(जानिये गढ़वाली /कवि श्री विजय कुमार मधुर से उनके कवित्व पर को उनकी जुवानी श्रृंखला )
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि – 02 अक्तूबर,1964
माता पिता नाम – स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है –
शिक्षा –
आधारिक – आधारिक विद्यालय, रणस्वा, पौड़ी गढ़वाल
मिडल /हाई स्कूल : आठवीं तक| जनता इण्टर कॉलेज, सुरखेत, पौड़ी गढ़वाल
(इस स्कूल के संस्थापक, प्रथम अध्यापक हेड मास्टर और प्रबंधक मेरे पिताजी रहे)
हाई स्कूल इंटर : 12वीं(पी.सी.एम), नौगाँवखाल, पौड़ी गढ़वाल
उच्च शिक्षा – एम.कॉम: डी.ए.वी.(पी.जी.), देहरादून, एम.सी.ए.: इंदिरा गाँधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी, दिल्ली
आजीविका – उप महाप्रबंधक(वित्त एवं लेखा), ओ.एन.जी.सी. से सेवानिवृत
सम्प्रति – पूर्व उप महाप्रबंधक(वित्त एवं लेखा), ओ.एन.जी.सी.
भीष्म कुकरेती – बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
विजय मधुर – समझ आने पर स्कूल की किताबों के साथ पिताजी की रचना पढ़ने का अवसर मिला जिनमें
वर्ष 1967 में पिताजी का गीत संग्रह “स्व. राष्ट्र वीर वंदना”,
वर्ष 1967 में पिताजी के चुनाव प्रचार के दौरान प्रकाशित हैंड बिल में प्रकाशित कविताएँ जिनमें मुख्य रूप से “ नौटू की बहार मा वोट ना बिकें दियां, लड्डू दाणी धोती मा अफू ना बिकी जयां”,
अस्सी के दशक में नौगोंखाल पौड़ी गढ़वाल से प्रकाशित पिताजी द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक “गढ़ चेतना” के नाम से प्रकाशित पत्र में प्रकाशित पिताजी के लेख, संपादकीय और कविताएँ पढ़कर|
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
विजय मधुर : पिताजी द्वारा रचित कविता: भगवान सभी जन हों सुखी, धैर्य धर्म आचार, कोय न विपदा ही पड़े, हो वसुधा विपुल बहार |ऋतु बसंत हो वैभवशाली, अलि पुंज संजावे पुष्पन माली, शरद ऋतु शशि छटी पूर्णिमा, नील गगन मन भावनशाली||……|
भी. कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
विजय मधुर : वर्ष १९६७ में पिताजी द्वारा रचित “नौटू की बहार मा वोट ना बिकें दियां, लड्डू दाणी धोती मा अफू ना बिकी जयां”|
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
विजय मधुर – 100 से अधिक
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
विजय मधुर – वर्ष 2018 में गढ़वाली कविता संग्रह “सर्ग दिदा पाणि-पाणि” में 60 कविताएँ
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
विजय मधुर – 18 वर्ष की उम्र से, पहली कविता “बूण को वास कुल कु नाश कबि बोल्दा छा ददा जी” 1982-83 में कोटद्वार से प्रकाशित पत्रिका “गढ़ गौरव” में प्रकाशित |
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
विजय मधुर – पिताजी का कविता के रूप में पत्र:
विजय तुम मेरी हर विपदा में विजय हो ,ज्ञाता मेरे कैसे कलयुगी प्राण हो, त्राण जीवन में सहे हैं, तरस कर सहे, सूरमा की लपक, चेतना में सहे|
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
विजय मधुर – पिताजी की कविता “ससुरस्या बैणी”
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
विजय मधुर : समसामायिक जैसे : हम लेखि-पैढ़ी सकदां, गोष्ठी सम्मलेन कैरि सकदां, नै-नै अखबार, किताब छपै सकदां, पी.एच.डी. कैरि सकदां, मोळ माद्यो बणे सकदां, अपणि बोली-भाषा, अर पहाडू तैं …|, विधानसभा, होरी, कूड़ी कु दार आदि |
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
विजय मधुर : आम जन की भाषा
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
विजय मधुर – जी गीत तो लिखें हैं, गजल के बारे में कभी सोचा नहीं |
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
विजय मधुर : सभी अच्छा लिख रहें हैं| अपने जीते-जी वही लोग कामयाब रहे हैं जिनकी जीविका का साधन मात्र लेखन नहीं |
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
विजय मधुर – जी हाँ| जैसे मेरी गढ़वाली कविता-जग्रिकटा, २०१० में आपने ही ईमेल पर शंकु के आकार में एक गढ़वाली कविता लिखने को कहा था | शंकु के आकार की मेरी गढ़वाली कविता “धुर्पाळ” है|
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
विजय मधुर : निरंतरता बनी रहती है|
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
विजय मधुर : सभी को पढ़ता हूँ, सभी अपने-अपने ढंग से सही लिखते हैं| सभी को पढ़ना अनिवार्य है|
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
विजय मधुर : जो कुछ यह आँखे देखती हैं, मन महसूस करता है, लिख देते हैं|
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
विजय मधुर: आम पाठकों तक कविताएँ का सम्प्रेषण नहीं हो पाता | हरेक व्यक्ति कविताओं से ज्यादा गीत पसंद करता है|
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
विजय मधुर : लगता नहीं |
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
विजय मधुर : ऑनलाइन पब्लिशर्स के जरिये छपवाने का प्रयास करता हूँ |
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
विजय मधुर : जी नहीं| सरकार के पास सक्षम लेखक जो हैं|
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
विजय मधुर : जी नहीं |
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
विजय मधुर : अपनी पुस्तकें मित्रों को भेंट या डाक से भेजता हूँ| अमाजोन या स्टाल्स से लोग खरीदते नहीं|
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
विजय मधुर – जितना हो सके| लेकिन वह लाइक और कमेंट तक सीमित होते हैं| लिंक भेजने के बावजूद कोई 100 रुपये भी खर्च करने को राजी नहीं|
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
विजय मधुर – जी हां| https://vijaymadhur.blogspot.com, कुछ समय से ब्लॉग को समय नहीं दे पा रहा हूँ |
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
विजय मधुर: जी हाँ | Vijay Madhur @vmadhur, उसमें स्व. जीत सिंह नेगी जी के साथ एक वार्ता भी है|
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
विजय मधुर : कभी अवसर नहीं मिला | अपने हिंदी लघु नाटकों के मंचन के लिखे हैं जैसे लघु नाटक “कंप्यूटर युग” के लिए कंप्यूटर युग कम्प्यूटरी बातें, लम्बे दिन छोटी रातें| आदि
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
विजय मधुर: पहाड़ का दर्द और अपनों द्वारा अपनों की अनदेखी, सामाजिक विसंगतियां, सुख-दुःख, आपदाएं आदि |
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
विजय मधुर : कुछ कह नहीं सकता | सभी वाह .. वाह सुनने की आदि हो गए हैं | आलोचकों का अभाव है|
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
विजय मधुर : पिछले 40 वर्षों में 20 के लगभग|
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
विजय मधुर : बच्चों के पास तो समय ही समय है, दूर-दराज में उनको समय देने वाले नहीं हैं | सब कुछ तो सरकार नहीं कर सकती |
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
विजय मधुर: कुछ खास नहीं | लिखते हैं, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और किताब छपवा देते हैं |
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
विजय मधुर : समय जैसा चाहे|
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
विजय मधुर : जो सक्षम हैं वह जैसे-तैसे अपना काम निकाल ही लेते हैं|
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
विजय मधुर: मुफ्त लेने वालों की कमी नहीं है| खरीदकर कोई नहीं पढ़ना नहीं चाहता|
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
विजय मधुर : अपने भाव व्यक्त करने का इससे अच्छा कोई दूसरा मार्ग नहीं| समय के साथ-साथ परिपक्वता आती रहेगी और वह दिन दूर नहीं जब आपकी गिनती श्रेष्ठ रचनाकारों में होने लगेगी |
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
विजय मधुर : जी हाँ | गढ़वाली और हिंदी में कविताओं के अतिरिक्त कहनियाँ, लेख, नाटक| अभी जल्दी ही हिंदी कहानी संग्रह पाठकों के मध्य आने वाला है|
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
विजय मधुर : अपनी अभिव्यक्ति के लिए जरूर आयें लेकिन पहले अपनी आजीविका को प्राथमिकता दें|
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
विजय मधुर – स्थान का चयन और कल्पना अपनी समझ से बाहर है| स्वयं निर्धारण करने से क्या होता है ?
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
विजय मधुर : जैसे अन्य कवियों को|
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अपने संग्रहों की फोटो प्रेसित कीजियेगा साथ में
- “प्रसिद्ध समाजसेवी,शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति” स्मृति ग्रन्थ – वर्ष-2014
- “मन की बातें” हिंदी कविता संग्रह-67कविताएँ हैं – वर्ष 2017
- “सर्ग दिदा पाणि-पाणि” गढ़वाली कविता संग्रह -60 कविताएँ- वर्ष 2018
- “भड्डू” हिंदी कहानी संग्रह –20 कहानियां -वर्ष 2026 (किताब इस माह के अंत तक आ जायेगी)