(भीष्म कुकरेती से हरीश जुयाल की वार्ता)
म – हरीश जुयाळ कुटज
जन्म तिथि – 1 सितम्बर 1969 गाँ, व में ही जन्म हुआ
माता – श्रीमती सुमित्रा देवी
पिता – श्री कुलानन्द जुयाल
जन्मस्थान -ग्राम – टसीला मल्ला
पो० – घेरुवा
पट्टी – बदलपुर मल्ला
जिला – पौड़ी गढ़वाल
शिक्षा – बी.ए, बी.टी.सी.
आधारिक विद्यालय – राजकीय प्राथमिक विद्यालय घेरुवा
हाईस्कूल – इण्टर कालेज नौगाँवखाल
इण्टरमीडिएट – इन्टरकालेज सतपुली
बी.ए . – राजकीय महाविद्यालय जयहरीखाल
बी.टी.सी. – दीक्षा विद्यालय जयहरीखाल
आजीविका – राजकीय जूनियर हाईस्कूल कठवाड़ा में अध्यापन कार्य
पहली पढ़ी गई हिन्दी कविता – उठो लाल अब आँखें खोलो
पहली पढ़ी गई गढ़वाली कविता – कन्हैया लाल डंडरियाल जी की कविता – चुसणा
प्रकाशित गढ़वाली कवितायें / पुस्तकें – सन् 2000 में कविता संग्रह – उकताट
वर्ष – 2004 में – खिगताट
वर्ष -2012 में – खुबसाट
वर्ष – 2016 में – भैजी की बरात
इसके अलावा कई गढ़वाली संस्थाओं द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में प्रतिभाग । पत्रिका धाद , चिट्ठी – पत्री, उत्तराखंड खबरसार , गढ़कुमौ, गढ़सुधा आदि पत्रिकाओं / अखबारों में रचनायें प्रकाशित ।
वर्ष 1988 से गढ़वाली में लेखन कार्य । पूर्व में हिन्दी में कवितायें लिखता था। सन् 1990 में गोपेश्वर में चन्द्रकुंवर बर्त्वाल सम्मान मिला । वहाँ वरिष्ठ साहित्यकार ‘मदन मोहन डुकलान जी से भेंट हुई । उनकी प्रेरणा से पूर्ण रूप से गढ़वाली में लेखन कार्य शुरू किया । हमारे साक्षात बद्रीनाथ गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी जी के प्रथम दर्शन भी उसी दिन हुये । इसी पावन साहित्यिक आयोजन में वरिष्ठ कवि श्रद्धेय देवेन्द्र जोशीजी ,वीणापाणि जोशी , बी.मोहन नेगीजी,नन्दकिशोर हटवाल जी, बीना बेंजवालजी, अबोधबंधु बहुगुणा ,ललित केशवान जी ,रमाकान्त बेंजवालजी जैसे साहित्यिक मनीषियों के दुर्लभ दर्शन का भागीदार बना।
मेरे गढ़वाली लेखन का विषय गढ़वाली रीतिरिवाज, पहाड़ी विषमतायें , छीजती मान्यतायें बदलता परिवेश,व हमारे समाज में उपजती विसंगतियां ।
गैर गढ़वाली पसंदीदा रचनायें तो कई हैं । हिन्दी कविताओं में मुझे बाबा नागार्जुन की कवितायें ज्यादा पसन्द हैं क्योंकि वे जीवन के इर्द – गिर्द घूमती हैं ।
गढ़वाली कवितायें भी कई पसन्द हैं । सबसे पसंदीदा कविता मुझे कन्हैयालाल डंडरियाल जी की ही लगती है – दादू मेरि उल्यरि जिकुड़ी ।
हाँ ,मैंने नवगीत व छन्द भी लिखने का प्रयास किया है ।
नई कविता व नये कविता आन्दोलन की बात की जाय तो वर्तमान में गढ़वाली में कई अधिक कविता लेखन हो रहा है । जो कि अच्छी बात है ।
मेरी रचनात्मक प्रक्रिया – बस लिख ही रहे हैं । बीच में कुछ समय तक लेखन का तारतम्य टूट गया था। यह एक सहज प्रक्रिया है। हर किसी के जीवन में यह घर घटनायें होती रहती है। अब फिर लेखन कार्य शुरू हो गया है । ज्यों उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवै । आजन्म गढ़वाली में लिखता रहूंगा ।
कह नहीं सकते कि मुझे कौन – कौन गढ़वाली कवियों ने प्रभावित किया है । लम्बी सूची है। उनमें से गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी जी सर्वमान्य हैं , सभी के प्रेरणा श्रोत हैं । अबोध बन्धु बहुगुणाजी , सुदामा प्रसाद प्रेमीजी, मदनमोहन डुकलान, कन्हैयालाल डंडरियालजी, ललित केशवानजी , वीणापाणि जोशीजी, लोकेश नवानीजी, भीष्मकुकरेती जी,नेत्रसिंहअसवालजी, जयपाल सिंह रावत छिपडु दा, गिरीश सुन्दरियाल , निरंजन सुयाल, गणेश खुगशाल गणी, देवेन्द्र जोशी , नन्द किशोर हटवाल, किशना बगोट, चिन्मय सायर, जगमोहन सिंह बिष्ट, डा.जगदम्बा प्रसाद कोटनाला, ओमप्रकाश सेमवाल, जगदम्बा चमोला, मुरली दीवान, डा.शैलेन्द्र मैठाणी ,आदि कवियों ने मुझे प्रेरित किया है। और भी कई नाम हैं जो अभी याद नहीं आ रहे हैं ।
बस यह समझो कि सभी भाषा प्रेमियों से प्रेरणा मिलती रहती है।
मेरी कविताओं का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन, सामाजिक समरसता, डाँडी – कांठ्यों के प्रति प्रेम, अन्याय व शोषण के प्रति रोष आदि हैं ।
असल में कविता प्रभावित करने के लिए ही लिखी जाती हैं । कअच्छी कवितायें समाज व व्यक्ति को प्रभावित करती हैं ।
मेरा विचार तो यह है कि अगर किसी कवि की कविता में प्रभावोत्पादकता नहीं है तो उस कवि का कविता – कर्म बेकार ही है । कविता करते समय श्रोता का हंसना ,रोना व ताली बजाना यह सब अच्छी कविता के प्रभाव का द्योतक है ।
कविता लेखन में भिन्न चुनौतियां तो आती ही हैं। कविता की गुणवत्ता के लिए नये विषय का चयन ,नयी उपमायें, नये प्रतिमानों को खोजना एक अच्छी कविता की चुनौती है। आजकल ऐसे कवि जो नये विषय पर नये तरीके से लिखते हैं कम ही देखने को मिलते हैं । वर्तमान में सोशल मीडिया में कॉपी पेस्ट का जमाना आ गया है । लोग शौर्टकट चाहते हैं ।
एक बात और कहनी है कि प्रेरणा लेकर कविता करना कोई बुरी बात नहीं है । प्रेरणा लेकर कवितायें लिखो मगर उपमायें व बिम्ब विचार स्वयं के हों तो कविता सत्यम शिवम सुंदरम बन जाती है । इसको हम नकल नहीं कह सकते । जैसे कि आदि संस्कृत के कवियों द्वारा बसंत ऋतु का वर्णन हुआ , तत्पश्चात सभी हिंदी कवियों द्वारा भी । और हमारे नेगी श्री ने जब कहा – ‘ माळू ग्वीराळों का बीच ‘ तो उसकी मिठास और उसका सवाद ही कुछ अलग निकला । तो कवितायें अपने लोक के अनुसार लिखी जानी चाहिए ।
कविता प्रकाशन के कई माध्यम हैं । आजकल सोशल मीडिया , फेसबुक,यूट्यूब तो हैं ही जिनके माध्यम से आप अपनी रचनाओं को कम समय में ही विश्व मंच तक पहुंचा सकते हो । पुस्तक प्रकाशन भी प्रकाशन का बढ़िया माध्यम है।
जी , मैंने शासन की प्रेरणा से तो कोई कविता नहीं लिखी है । भविष्य में होगा तो हम बता नहीं सकते हैं ।
हम पुरस्कारों के सहारे जीने वाले कवि नहीं हैं ।माँ सरस्वती की कृपा है कि पुरस्कारों की कोई लालसा नहीं रही । हमारा पुरस्कार तो कवि सम्मेलनों की तालियां व वरिष्ठ कवियों की शाबासियां हैं । एक बात यह है कि
अतीत में मुझे दो पुरस्कार आदित्यराम नवानी पुरस्कार व चन्द्रकुंवर बर्त्वाल पुरस्कार मिले थे । उनको मैं सर आँखों पर लेता हूं उनका आदर करता हूं । कोई गुणवत्ता समझकर दे दे तो वह बात अलग है ।
जी , मैंने भी यू ट्यूब चैनल बनाया था परन्तु वह ठंडा ही पड़ा है। वर्तमान में फेसबुक के माध्यम से साहित्यिक गतिविधि कर रहा हूँ ।
बहुत पहले एक हास्य – व्यंग्य फिल्म ‘गट्टू अर कळजुगी द्यबता ‘ लिखी थी । उसके बाद साहस नहीं जुटा पाया हूँ ।
कवि सम्मेलनों में अनगिनित बार कविता पाठ करता आया हूं । वर्तमान में भी कार्य जारी है।
ऐसा नहीं है। स्कूलों में भी छात्र गढ़वाली कविता वाचन कर रहे हैं । हालांकि यह कार्य कम मात्रा में हो रहा है। परन्तु शुरू तो हुआ है। आपको याद होगा मेरी कविता भैजी की बरात एक प्राइमरी के छात्र ने वायरल की थी।
भविष्य में हास्य -व्यंग्य कविताओं पर ही फोकस है।
पुस्तक छपवाने में सर्वप्रथम धन की समस्या ही आड़े आती है ।
पुस्तक वितरण की बात तो और भी कठिन कार्य है । जैसे – तैसे किसी ने पुस्तक छपवा भी दी तो उसके बाद वितरण की समस्या आड़े आ जाती है।
स्वरचित पुस्तकें अधिकतर ‘सप्रेम भेंट’ ही जाती है । लोग प्रशंसा तो खूब करते हैं परन्तु जब पुस्तक खरीदने की बात हो तो लोग जेब से हाथ खींच लेते हैं । यह हमारे समाज की विडम्बना को दर्शाती है । लोग 500 रुपये में ब्वगठ्या की बांठी तो ले लेंगे परन्तु किताब की बात आयेगी तो अगल – बगल झांकने लगेंगे । यह हमारे भाषा साहित्य का दुर्भाग्य है।
युवा कवियों को सलाह है कि अधिक से अधिक गढ़वाली साहित्य को पढ़ें । अपने लोक को समझें । प्रकृति का अवलोकन करें । छन्दशास्त्र का अध्ययन करें । नये बिम्ब खोजकर कवितायें करें । शॉर्ट कट वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है ।
सीधी – सकळी भाषा मा कविता ह्वा कुछ गैरि ।
छट्ट – छुट्ट उठण्यों बिटै जिकुड़ी कै द्या हैरि ॥
नई बात हवा कविता मा नयु जोश नै प्राण ।
बार- बार फरमैश ह्वा रचनाकार महान ॥
कविता ह्वा यन रस भ्वरीं जन कि नारंगी दाणि ।
भैर बिटै बिगरैलि ह्वा भितर रसीलो पाणि ॥
मैं स्वयं को कविता संसार में दर्जा 1 का विद्यार्थी समझता हूं । गढ़रत्न नरेन्द्र सिंह नेगी और कन्हैयालाल डंडरियाल जी को पढ़कर तो ऐसे ही लगता है। हमें कविता में स्थान की कल्पना नहीं है अपितु अच्छी कविता लिखने की कल्पना जरूर करता हूँ ।
क्या पता है कुछ कह नहीं सकते हैं कि हम किस कैटागिरी में आते हैं । हमको कैटागिरी देने का अधिकार श्रोताओं का है । वही तय करेंगे ।