आज जानिये गढ़वाली कवि श्री मनोज भट्ट ‘गढ़वळि’ से उनके कवित्व पर उनकी जुबानी –
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट- ) –
भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये –
जन्म तिथि – 14/04/1974
माता पिता नाम – श्रीमती महेश्वरी देवी व स्व0श्री पी0आर0 भट्ट
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – ग्राम – ईड़िया, पोस्ट – दिउली, वाया – लक्ष्मण झूला, यमकेश्वर, (गंगा सलाण क्षेत्र ) पौड़ी गढ़वाल |
शिक्षा – बी0एससी0, एम0ए0 ( अंग्रेजी, इतिहास )
आधारिक शिक्षा – राजकीय प्राथमिक विद्यालय दिउली, पौड़ी गढ़वाल |
मिडल /हाई स्कूल – सीनियर सेकण्डरी स्कूल आर0के0 पुरम सेक्टर -3, नई दिल्ली |
उच्च शिक्षा – श्री गुरुरामराय पी जी कॉलेज देहरादून |
आजीविका – सरकारी सेवा में,
सम्प्रति – ग्राम विकास अधिकारी विकास खण्ड – दुगड्डा, पौड़ी गढ़वाल
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
उत्तर – पहला तो प्राथमिक शिक्षा के बाद दिल्ली जाना और गाँव की ‘खुद’ लगना | दूसरा बड़े भैजी की लिखी हुई रचनाओं को पत्रिकाओं में छपते हुए देख कर | फिर वर्ष 2006 से जब पत्र पत्रकाओं में रचनाएं छपी |
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
उत्तर पहली हिंदी कविता तो प्राथमिक कक्षाओं में ही पढ़ी होगी अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी आदि की लिखी हुई |
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
उत्तर – किसी एक का नाम लेना तो मुश्किल है परन्तु समय समय पर बहुतों को पढ़ने का मौका मिला है |
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
उत्तर – पुस्तक, पत्र, पत्रिकाओं व सोसल साइट्सों में लगभग डेढ़ सौ तक और 15 से अधिक रचमाएं यू ट्यूब पर विडियो के रूप में अलग अलग चैनलों से प्रकाशित हुए हैं |
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
उत्तर – पहली किताब ‘एक अन्ज्वाळ द्वी मुट्ठी’ गढ़वाली काव्य संग्रह 2017 में
व दूसरी किताब ‘क्वांसु पराण’ गढ़वाली काव्य संग्रह 2020 में प्रकाशित हुई है |
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
उत्तर – स्कूल व कॉलेज के जमाने से पहली किताब ‘एक अन्ज्वाळ द्वी मुट्ठी’ में अधिकांश रचनाएं सन 2000 से पहले की ही लिखी हुई हैं | बाकि जहां तक प्रेरित होने कि बात है तो जैसा कि मैंने पहले भी कहा है घर गाँव की ‘खुद’ व बड़े भैजी की प्रेरणा से |
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
उत्तर – कामायनी में जयशंकर प्रसाद जी की ‘आशा’ शीर्षक रचना की लाइनें हैं कि –
नव कोमल आलोक विखरता, हिम संसृति पर भर अनुराग,
सित सरोज पर क्रीड़ा करता, जैसे मधुमय पिंग पराग |
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
उत्तर – मेरे काव्य संग्रह ‘एक अंज्वाळ द्वी मुट्ठी’ के ‘पिड़ा’ शीर्षक की लाइनें हैं कि –
कतल ह्वे ग्येन कूड़ी यख, नि मिली क्वी गवाह रै |
खट खटाक का जीवन यख, खट खटाक मा हि जांद रै ||
न मरण मा दुःख च कै तैं यख, न उठण मा हर्ष रै |
बस अब्बि अब मा, जीणा छन यख, हर क्वी अफु अफु मा रै ||
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
उत्तर – मेरी कविताओं में आपको पलायन से लेके श्रृंगार, दुःख, पीड़ा, विरह, व्यंग्य, समसामयिक, व परम्परागत आदि सभी प्रकार के भाव मिलेंगे |
भी . कु. – आपकी कविता का वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
उत्तर – कुछ मुक्त छंद युक्त अलंकारिक गीतिकाव्य रचनाएं हैं | तो कुछ व्यंगात्मक बिम्ब प्रतीक वाली भी हैं |
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
उत्तर – जी ,
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
उत्तर – समय के साथ जब हर चीज बदल रही है तो कविता क्यों न बदले लेकिन कविताओं का अपना एक आयाम होता है, जिससे उसकी पहचान होती है | वो उसके अंदर हमेशा दिखनी चाहिए |
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
उत्तर – बहुत ज्यादा नहीं |
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
उत्तर – जब कहीं कोई विसंगति नजर आती है या फुर्सत के क्षणों में कलम चल पड़ती है |
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
उत्तर – हिन्दी में प्रेमचन्द की ‘गोदान’ ‘पूस की रात’ से लेके जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ ‘कंकाल’ आदि, और गढ़वाली में हरिदत्त भट्ट ‘शैलेश’, गोविन्द चातक, भजन सिंह ‘सिंह’ डॉ0 शिवानन्द नौटियाल, डॉ0 यशवन्त ‘कटोच’ जी आदि की पुस्तकें संग्रहणीय हैं |
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
उत्तर – समाज में उत्पन्न विसंगतियों के प्रति लोगों को जागरूक करना व अपनी गौरवशाली परम्पराओं व भाषा को विस्तार देते हुए दूसरी पीढ़ियों तक पहुंचाना |
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
उत्तर – बहुत हद तक नहीं , लेकिन करते हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता |
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
उत्तर – हाँ , अपने समय में कोई न कोई चुनौती तो बनी ही रहती है, फिर सरकारी सेवा में रहते हुए तो आपको अपनी सीमाओं का पता होना ही चाहिए |
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
उत्तर – पत्र पत्रिकाओं, किताबों, यू ट्यूब पर व काव्य मंचों पर काव्य पाठ करते हैं |
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
उत्तर – कविता तो नहीं लेकिन पलायन रोकने हेतु पलायन विभाग के लिए स्लोगन लिखे हैं |
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
उत्तर – कभी नहीं |
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
उत्तर – ज्यादातर तो वही जो प्रकाशन के लिए करते हैं | हाँ कभी कभी सोसल साइट्स का भी प्रयोग करते हैं जैसे फेसबुक, यू ट्यूब आदि का |
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
उत्तर – थोड़ा बहुत यू ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि सभी का |
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
उत्तर – जी नहीं |
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
उत्तर – जी |
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
उत्तर – हाँ ‘गढ़वाली भुला’ नाम से |
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
उत्तर – अभी तक तो नहीं |
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
उत्तर – छंद युक्त सुख दुःख के भावों सहित नैतिकता व समसामयिक के साथ काल्पनिकता के भाव मिलेंगे |
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
उत्तर – जो लोगों के मनोभावों को जगा सके |
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
उत्तर – जी |
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
उत्तर – उसके लिए उस प्रकार के मनोवृति वाले अध्यापक या पाठ्यक्रम होने जरूरी हैं |
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
उत्तर – वही सोसल साइट्स या कवि सम्मेलनों के माध्यम से |
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
उत्तर – जो लोगों को किसी भी रूप में प्रेरित कर सकें |
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
उत्तर – प्रकाशन की बहुत सारी परेशानियां हैं पहले तो ढंग के प्रकाशक नहीं मिलते जो मिलते हैं वे आपके क्षेत्र से काफी दूर स्थित हैं फिर वे अपने हिसाब से समय देते हैं करेक्शन लगाने के बाद भी कई बार उन्हें दूर नहीं किया जाता, बहुत ज्यादा समय लिया जाता है | पुस्तकें छपने के बाद उनके ढुलान में अतिरिक्त व्यय लगता है | प्रकाशक एक सीमित संख्या में ही वितरण की जिम्मेवारी लेते हैं बाकि ज्यादातर को खुद ही मैनेज करना पड़ता है | गढ़वाली भाषा की किताबों को पाठक बहुत कम मिल पाते हैं जिससे वे ज्यादातर फ्री में ही बंट जाती हैं | बहुत कम प्रकाशक हैं जो स्टाल लगाते हैं और लेखकों को रॉयल्टी प्रदान करते हैं |
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
उत्तर – प्रथम तो इस कार्य को सम्पादक या प्रकाशक को करना चाहिए | द्वितीय समय समय पर मुख्य स्थानों पर स्टाल लगे जिनसे लोग लेखक व कवियों को जान सकें, बुक शॉप तक किताबें पहुंचे | अमेजॉन, फिलिपकार्ट जैसे साइटों पर हर पुस्तक उपलब्ध हो जो दूर दराज तक भी अपनी सेवा दे सकें |
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
उत्तर – लिखते रहें …लिखते रहें …लिखते रहें और साथ साथ सोसल साइट्स पर डालते रहें |
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
उत्तर – जी, अनुवाद, कहानी, निबन्ध व शोधपूर्ण आलेखों पर भी थोड़ा बहुत कार्य किया है |
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
उत्तर – वही लिखते रहें और सोसल साइट्स पर तब तक डालते रहें जब तक आप एक स्थापित कवि नहीं बन जाते | या आपकी कवित्व की पूरी समझ नहीं जाग जाती |
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
उत्तर – ये सवाल तो आपको जनता से पूछना चाहिए था…खैर इसके दूसरे खण्ड की बात करें कि कहां पर देखना चाहते हैं तो ऐसा कभी कोई विचार मन में नहीं जागा न कभी इस उद्देश्य से लिखा ये भी जनता पर छोड़ देते हैं कि वह हमें कहां पर देखती है |
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
उत्तर – ये तो पता नहीं लेकिन जब तक शरीर चलता रहेगा अपनी भाषा की सेवा करते रहेंगे |