गढ़वाळौ पारम्परिक भोजन
Bhishma Kukreti
सयेली गढ़कुमाऊं क एक अभिनव रिवाज च . पहाडू मा आज की अमीरी मा बि बगैर सहयोग, सहकारिता क क्वी बि एक दिन नि रै सकद . सयेली सहकारिता अर सहयोग की मिसाल च
बरखौं टैम फर (बरसात में ) धाण (निराई गुडाई ) एक जरोरात हुन्द त पहाडूं मा एक साथ कैक इक दस पन्दरा लोग धाण करदन अर ये रिवाज तैं सयेली बोले जांद .
जन की मै तैं अपण कुदड़ (मंडूये के खेत ) का दस पन्दरा फान्गुन मा इक्छुटी धाण कराण होऊ त मि दस बार जननो अर मर्दुन तैं धनकुर ( Labour Barter system for farming or agricultural work or other works) कुणि बुलौलू अर फिर सौब एक साथ धाण करदन . दगड़ अम एक दौन्र्य या थ्कुल्या बि बुलाये जांद जू जागर लगाणु रौंद अर याँ से सौब आनन्द ह्वेक धाण करणा रौंदन . याँ से काम बि जल्दी होंदी अर लोगूँ मनोरंजन बि होंद . धनकुर वापस करे जांद (Returning of Labour days)
हाँ जब ध्न्कुर्यौं तैं पल़ेक (थक ) लगी जांद त सुखा बुखण/खाजा बँटे जांद
सुखो बुखण माने भुज्युं अनाज या दाळ . भुज्याँ बुखण मा भुज्याँ भांग, तिल अर गुड़ अखोड़ बि डाले जांद .
साधारणतया सुखो या भुज्या बुखण क अनाज यी छन
१- भट्ट
२- मुंगरी
३- ग्युं
४- जुंडळ
५- मर्सू
कबी कबार झन्ग्र्याळ अर कौण्याळ बि प्रयोग होंद