जानिये गढ़वाली कवि बलबीर राणा ‘अडिग’ जी के बारे में उनकी जुवानी :-
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
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भीष्म कुकरेती – कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये।
गुरूजी पैलाग, प्रणाम आपने एक छोटी कलम को वार्ता के लिए चुना इसके लिए कृतज्ञ हूँ।
गुरूजी मेरी जन्म तिथि – 2 फ़रवरी 1976
माता पिता नाम स्व. श्रीमती लीला देवी राणा, स्व. श्री कलम सिंह राणा।
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – ग्राम ग्वाड़ मटई, मल्ला दशोली, चमोली।
शिक्षा – इंटर तक
आधारिक – ग्रेजुएट
मिडल /हाई स्कूल – मटई
उच्च शिक्षा – मानद ग्रेजुएट
आजीविका – पेंशन
सम्प्रति – गढ़वाल राईफल्स भारतीय सेना
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
उत्तर – गुरूजी अपनी जन्म थाती यानि गढ़वाल का प्राकृतिक वैभव, एवं सैन्य सेवा की विकटता, हिमवंत कवि चंद्र कुंवर सिंह बर्त्वाल की कवितायेँ एवं नरेंद्र सिंह नेगी जी के गीतों ने प्रभावित किया और प्रेरित किया।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी।
उत्तर – गुरूजी ‘श्यामनारायण पांडेय’ की कविता “रण बीच चौकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था” कक्षा 4 में पढ़ी थी और गाई भी थी मंच पर, तब पहले पुरुस्कार के रूप में एक पेन्सिल मिली थी।
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
उत्तर – मेरे पिताजी (आशुकवि) की कविता ‘मि लगो उंदार/नोनू लगो उकाळ/ बुडेन्दा मिल्यूं यो/ मूतौ निवातौ। जिसे वे आम बयान भी करते और उनकी एक डायरी में भी लिखित थी, रिंगाल की कलम से।
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
उत्तर – गुरूजी पैने तीन सौ के आसपास।
भी . कु. – कितने कविता व कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम।
उत्तर – खुदेड़ डंडयाळि, सरहद से अनहद (कविता संग्रह) ” विदै अर हौरि कहानि ( कहानी संग्रह)
12 से ऊपर संयुक्त हिंदी व गढ़वळि काव्य संग्रह।
प्रकाशाधीन -:
गढ़वळि में दो काव्य संग्रह, एक लघु कथा संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक संस्मरण।
हिंदी में एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह। पत्र पत्रिकाओं और विभिन्न ई पोर्टलों पर समयनुकूल रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।
इसके अलावा नाटक, उपन्यास, यात्रा वृतांत, समीक्षा, सतम्भ लेखन आदि सभी साहित्य विधाओं में लिखने प्रयास जारी है।
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
उत्तर – गुरूजी गढ़वली कविता 15 साल से लिख रहा हूँ, और अपनी मातृभाषा से आघाद प्रेम गढ़वाली में लिखने के लिए प्रेरित करता हैं।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों?
उत्तर – गुरूजी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता में भी छायावाद से अभी तक हजारों हिंदी और अन्य भाषी कविताओं ने जिगर को छुआ है लेकिन जहाँ फैसला करने की बात है तो संताली कवियित्री ” निर्मला पुतुल जी की कविता “बाबा मुझे उतनी दूर मत ब्याहना” और
आयरिश कवि विलियम बटलर येट्स की कविता When You Are Old जिगर के बहुत करीब मानता हूँ, निर्मला पुतुल जी की यह कविता मात्र एक आदिवासी नारी की ही वेदना व्यक्त नहीं करती बल्कि भारत के हर ग्रामिण परिवेश की बेटी की वेदना को व्यक्त करती है, जो आजीवन अपने जड़, जंगल, जमीन और परिवार के लिए समर्पित रहती है। साथ ही दुनियां की सबसे वेहतर प्रेम कविताओं में से एक विलियम बटलर येट्स की इस कविता से वेहतर सच्चे प्रेम की परिभाषा और कुछ होगी कह नहीं सकता। जिगर से लगी इन दोनों कविताओं का मैंने गढ़वाली में भी अनुवाद किया है।
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों?
उत्तर – गुरूजी वैसे बहुत सारी गढ़वाली कविताएं मेरे हिया के करीब हैं, जिनका उल्लेख यहाँ पर लम्बा हो जायेगा फिर भी, महाकवि कन्हैय्या लाल जी की कविता ” दादू मि पर्वतों कु वासी “। अद्भुत प्रतीक व कलात्मकता बिम्बों से युक्त इस रचना के भाव, कथ्य एवं बिम्ब दिल को छूते हैं, एक मातृभूमि पिरेमी की कथा व्यथा का ऐसा वर्णन बहुत कम देखने को मिलता है। और इतने ही मार्मिकता से गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी ने इसे गाया भी है।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है।
उत्तर – गुरूजी मेरी कविताओं का मुख्य विषय सामायिक ही होता है, फिर भी अधिकतर वीर रस, देश भक्ति एवं प्रेम को प्रमुखता से देखा जा सकता है। इसका कारण रहा है, जीवन का आधा पखवाड़ा घर परिवार से दूर देश की सरहदों पर रहना।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
उत्तर – गुरूजी इस प्रश्न का उत्तर उपरोक्त ही है।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
उत्तर – जी गुरूजी, गजल मेरे काव्य का प्रमुख हिस्सा रहता है जिसमें सामयिक व्यंग ज्यादा लिखे हैं, साथ में मैंने छन्दों का भी गढ़वाली में काफ़ी प्रयास किया जिसमें दोहा, चौपाई, सोरठा, कुंडलिया, गीतिका, हरिगीतिका आदि छंद हैं ये सभी रचनाएं मेरी आने वाले काव्य संग्रह में संग्रहित हैं। नव गीतों की बात है तो नव गीतों में भी प्रयास किया है।
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
उत्तर – गुरूजी हम सभी जानते हैं समाजिक प्रवृति सदैव ऊर्ध्वगामी रही है, और यह ऊर्ध्वगामी उन्नति पथ जीवन के हर क्षेत्र में रहता है। और इससे एक कवि कैसे अछूता रह सकता है। विशेषकर सामाजिक आंदोलनों में अपने समय की नईं कविताओं व कविता आंदोलन ने महति भूमिका निभाई है, और मेरा मानना है सच्ची आवाज़ हर इन्शान के दिल से निकलती है लेकिन उन आवाजों को जनप्रिय शब्द देते हैं फिर ये शब्द आम समाज को प्रभावित करते हैं ।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
उत्तर – जी बिल्कुल, अपने हिस्से के नएं प्रयोग बहुत किये हैं लेकिन पाठकों पर ये प्रयोग कितने नएं लगेंगे उसे पाठक ही बता पाएंगे, हाहाहा और आज गढ़वाली के पाठक, गढ़वाली लिखने वाले ही हैं।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
उत्तर – गुरूजी इस चरचार जगत में चलते फिरते जहाँ पर भी भाव उठते हैं उसे नोट कर देता हूँ और बाद में जिस भी साहित्य विधा में बैठता है रचता हूँ।
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं व ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
उत्तर – गुरूजी जिसको पढ़ा उसका प्रभाव मन जिगर में पड़ा है, लंबी फेहरिस्त है जिसमें आपकी रचनात्मकता भी शामिल है। और ग्रंथों में गीता।
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
उत्तर – गुरूजी कविताओं के उद्देश्य की बात की जाय तो धरती के सास्वत सत्य को उकेरने की कोसिस रही है, और वह सत्य दूसरे के नजरिये में सास्वत हो यह कहा नहीं जा सकता।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
उत्तर – जी जरूर सफल हुई हैं, बसरते वह आशुकविता क्यों न रही हो।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
उत्तर – गुरूजी चुनौती जरूर आती है जब कभी सामाजिक विद्रूपता पर आवेगा बढ़ता है, फिर ऐसी हालात पर शब्दों को संयम देना सबसे बड़ी चुनौती होती है।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
उत्तर – कुछ अलग नहीं गुरुदेव, जैसे आम वैसे मैं भी कर रहा हूँ। इंटरनेट माध्यम और प्रिंट मिडिया। मैं अपनी कविता सबसे पहले अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करता हूँ फिर अन्यत्र। “अडिग शब्दों का पहरा” मेरा हिंदी ब्लॉग है और “उदंकार” गढ़वाली।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
उत्तर – बिल्कुल रची है गुरूजी, अपनी कलम के माध्यम से वोटर जागरूकता अभियान चलाता रहता हूँ, पिछले विधानसभा चुनाव में जिला चमोली निर्वाचन विभाग द्वारा मेरी कविता का भी प्रकाशन व प्रसारित किया गया था।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
उत्तर – नहीं।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
उत्तर – उत्तर, ऊपर प्रकाशन वाला ही है।
भी . कु – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
उत्तर – गुरूजी जितना यथोचित लगता।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
उत्तर – जी, उपरोक्त लिखित “अडिग शब्दों का पहरा” हिंदी ब्लॉग और “उदंकार” गढ़वाली।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
उत्तर – जी, अडिग शब्दों का पहरा नाम से ही मेरा यू-ट्यूब चैनल है।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
उत्तर – उत्तर उपरोक्त।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
उत्तर – जी गुरूजी कोसिस करता हूँ।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं।
उत्तर – गुरूजी मानवीय यथार्त।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
उत्तर – गुरूजी जो पाठकों के दिल में चस्स और झस्स करा सके।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
उत्तर – जी गुरूजी।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
उत्तर – मातृभाषा महत्व हेतु हमारे शिक्षक गणों को और जागरूक होने की जरुरत है।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युवाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
उत्तर – गुरूजी सवाल बहुत महत्वपूर्ण है, सायद यहीं पर हम फेल भी हैं, हम इंटरनेट पोर्टलों पर पोस्ट करते हैं और समझते हैं कि लोग पढ़ते होंगे जिनमें युवा और बच्चे शामिल, पर आज कॉपी पेस्ट के जमाने में कोई नहीं पढता। मैं इस विषयक व्यक्तगत रूप से बच्चों और युवाओं से आमने-सामने संवाद करता हूँ, और वर्तमान में NCC में बतौर प्रशिक्षक सेवा दे रहा हूँ तो यह कार्य और सुलभ हो रहा है।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
उत्तर – जो धरोहरीय हो सके।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
उत्तर – गुरूजी इसपर ज्यादा विचार नहीं किया फिर भी मुझ जैसे स्तरीय लेखक के लिए किताब प्रकाशन हेतु मद ज्यादा आड़े आता है, मेरे पास 6 से ऊपर किताबों का कन्टेट तैयार है लेकिन प्रकाशन जेब के हिसाब से कर पा रहा हूँ। बाकी बड़े प्रकाशन तक पहुँच हेतु जद्दोजहद जारी है।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
उत्तर – गुरूजी वितरण फ्री करना है तो कोई समस्या नहीं, और इसके लिए विद्यालय सबसे अच्छा माध्यम है, विद्यालयों में पहुँच गयी तो बच्चों व उनके घरों तक पहुँच ही जाती है।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
उत्तर – गुरूजी सलाह यही है कि रिपीट नहीं नवाचार की और बढ़ना है और नवाचार भी जो समाज सम्मत।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
उत्तर – जी गुरूजी उत्तर उपरोक्त लिखित है, लगभग सभी विधाओं में प्रयास जारी है।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
उत्तर – गुरूजी परामर्श यही है कि जल्दी प्रसिद्धि के पीछे नहीं भागना है, अगर आपके लेखन में दम है तो प्रसिद्धि एक दिन जरूर मिलेगी, लेखन चाहे किसी भी भाषा में हो।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है।
उत्तर – हा..ह्अहा, गुरूजी इस सवाल का जबाब मेरे पास नहीं है , खुद को खुद से पीठाईं लगाना नहीं सुहाता है।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
उत्तर – ये सवाल भी अनुत्तरित ही रहेगा गुरूजी मेरे लिए, अपने विशुद्ध लोक को उसके विशुद्ध रूप में उकरने का प्रयास करता हूँ बाकी जग कैसे याद रखे वह भविष्य के गर्व में है