जानिये गढ़वाली कवित्री /कवि श्रीमती /कुमारी /श्री कामेश बहुगुणा जी से उनके कवित्व पर को उनकी जुवानी
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि – 10 – 4 -1971
माता पिता नाम – स्व,श्रीमती विशेश्वरीदेवी बहुगुणा, स्व,श्री तुमसीराम बहुगुणा,
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – ग्राम-घुन्ना, पट्टी-बिडोलस्यूँ, पोस्ट-बिडोली, ब्लॉक-पाबौ, जिल्ला-पौड़ी,
शिक्षा – बीएससी,
आधारिक – प्राइमरी-घुन्ना,
मिडल /हाई स्कूल -मकेरी (बिडोली)
इंटरमीडिएट (साइंस) रा,इ,का, पाबौ से,
उच्च शिक्षा – मुंबई
आजीविका – व्यवसाई (क्रेन&अर्थमूविंग इक्यूपमेंट्स)
सम्प्रति – व्यवसाय,
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
कामेश – – मेरा बड्डाजी डॉ, चिंतामणी बहुगुणा जी अपड़ा जमाना का मण्या जन्या कलाकार छा, पिताजि शास्त्र पुराणों का विद्वान, माताजी मधुर व सुरीला कंठ की धनी, घर म विद्वतजनों को शास्त्रार्थ चलणु हि रैन्दू छायु, बस ऐसे वातावरण में बचपन और युवावस्था बीती, और उसका असर ये हुवा कि, गीत/संगीत व शास्त्रों के प्रति रुचि मेरे रग रग में बस गई, 90 के दशक में मुंबई आकर मेने गीत लिखना व उन्हें संगीतबद्ध करना सुरु कर दिया।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
उत्तर- उठो लाल अब आंखे खोलो, पानी लाई हूं मुंह धोलो,
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
उत्तर-पिताजी दिल्ली रहते थे कविश्रेष्ठ कन्हयालाल डंडरियाल जी से उनकी गहरी मित्रता थी, उनकी पुस्तकें घर मे पड़ी रहती थी, उन्हें हम बड़े चाव से पड़ा करते थे,
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
उत्तर- संख्या बतानी मुश्किल है, परन्तु रन्त रैबार, शैलवाणी आदि पत्रिकाओं में मेरि रचनाएं छपती रहती है, इसके अलावा मैं शोशल मीडिया पर लगभग हर रोज अपनी एक कविता पोस्ट करता हूँ, ये क्रम पिछले 5/6 साल से निरंतर जारी है,
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
कामेश – – दो पोथियां प्रकासधीन हैं उनका अनावरण आपके हाथों करने का विचार है।(नाम फाइनल नहीं किये अभी),
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
कामेश – – मैं विशुद्ध रूप से गढ़वाली गीतकार हूं जिन्हें मैं 1990 से लिख रहा हूं, आज मेरे पास लगभग 400 गीतों का संगीतबद्ध संग्रह है, कविताएं तो करोनाकाल से लिखनी सुरु की, तब हमने धाद’ के fb पेज व वट्सप ग्रुप में साहित्य लेखन (गद्य/पद्य) सुरु किया था, उसमे आ0 लोकेश नवानि जी व स्व, हरीश मंगाई जी कोई एक शब्द/विषय अथवा चित्रधारित विषय देते थे, बस ऐसे ही कविताएं लिखने के लिए प्रेरित हुवा।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
कामेश – – मानुष होंतो वही रसखान बसों ब्रिज गोकुल गांव के ग्वालन,
मुझे रसखान की कृष्णभक्ति पर लिखा सब मंत्रमुग्ध कर देता है,
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
कामेश – – कीडु कि ब्वे,/ यथार्थ और सर्वकालिक प्रासंगिक,
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
कामेश – – कोई एक नहीं, वर्तमान परिवेश में हर विषय को छूने की कोशिश रहती है।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
कामेश – – वर्ग निश्चित नही है, जैसी उपजी तव्यता तैसो मिलो सहाय,
शैली, छन्दमुक्त/दोहा/चौपाई/छंद/सोरठा/मुक्तक/थड्या/चौंफला आदि।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
कामेश – – जी, ग़ज़ल लिखी हैं, नवगीत अभी नहीं लिखे।
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
कामेश – – मैं कोई काव्य विश्लेषक तो नहीं हूं फिरभी मेरा अनुभव कहता है कि, नई कविताएं बहुत लिखी जा रही हैं, जोकि अच्छा संकेत है, परन्तु इनमें लोक का अभाव है, जमीन से जुड़ी कविताएं कम ही आ रही है, आज लेखकों पर पलायन छाया हुवा है, जबकि विषय बहुतेरे हैं, कविता आंदोलन ऐसा हो कि पाठक कविताओं से जुड़े, उन्हें आत्मसात करें, और ये तभी सम्भव है जब नई कविताओं में लोक जीवन हो।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
कामेश – – जी हां, गढ़वळि में गजल/ कब्बाली/ठुमरी आदि एकाद गीत/कविता ऐसी भी लिखी जिनमे गढ़वळि/हिंदी/इंग्लिश तीनों भाषाओं का समावेश है, साथ ही मराठी/पंजाबी/मैथली/भोजपुरी शब्दो का अपनी रचना में संयोजन।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
कामेश – – संदेशात्मक/ अपने आस-पास /प्रकृति के बदलाव/मौसम आदि देखकर जो भाव में जागें, उन्हें कागज पर उड़ेल देता हूं।
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
कामेश – – भक्तिकाल से लेकर आधुनिक काल और वर्तमान में बहुत सारे हैं, इन्हें नामों में समेटना मुश्किल है हां गढ़वळि में श्रधेय कन्हैयालाल डंडरियाल जी, ग्रन्थ- रामचरितमानस/बाल्मीकि रामायण व गीता।
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
कामेश – – किसी भी तरह के डर/भय व आलोचना की परवाह किये बिना सत्यता लिखना/जनजीवन के हर बिंब को छूने का उद्देश्य।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
कामेश – – कुछ हद तक, परन्तु अभी उत्तम परिणाम की आस बाकी है।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
कामेश – – कुछ खास नहीं, हां जब कभी किसी पौराणिक विषय य आपदा/बिपदा पर लिखना हो तब मस्तिष्क का खून निचोड़ कर लिखना पड़ता है।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
कामेश – – प्रिंट मीडिया/इंटरनेट आदि,
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
कामेश – – जी नहीँ, (चुनाव जागरूकता पर कछुएक)
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
कामेश – – जी नहीँ, मेरि रचनायें ही मेरे लिए पुरुस्कार हैं।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
कामेश – – मंचो से काव्यपाठ/संगोष्ठीयां/पत्रिकाएं व शोशल मीडिया प्रयुक्त करता हूँ।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
कामेश – – लगातार,
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
कामेश – – नहीं, फेसबुक पेज है।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
कामेश – – संस्थाओं द्वारा किये कार्यक्रमों में मेरी रचनाओं के विडियूज यूट्यूब पर आते रहते हैं।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
कामेश – – नहीं, अलबत्ता आपके आशीर्वाद से जल्द ही ‘कामेशवानी’ नाम से लॉन्च करने जा रहा हूँ।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
कामेश – – जी हां, मैंने स्व, अशोक मल जी व श्री सुनील पटनी जी की करीब 8/ 10 फिल्मों के लिए गीत/कविता लिखे, कुछ अन्य प्रोडकशन्स के लिए भी लिख रहा हूँ।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
कामेश – – समसामयिक जनजीवन/लोक/प्रेम/सृंगार/विरह,
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
कामेश – – वही जो जनमानस के मनमस्तिष्क को अपने भाव से तृप्त कर पाए, फिर बात वही आ जाती है, लोकाधारित,
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
कामेश – – जी हां।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
कामेश – – कई कारक हैं, कुकरेतीजी जिस राज्य में प्राइमरी स्कूलों में तालें लग रहे हों/ विद्यालय विद्यार्थिविहीन हो रहे हों/सरकारें शीतनिंद्रा में हों/ विद्यालय परिसर में दुधबोली बोलने पर प्रतिबंध हो/ स्तरीय बालकविताओं /नाटकों के अभाव के साथ साथ अपनी बोली के प्रति जनजागरण व जागरूकता की नीरसता।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
कामेश – – जब भी समय मिलता है गांव जाकर इन आयुवर्ग के साथ मुखभेंट करके कविताओं/गीतादि को अर्थ सहित समझाना, जिससे उनका रुझान इस ओर हो सके, कविसम्मेलन/विडियूज बनाकर आदि।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
कामेश – – लोकाधारित, समयानुसार।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
कामेश – – इस बाबत मुझे अनुभव नहीं है।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
कामेश – – गांव/ब्लॉक/जिल्लास्तर पर उपयुक्त मात्रा में मुफ्त पुस्तकालयों/लाइब्रेरी का होना आवश्यक है। लोकल बुकसेलर/मेले कौथिग आदि में बुकस्टाल लगाना।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
कामेश – – छंदाआधरित/अर्थपूर्ण/लोकनिहित स्तरीय रचनाऐं रचने की कोशिश होनी चाहिए। जरूरी नही कि हर रचना उत्कृष्ट बने, लेकिन लिखना जरूरी है, रचनात्मकता बनी रहनी चाहिए। वक्त के साथ अनुभव प्राप्त होता है, नाम या प्रसिद्धि के लिए सोचकर काम न करें, काम की प्रसिद्धि ही आपकी बुद्धिमत्ता है।
क्वेन्टिटी नहीं क्वेलिटी पर फोकस रखें।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
कामेश – – जी कोशिश यही रहती है।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
कामेश – – काव्यता जनमानस तक जुड़ाव का सुलभ साधन है, आप अपने मनोभावों को जन जन तक इस विधा से आसानी से पहुचा सकते हैं। जल/जंगल/जमीन और अपनी दुधबोली की मिठास को अपनी रचनाओं में स्थान दें, साथ ही पहाड़ी साहित्य की मजबूती के लिए गद्य भी लिखना जरूरी है।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
कामेश – – यरां,, मित तीन म ना पांच म, आगे मेरे पाठक तय करेंगे कि, वे मुझे किस स्थान पर देखते हैं जी।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
मनमौजी के साथ ही हैंसाड़/खुदेड़/मजकेरू।