है।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
विवेका नन्द जखमोला – जी प्रयास करता रहता हूं कि कुछ नया हो पाये।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
विवेका नन्द जखमोला – समसामयिकता के अनुसार जैसे परिदृश्य बनते हैं वैसा ही बुनने की प्रक्रिया शुरू कर देता हूं।
भी . कु. – आप किन-किन लेखकों, कवियों , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
विवेका नन्द जखमोला – हिंदी में महादेवी वर्मा, सुमित्रा नंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, जयशंकर प्रसाद आदि से, महाकवियों में सूर, तुलसी, मीरा, कबीरदास जी से , रामायण, महाभारत आदि महाकाव्यों से।
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
विवेका नन्द जखमोला – समाजोत्थान व प्रकृति चित्रण
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुई हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
विवेका नन्द जखमोला – वैसे तो इस विषय में कहना मुश्किल है परंतु कमोबेश कविताएं समाज के उस वर्ग को तो प्रभावित करती ही हैं जो शिक्षित है और प्रकाशित या सोशल मीडिया आधारित साहित्य को देखता पढता है।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
विवेका नन्द जखमोला – जी बिलकुल, जब भ्रष्टाचार या सामाजिक कुरीतियों को उजागर करने का प्रयास किया तो यह निर्णय लेने में कि बात लिखी भी जाये, संदेश आमजन तक पहुंच भी जाये और भ्रष्टाचारियों को कचोटे भी परंतु सीधे तौर पर उनकी ओर इंगित न करे जिससे कि वे मेरे विरुद्ध किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई का रास्ता न अपनायें।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
विवेका नन्द जखमोला – विभिन्न सोशल मीडिया माध्यमों से व इनसे जुड़े रचनाधर्मी व रचनात्मकता की पोषक इ पत्रिकाओं के माध्यम से।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
विवेका नन्द जखमोला – जी समय समय पर जनजागरण से संबंधित रचनाओं को लिख कर विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राओं के साथ जुड़कर प्रसारित किया है।
भी . कु. – क्या किसी पुरस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
विवेका नन्द जखमोला – अपने शिक्षण संस्थानों से संबंधित कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए समय समय पर रचनाएँ की हैं।
किसी साहित्य पटल के लिए नहीं।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
विवेका नन्द जखमोला – अधिकांशतः शैक्षणिक गतिविधियों से संबंधित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में कविता पाठ करने बच्चों को विद्यालय में सिखाकर घर में सुनाने के लिए प्रेरित कर व समय-समय पर कुछ आनलाइन कवि सम्मेलनों में कविता पाठ कर। इसके अलावा सोशल मीडिया का सहयोग लेकर।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
विवेका नन्द जखमोला -जितना संभव हो सकता है प्रयोग करने का प्रयास करता हूं।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
विवेका नन्द जखमोला -जी हां गढसलाण. काम के नाम से एक ब्लॉग है।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
विवेका नन्द जखमोला – जी हां अनूप रावत जी के यू ट्यूब चैनल रावत डिजिटल के माध्यम से गेय रूप में कविता/गीत प्रस्तुत किए हैं।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
विवेका नन्द जखमोला -जी हां GPS PATON नाम से
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
विवेका नन्द जखमोला – फिल्हाल तो मौका नहीं मिला और यदि मिला तो अवश्य लिखूंगा।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
विवेका नन्द जखमोला – जनजागरण और प्रकृति प्रेम
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
विवेका नन्द जखमोला – जो पाठकों के हृदय को छूने में सफल हो और एक सकारात्मक संदेश प्रसारित कर सके।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
विवेका नन्द जखमोला – जी हां आनलाइन कवि सम्मेलनों में।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पाता ?
विवेका नन्द जखमोला – होता तो है परंतु कम मात्रा में क्योंकि आज के अभिभावकों के दिमाग में यह बात घर कर गई है कि गढ़वाली सीखने की चीज नहीं है, उन्हें भी अपने बच्चों को आधुनिकता का चोला पहनाना है और वे चाहते हैं कि विद्यालय में सिर्फ आधुनिक शिक्षा ही दी जाये।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
विवेका नन्द जखमोला – सोशल मीडिया के साथ साथ मौका मिलने पर जिस भी विद्यालय या शैक्षणिक सेमिनार में जाता हूँ वहां पर अपनी रचनाओं का वाचन करता हूं जो लोगों को पसंद आती हैं तो वे भी अपने वीडियो बनाकर प्रसारित करते हैं तथा अपने संस्थानों में प्रशिक्षण देने के लिए आमंत्रित करते हैं तो इस तरह से मेरे भाव एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंच जाते हैं।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
विवेका नन्द जखमोला – समय परिवर्तनशील है और समाज और समाज की मांग भी बदलती रहती है तो उसी हिसाब से लिखने का प्रयास करूँगा ।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या -क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
विवेका नन्द जखमोला – प्रकाशन प्रक्रिया अभी भी महंगी व जटिल है। प्रूफ रीडिंग की भी सही व्यवस्था नहीं है जिससे प्रकाशन त्रुटियों को सुधारने में भी समस्या आती है। गढ़वाली कुमाउनी या अन्य उत्तराखंडी लोक भाषा में प्रकाशित किताबों के बारे में जानकारी रखने वाले प्रकाशकों का अभाव है। जिन लोगों को इसका अनुभव है उन्हे प्रकाशन में आगे आना चाहिए और नवोदित कवियों लेखकों को प्रोत्साहन देने के लिए किफायती दर पर पुस्तकें प्रकाशित करनी चाहिए। सरकार के भाषा व संस्कृति विभाग को भी लेखकों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
विवेका नन्द जखमोला – पुस्तक वितरण का आनलाइन स्वरूप तो इ बुक के रूप में लगभग सभी जगह सुलभ है परंतु प्रिंटेड किताबों के लिए गांव में पाठक ही नहीं हैं तो भिजवानी किसे हैं। खैर बुक पोस्ट के माध्यम से डाक विभाग इस समस्या का समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है ही।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
विवेका नन्द जखमोला – लिखें लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि आपका लेखन समय व समाज की मांग के अनुरूप हो।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
विवेका नन्द जखमोला – जी हां मैं लघु कहानियां, व समसामयिक विषयों पर आलेख भी लिखता हूँ।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं इस हेतु क्या परामर्श है ?
विवेका नन्द जखमोला – शासन स्तर पर गढ़वाली को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए समय समय पर विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है?
विवेका नन्द जखमोला -मैं तो गढ़वाली कविता संसार का एक अदना सा विद्यार्थी हूँ जिसे आप जैसे जेष्ठ श्रेष्ठों से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि के रूप में याद किया जाएगा ?
विवेका नन्द जखमोला -सच कहूँ तो मैं कविता का क, ख, ग ही सीख रहा हूं तो इस हिसाब से कुछ कह नहीं सकता कि किसी को याद रहूंगा कि नहीं।