भीष्म कुकरेती
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मुम्बई म गढवाली रंगमंच बिना स्वर्गीय दिनेश भारद्वाज का सोचा ही जा सकता। दिनेश भारद्वाज जब लगभग 60 में मुंबई आये तो मुंबई में गढ़वाली रंगमंच (सांस्कृतिक कार्यक्रम भी ) निम्न समस्याओं से ग्रस्त था
रंगमंच या नाटक रामलीलाओं तक सीमित थे। यद्यपि ५० के दशक में जीत सिंह नेगी जी ने सन १९५२ में दामोदर हाल में भारी भूल नाटक का मंचन करना शुरू कर दिया था व यह नाटक एक हिट नाटक था। फिर भी मुंबई में नाट्य मंचन की संस्कृति न पंप स्की . ांस्कृतिक कार्यकर्मों में गीत संगीत व भाषण
हाँ रामलीला का मंचन उत्तराखंडी प्रवासियों द्वारा ११९५८ से शुरू हो चुका था।
रंगमंच संस्कृति न होने से गढ़वाली नाटक मंचनमें सर्वथा रिक्तता थी। इस रिक्तता को भरा स्वर्गीय दिनेश भारद्वाज ने।
दिनेश जन्म एक अक्टूबर १९३८ को खतैनी गाँव पट्टी बदलपुर , पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। है स्कूल के उपरान्त दिनेश भारद्वाज मुंबई आ गए जहाँ न्यू इण्डिया इन्सुरेंस में वे हिंदी विभाग में नौकरी करने लगे। रचनाधर्मिता उनके मन में थी ही। वे रामलीलाओं में उद्घोषक व अभिनव करने लगे। साथ में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उद्घोषणा करने लगे। मुंबई में उत्तराखंड प्रवासियों के मध्य कार्यक्रमों में वे जमे हुए उद्घोषक माने जाते थे।
तब सबसे बड़ी समस्या थी कि प्रवासी गढ़वाली सामजिक संस्थाओं के कार्य कर्मों का अर्थ केवल नाच गान ही समझते थे। नाटक देखने व नाटक पर वयवय करना गढ़वाली समाज में अनसुना था तो रीता रीता वातावरण।
दिनेश भारद्वाज शांताक्रूज व जोगेश्वरी रामलीला में पाठ खेलते थे। परुशराम पात्र अभिनय से दिनेश भारद्वाज को प्रसिद्धि मिली। जोगेश्वरी रामलीला में उन्होंने रावण का अभिनय भी किया व सराहना प्राप्त की।
फिर ७० के दशक अर्ध या अंत में गढ़वाल भ्रातृ मंडल ने एक कला शाखा का श्रीगणेश किया जिसमे सांस्कृतिक कार्यक्रमों व नाटक हेतु कलाकार तैयार हों। इसी समय गढ़वाल भ्रातृ मंडल के अंतर्गत छात्र संघ भी बना। दिनेश भारद्वाज को नाटक क्षेत्र में आने को प्रवेश मिल गया। साथ में उन्हें स्वर्गीय उम्मीद सिंह बिष्ट व स्वर्गीय भुवनेश जुयाल जी का भी सानिध्य मिल गया
सबसे पहले दिनेश भारद्वाज के निर्देशन व संयोजन में लिट् मोहन थपलियाल रचित नाटक ‘ एकीकरण ‘ का मंचन हुआ। नाटक की कथा स्वार्थी प्रवासी संस्थाओं से संबंधित थी तो ‘एकीकरण ‘ दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने में सफल हो गया।
दिनेश भारद्वाज ने कला संघ के साथ छोटे छोटे स्किट रचे रेयर भी किये व सांस्कृतिक कार्कर्मों में स्किट मंचित किये।
कुछ वर्षों बाद ‘ललित मोहन थपलियाल रचित ‘खाडू लापता का मंचन मुंबई में हुआ जिसके निर्देश दिनेश भारद्वाज थे व पंडित जी का पात्र अभिनय दिनेश भारद्वाज ने भुमका ऐडा की / दर्शकों ने इस नाटक को भी सराहा।
फिर रमन मोहन कुकरेती व दिनेश भारद्वाज ने एक हास्य व्यंग्य गढ़वाली नाटक लिखा ‘बुड्या लापता ‘ व इस नाटक का मंचन किया जो हिट नाटक माना गया था।
स्वर्गीय स्वरूप ढौंडियाल के दो नाटक मंगतू बौळ्या, और अदालत नाटक में दिनेश भारद्वाज कई प्रकार की सहायता स्वरूप ढौंडियाल को दी , जब मालू शाही व स्वरूप ढौंडियाल के ट्रूप द्वारा ‘खाडू लापता ‘ का मंचन हुआ तो उन्होंने बौद्धिक सहयता दी।
जोगेश्वरी में गढ़वाली कला केंद्र संस्था के बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे पूरी तरह जुड़े थे ,
मुंबई में इसी समय दो तीन अन्य रंगमंच संस्थाए भी नाट्य मंचन में संलग्न थीं जैसे बलदेव राणा का पर्वतीय नाट्य संस्था , विशाल मणि जी की संस्था , सोनू गुसाईं , रंगीला जी , हरीश थपलियाल जी आदि सक्रिय रहे।
सन १९९० तक दिनेश भारद्वाज गढ़वाली रंगमंच से जुड़े रहे किन्तु १९९० के बाद नाटक मंचन में कई समस्याएं आने लगी विशेषतर पैसे की तंगी व कलाकारों के न मिलना।
धीरे -धीरे गढ़वाली रंगमंच सुख गया।
दिनेश भारद्वाज का योगदान सदा ही गढवाली नाटक में भूमिका अदा करना , निर्देशन करना व नाटक लिखने में गढवाली नाट्य विकास में याद किया जाएगा
उनका निधन २७ मार्च २००६ को ुंबई में हुआ। आज भी मुंबई गढ़वाली रंगमंच उनके बिना खाली खाली है।