जानिये गढ़वाली कवित्री /कवि /श्री शिव दयाल शैलज से उनके कवित्व पर को उनकी जुवानी
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
–
भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि -10–01–1965(दस जनवरी सन् उन्नीस सौ पैंसठ)
माता पिता नाम -श्रीमती दर्शनी देवी व पिता जी श्री गोविन्द राम जी
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – जन्म स्थान -ग्राम मेलधार, पोस्ट -चौखाल, विकास क्षेत्र –वीरोंखाल, जनपद -पौड़ी गढ़ वाल, उत्तराखंड।
पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्र से।
शिक्षा –
आधारिक -आधारिक विद्यालय –चौखाल
मिडल /हाई स्कूल कक्षा आठ (8) पब्लिक हाई स्कूल चौखाल से। तत्पश्चात हाई स्कूल और इंटरमीडिएट पब्लिक स्कूल उफरैंखाल से किया।
उच्च शिक्षा -स्नातक राजकीय महाविद्यालय वेदीखाल, पौड़ी गढ़वाल से।
स्नातकोत्तर–राजकीय महाविद्यालय चौबट्टाखाल से।
बी0टी0सी0–राजकीय दीक्षा विद्यालय जयहरीखाल से।
आजीविका -प्राथमिक स्तर पर शिक्षण।
सम्प्रति -31मार्च 2025 को राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय चोपताखाल वीरोंखाल से सेवा निवृत्त।
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
शैलज -आदरणीय !
मेरे पिता जी बहुत अच्छे हारमोनियम वादक और गायक थे। देहरादून में उन्होंने किसी मुस्लिम उस्ताद से गाना बजाना सीखा था।तो उनके पास जौंळ मंगरी नामक श्री जीतसिंह नेगी जी की गढ़वाली गीतों की पुस्तक थी।वे उस पुस्तक से गीत गाते थे।
साथ उनके पास क्या गोरी क्या *सौंळी नामक पुस्तक भी थी। इन दोनों पुस्तकों ने आकर्षित किया।
कक्षा नौ में जाकर पब्लिक इंटर कॉलेज उफरैंखाल में गढ़वाली साहित्य के पुरोधा परम श्रद्धेय गुरु देव श्री तोता राम ढौंडियाल जिज्ञासु जी ने गढ़वाली में कविता लिखने को प्रेरित किया।और आज तक भी हाथ नहीं छोड़ा। तो मुख्य रूप से आदरणीय गुरुदेव श्री ढौंडियाल जी के वरद हस्त और परिश्रम से ही गढ़वाली भाषा में आज जैसा भी है,लिख रहा हूं।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
शैलज – हिन्दी की पहली कविता विद्यालय जाकर जो
कक्षा में पढ़ी —
जिसने सूरज चांद बनाया!
जिसने तारों को चमकाया।।
जिसने कलियों को चटकाया।
जिसने फूलों को महकाया।।
जिसने चिड़ियों को चहकाया।।
जिसने सारा जगत बनाया!!
हम उस ईश्वर के गुण गायें।
उसे प्रेम से शीश झुकायें।।
–द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी।
हम उस समय घमतपा नाम से स्कूल जाते थे।और सुन सुन कर ही याद हो गयी थी।
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
शैलज – – पूज्य गुरुदेव श्री तोता राम ढौंडियाल जिज्ञासु जी की जतोड़ु कविता उत्तराखण्ड में प्रचलित सबसे बड़ी कुप्रथा पशु बलि पर लिखी गई एक सशक्त रचना।
हालांकि तब निरीह पशु की निरीह वेदना ही दिल में उतरी थी। लेकिन तब से लगा कि क्या हम भी ऐसे विषयों पर अपनी भाषा में लिख सकते हैं?
तब गुरु जी की स्वीकृति पर गढ़वाली में लिखना आरंभ किया।
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
शैलज – -लगभग सौ से ज्यादा होंगी।
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम -अभी तो एक मात्र छोया नि सूखा वर्ष 2017 में छपा।
बाकी पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। कुछ संग्रहों में भी छपी हैं —
जैसे – बीजी ग्याई कविता।धाद पौड़ी से
ग्वै धाद स्यूंसी बैजरौ से।
अंग्वाळ देहरादून।
बिनसरी दिल्ली से
हिन्दी में
खिलते पलाश बिजनौर से।
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
शैलज – – जी सन1984–85 से।
जी । सामाजिक विद्रूपताओं से ही कविता की ओर गया।जब विरोध को रखने का कोई मंच नहीं मिलता तो कागज में उतार देता।इस प्रकार शनैः शनैः कविता की ओर चल पड़ा।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
शैलज – – श्रद्धेय दिनकर जी की कविता —
श्वानों को मिलता दूध -वस्त्र;
भूखे बच्चे अकुलाते हैं!
मां की हड्डी से चिपक चिपक;
जाड़ों की रात बिताते हैं!
यह कविता मेरी पसंदीदा कविता है।
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
शैलज – -सुप्रसिद्ध लोकप्रिय कवि श्री कन्हैयालाल डंडरियाल जी की:–
कीड़ू कि ब्वे!
यह एक यथार्थवादी कविता है।और वर्तमान समय में तो और अधिक प्रासंगिक हो गयी है।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है?
शैलज – – मेरी कविता का मुख्य विषय है सामाजिक विसंगतियां, मानवीय पहलू,और भाव हीन, संवेदनाहीन होता वर्तमान मानवीय जीवन।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
शैलज – – मेरी कविता विचार शील है। मैं एक वैचारिक कवि हूं। श्रृंगार पर कम लिख पाता हूं। सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था ही मुझे बैचेन किये रहती है। अंधविश्वास और पाखंड मेरे कवि मन को व्यथित करते हैं।
शैली,छंदबद्ध और मुक्त छंद दोनों में लिखता हूं।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
शैलज – -जी हां। ग़ज़ल और नव गीत भी लिखता हूं।
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
शैलज – – मेरी राय भिन्न है। गढ़वाली में अभी परंपरागत लेखन ही अधिक दिखाई देता है।मैं स्वयं भी इस परम्परागत लेखन से बाहर नहीं निकल सका हूं।
विचार पूर्ण कविताएं गढ़वाली में कम आ रही हैं।
हिन्दी कविता और विश्व कविता से हम बहुत पीछे हैं।
भले ही कविता अधिक लिखी जा रही है।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
शैलज – -जी हा। कोशिश करता हूं।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
शैलज – – रचना प्रक्रिया के विषय में क्या बताऊं मैं पेशेवर कवि नहीं हूं।जब कोई बात हृदय पर लगती है,तब भाव जगता है तब लिखता हूं।सोच सोच कर नहीं लिख पाता।
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
शैलज – – मैं गढ़वाली में श्री तोता राम ढौंडियाल जिज्ञासु जी, श्री लोकेश नवानी जी, श्री मदन डुकलान जी, श्री कन्हैयालाल डंडरियाल जी, श्री नेत्र सिंह असवाल जी, श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी,श्रीमती बीना बेंजवाल जी, श्रीमती बीना कंडारी जी,श्री शांति प्रकाश जिज्ञासु जी, श्री गिरीश सुंदरियाल जी आदि लेखक हैं।
पुस्तकों में अंज्वाळ श्री कन्हैयालाल डंडरियाल जी।
ढांगा से साक्षात्कार—श्री नेत्र सिंह असवाल जी।
फंची—श्री लोकेश नवानी जी।
गांव जाऊं या शहर?—श्री तोता राम ढौंडियाल जिज्ञासु जी।
सीता बणवास—श्री भगवती प्रसाद नौटियाल हिमवंतवासी जी ।और उनकी कहानी हेड मास्टर हिरदैराम।
वर्तमान कहानीकारों में श्री महेशानंद जी। पसंदीदा कहानीकार हैं।
कहानी
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
शैलज – – समाज में वैचारिक क्रांति कविताओं के माध्यम से पैदा करना।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
शैलज – – जी। कुछ कविताओं ने अवश्य ही किया है।
जैसे उत्तराखंड आंदोलन में श्रद्धेय श्री नरेन्द्र सिंह जी की कविताएं ही गीतबने।
श्री वीरेन्द्र पंवार जी की कविता — सब्बि धाणी देहरादूण
जैसी रचनाएं।
उत्तराखंड आंदोलन में
सुप्रसिद्ध उत्तराखंड आंदोलन के कवि बाबा मथुरा प्रसाद बमराड़ा जी की मौखिक कविताएं। बड़ी ओज पूर्ण होती थी।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
शैलज – – जी। बहुत चुनौती आती हैं सच्चाई को लिखने में।
सो मानसिक रूप से बहुत बार सोचना पड़ता है।कभी कभी कविता घर और पड़ोस के माहौल पर ही बन जाती है तो उसे प्रसारित करने में मानसिक द्वंद्व हो जाता है।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
शैलज – – पत्र पत्रिकाओं में छप जाती हैं।साथ आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी हो जाती हैं।
मेरा प्रथम कविता संग्रह उत्तराखंड संस्कृति विभाग के सौजन्य से छपा है।तो भाषा संस्थान और संस्कृति विभाग भी प्रकाशन में सहयोग करते हैं।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
शैलज – – नहीं श्रीमान जी। चुनाव आदि के लिए नहीं लिखे।
हां शासन के आदेश पर गढ़वाली भाषा के प्रथम पाठ्यक्रम में सहभागी लेखक के रूप में भाग लिया।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
शैलज – – नहीं। किसी पुरस्कार हेतु नहीं।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
शैलज – – कभी -कभी फेसबुक पर भेजता हूं।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
शैलज – -बस सिर्फ फेसबुक पर ही लिखता हूं।
लेकिन अच्छा प्यार मिलता है।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
शैलज – -नहीं गुरु देव!
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
शैलज – – नहीं जी।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
शैलज – – नहीं श्रीमान।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
शैलज – – नहीं श्रीमान।अभी तक तो नहू लिखी।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
शैलज – – मेरी कविता में सामाजिक विसंगति, पलायन और प्रकृति चित्रण आदि हैं।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
शैलज – – जो कविता जनमानस के जीवन से जुड़ी हो। विचार प्रधान हो।पाठक, श्रोता की समझ में आसानी आ जाये।और अधिक लंबी न हो।और कोई संदेश दे रही हो,वह मेरी दृष्टि में अच्छी कविता है।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
शैलज – – जी हां। श्री मान।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
शैलज – – जी। इसमें कुछ शासन की और कुछ भाषा हितैषियों की इच्छा शक्ति की कमी है। नहीं तो कुछ विद्यालयों में होता है।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
शैलज – – हम धाद संस्था के माध्यम से *एक कोना कक्षा का*के माध्यम से बच्चों के लिए गढ़वाली साहित्य की पुस्तकें भी भेजते हैं।इस तरह विद्यालय के पुस्तकालय में गढ़वाली भाषा की पुस्तकें पहुंचाते हैं।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
शैलज – – जी। मैं समाज में आमूलचूल परिवर्तन के लिए कविताएं लिखना चाहता हूं।ताकि विश्व में समता मूलक समाज की स्थापना हो सके।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
शैलज – – प्रकाशन के विषय में ऊपर के प्रश्न में कह चुका हूं।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
शैलज – – गढ़वाली भाषा का प्रकाशित साहित्य सरकार की तरफ से गांव के प्रधानों, के द्वारा गांव के पुस्तकालयों में उपलब्ध कराया जा सकता है।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
शैलज – – युवा कवियों के लिए एक सुझाव की वर्तमान समय की स्थिति पर, विचार प्रधान, चिंतन प्रधान,और सम सामयिक रचना कर्म करें। भूतकाल का अनुकरण न करें। मानवीय संवेदनाओं और विचारपरक रचनाएं लिखिए।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
शैलज – – जी। मैं अन्य विधाओं में भी लिखता हूं।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
शैलज – – युवा ही समाज को बदलने की ऊर्जा रखते हैं।और समाज परिवर्तन के लिए कलम कागज से ज्यादा कारगर उपाय मेरी दृष्टि में और नहीं है। इसलिए नयी पीढ़ी को अध्ययन करके लिखना चाहिए।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
शैलज – -कविता संसार की तो समालोचक जानें, लेकिन मैं लोगों के दिलों में स्थान पाने को लिखता हूं।आम आदमी को लगे,आखिरी आदमी को लगे कि कोई उसकी आवाज भी उठाता है।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
जी। मुझे समाज में सकारात्मक परिवर्तन के कवि के रूप में याद किया जायेगा।
क्यों कि मेरा विरोधी है।