जानिए गढ़वाली कवि श्री नवीन डिमरी ‘बादल’ जी से उनके कवित्व पर उनकी जुबानी (भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता-लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती- कृपया अपने बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये-
जन्म तिथि – आदरणीय कुकरेती जी, मेरी जन्म तिथि 15 जनवरी सन 1970 है।
माता पिता का नाम- मेरी माता जी का नाम श्रीमती सरस्वती देवी व पिताजी का नाम स्व. श्री रामेश्वर प्रसाद डिमरी है।
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है- मेरा जन्म उत्तराखंड के चमोली जिले में एक छोटे से गाँव कोलाडुँगरी में हुआ था, यह गाँव, कर्णप्रयाग के निकट है।
शिक्षा- मेरी कक्षा आठवीं तक की शिक्षा गांँव के ही पूर्व माध्यमिक विद्यालय में हुई, उसके बाद सन् 1982 में, मैं बड़े भाई श्री बंशीधर डिमरी जी के साथ गोपेश्वर चला गया। वहाँ श्री1008 गीता स्वामी राजकीय इंटर कॉलेज गोपेश्वर से मैंने सन् 1984 में हाईस्कूल व सन् 1986 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उतीर्ण की, तत्पश्चात् 1988 में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय गोपेश्वर से बी.कॉम. किया। सन् 1992 में राजकीय दीक्षा विद्यालय गौचर से बी.टी.सी. उत्तीर्ण की और 1993 में सरकारी शिक्षक के रूप में नियुक्त हुआ।
नियुक्ति के बाद भी मैंने पढ़ाई जारी रखी, 1995 में एम. काम. व 1997 में एम. ए. हिंदी से उत्तीर्ण किया।
आजीविका- मेरे परिवार की आजीविका का साधन मात्र मेरा शिक्षण कर्म ही है।
सम्प्रति- वर्तमान में, मैं सरकारी जूनियर हाईस्कूल में सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूंँ। शिक्षण कार्य करते हुए मुझे 33 वाँ वर्ष चल रहा है।
भीष्म कुकरेती- बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया बताएँ?
उत्तर- मैं बचपन से ही बड़े भाई साहब श्री बंशीधर डिमरी जी के साथ गोपेश्वर में रहा, बड़े भाई साहित्य व संगीत के बड़े प्रेमी व मर्मज्ञ थे। कविताएंँ भी खूब लिखते थे। उनकी मित्र मंडली में श्री नंदकिशोर हटवाल जैसे मित्र थे। हमारे कमरे का वातावरण सदैव साहित्य व संगीतमय रहता था।
कक्षा आठवीं तक की शिक्षा मैंने मांँ के साथ रहकर गाँव में पूरी की, माँ अपने समय की पढी-लिखी महिला थी। हम सभी भाई-बहनों को कविताएंँ व कहानियांँ सुनाया करती थी। अतः इन सभी वातावरणों का प्रभाव मेरे जीवन पर पड़ा और धीरे-धीरे मुझे भी कविताएँ पढने-लिखने का शौक हो गया। मेरी पहली कविता जब मैं 19 वर्ष का था ‘नंदप्रयाग’ से छपने वाले साप्ताहिक पत्र ‘देवभूमि’ में छपी थी। इस कविता का शीर्षक ‘गढ़ की यश गाथा’ था।
भी. कु.- पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
उत्तर- पहली हिंदी कविता तो कक्षा एक की पुस्तक में ही पढी थी–
“लाठी लेकर भालू आया
छम-छम, छम-छम, छम,
ढोल बजाता मेंढक आया
ढम-ढम, ढम-ढम, ढम।
मेढक ने ली मीठी तान,
और गधे ने गाया गान।”
भी. कु.- सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
उत्तर- जब मैं इंटरमीडिएट में पढ़ता था तब गोपेश्वर में एक साहित्यिक संस्था थी ‘प्रयास’, यह संस्था ‘प्रयास’ नाम से एक हस्तलिखित पत्रिका भी निकालती थी, इसका संकलन, संयोजन व चित्रांकन चर्चित चित्रकार श्री बी मोहन नेगी जी किया करते थे। उसमें श्री अबोध बंधु बहुगुणा, श्री कन्हैया लाल डंडरियाल, श्री नरेंद्र सिंह नेगी, श्री भीष्म कुकरेती, श्री भजन सिंह ‘सिंह’, श्री तारा दत्त गैरोला जैसे महान साहित्यकारों की रचनाएँ भी पढ़ने को मिलती थीं। जहांँ तक सबसे पहली गढ़वाली रचना से साक्षात्कार का प्रश्न है तो मैंने सबसे पहले 1989 में अपने मित्र श्री बडोनी जी के घर पुलिस लाइन गोपेश्वर में श्री जीवानंद श्रीयाल जी की कविताओं की एक कैसिड सुनी थी, यह श्री जीवानन्द श्रीयाल जी के ही स्वरों में रिकॉर्ड की गयीं थीं। बहुत अच्छी लगीं।
भी. कु.- अब तक कितनी गढ़वाली कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
नवीन डिमरी – गढ़वाली में मेरी अब तक लगभग 45-50 रचनाएंँ ही विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। सन् 2006 से मैं उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा की पुस्तकों के लेखन से जुड़ा तब से मेरा साहित्य बाल केंद्रित हो गया और मैं बच्चों के लिए ही लिखने लगा जिस कारण गढ़वाली साहित्य लेखन आगे न बढा सका। लेकिन अब पुनः गढवाली में लेखन हेतु प्रयासरत हूँ।
भी. कु.- कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
नवीन डिमरी – मेरे तीन बाल कविता संग्रह हैं
जिनके नाम इस प्रकार हैं-
1- बालमन की सतरंगी कविताएँ।
2- टॉफी का एक पेड़ लगा दो।
3- दादाजी की मूूँछ निराली
भी. कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
नवीन डिमरी – मैैं गढ़वाली कविताएँ सन् 1989 से लिख रहा हूंँ। मुझे पुरानी रचनाओं, ‘बाटा गोडाई’ जैसे गीतों और नरेंद्र सिंह नेगी जी के गीतों ने खूब प्रभावित किया है।
भी. कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
नवीन डिमरी – “जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए!” मेरी गैर गढवाली पसंदीदा कविता है। यह प्रसिद्ध कवि श्री गोपाल दास नीरज जी की रचना है इसे हम स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे मौकौं पर प्रयाणगीत के रूप में खूब गाते थे।
भी. कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
उत्तर- मेरी पसंदीदा गढ़वाली कविताओं में श्री अबोध बंधु बहुगुणा जी की कविता ‘घोल’ भी है जिसमें श्री बहुगुणा जी कहते हैं-
“फुर्र-फुर्र उडै की आयाँ हम,
अयां यख चारो टिपणौ छा
पर, यखाs लम्बा लहरों मा
यख, दूर- इथगा दूर
उड़ाडैं रौड मा ब्यलमे गयाँ!”
यह कविता मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि इसमें प्रतीक और बिंब बहुत
गजब का है।
भी. कु.- आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है?
उत्तर- मेरी गढवाली कविताओं का मुख्य विषय सामाज की पीड़ा और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार है।
भी. कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
नवीन डिमरी – यह तो पाठक ही बता सकते हैं।
भी. कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
नवीन डिमरी – जी हाँ, मैंने कुछ गढ़वाली गजलें भी लिखी हैं, जिनमें से कुछ प्रकाशित भी हैं।
भी. कु.- नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है?
नवीन डिमरी – साहित्यकार को चाहिए कि वह देश,काल और परिस्थिति के अनुसार रचनाओं का सृजन करें। जहांँ तक नई कविताओं का सवाल है तो हमें वक्त और समाज की मांँग के अनुसार ही रचनाएँ लिखनी चाहिए तभी साहित्य की सार्थकता है।
भी. कु.- नए प्रयोग करते हैं ?
नवीन डिमरी – जी हांँ, गढ़वाली में गजल विधा का सृजन भी तो एक नव प्रयोग ही है।
भी. कु.- आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
नवीन डिमरी – दिमाग में किसी रचना के उत्पन्न होते ही मैं उसे सबसे पहले कागज पर ज्यूँ का त्यूँ लिख लेता हूँ। फिर पढकर उसकी तरलता (प्रवाह) जाँँचता हूँ, शब्दों का भाव व वजन देखता हूँ, प्रवाह की अटक व व्याकरणीय त्रुुुटियों का निराकरण करता हूँ, विस्तार पर भी ध्यान देता हूँ।
भी. कु.- आप किन-किन लेखकों, कविताओं, ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
नवीन डिमरी – मैं गढवाली भाषा के लगभग सभी पुराने साहित्यकारों से प्रभावित हूंँ उनमें से आप भी एक हैं। आपकी रचना धर्मिता को भी मैं नमन करता हूंँ। सोचता हूंँ इस उम्र में भी आप इतने जीवट और क्रियाशील हैं! क्या हम आपकी तरह इस समाज को कुछ दे पाएंगे!
भी. कु- आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
नवीन डिमरी – हर किसी साहित्यकार का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ पाठकों को अच्छी दिशा देना भी रहता है साथ ही उनके के उज्जवल भविष्य की कामना भी।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएंँ समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
नवीन डिमरी – बहुत कम, इसका मुख्य कारण यह है कि गढवाली पढने और समझने में लोगों को कठिनाई आती है, अक्षर मिला-मिला कर पढना एक झंझट लगता है। जब लोग पढेंगे ही नहीं तो प्रभावित भी कहाँ से होंगे!
भी. कु.- क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
नवीन डिमरी – नहीं, अभी तक तो नहीं।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
नवीन डिमरी – पत्र- पत्रिकाओं को प्रकाशनार्थ ईमेल या पोस्ट औफिस के माध्यम से रचनाएँ प्रेषित करना एवं अपनी स्वयं की पुस्तकें प्रकाशित करवाना,
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
नवीन डिमरी – जी नहीं, ऐसा मौका अभी तक तो नहीं आया लेकिन यदि भविष्य में किसी विभाग या संस्था जैसे ‘चुनाव आयोग’ या ‘आपदा प्रबंधन’ द्वारा मुझसे कोई अपेक्षा की जाती है तो मैं उनकी अपेक्षाओं पर अपनी रचनाओं द्वारा खरा उतरने का प्रयास कर सकता हूँ।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
नवीन डिमरी – जी नहीं, किसी पुरुष्कार या सम्मान को लक्ष्य बनाकर अभी तक कोई रचना नहीं लिखी है।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए क्या करते हैं?
नवीन डिमरी – पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों, एवं समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाता हूँ कर या फेसबुक, यूट्यूब एवं व्हाट्सएप जैसे मध्यमो का भी प्रयोग करता हूँ।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
नवीन डिमरी – जी करता हूंँ, लेकिन कभी-कभी।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
नवीन डिमरी – जी ब्लॉक तो है लेकिन उस पर काम नहीं कर पाता हूँ.।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
नवीन डिमरी – जी यूट्यूब में भी कुछ गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हैं।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
नवीन डिमरी – जी हाँँ, यूट्यूब चैनल है लेकिन उसमें भी विभागीय कार्यों की अधिकता के कारण समय नहीं दे पाता हूँ।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
नवीन डिमरी – जी अभी तक तो नहीं।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
नवीन डिमरी – मेरी कविताओं में भाव, भाषा, प्रतीक और विषय तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं।
भी. कु.- आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
उत्तर- भाषा की सरलता, भावार्थ की सहजता, छंद व लय बद्थता, एवं उद्देश्य परकता यह किसी भी कविता के महत्वपूर्ण गुण हैं।
भी. कु.- कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
नवीन डिमरी – जी पहले मंचों में बहुत कविता पाठ किया है। लेकिन विगत कुछ वर्षों से मंच को समय नहीं दे पाता हूँ।
भी. कु.- क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन, व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पाता ?
नवीन डिमरी – इसके पीछे बच्चों का सामाजिक परिवेश जिम्मेदार है। लोग गांँवों में भी अब बच्चों से हिन्दी में वार्तालाप करते हैं जिस कारण बच्चे गढ़वाली भाषा समझ तो लेते हैं लेकिन बोल नहीं पाते। जब तक स्पष्ट उच्चारण नहीं होगा तो बच्चे न कविता ही अच्छे से बोल पाएँगे और नाटकों के संवाद।
भी. कु.- आप अपनी कविताओं को बालिकाओं-बालकों व युवती-युवाओं तक पहुँचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
उत्तर- मेरी ताकत पत्र-पत्रिकाएँ और मेरी पुस्तकें ही हैं। जन-जन तक पैठ बनाने के लिए कभी-कभी फेसबुक और व्हाट्सएप से भी रचनाएं प्रेषित करता हूंँ।
भी . कु.- आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
उत्तर- एक कवि एवं लेखक का कर्म केवल अपने साहित्य से लोगों का मनोरंजन करना ही नहीं है बल्कि समाज व सरकार की कमियांँ उजागर करना और उन्हें दिशा देना भी है। मैं भविष्य में समाज को दिशा देने वाली रचनाएं लिखना चाहता हूँ।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
नवीन डिमरी – आज समाज का चरित्र बदल गया है लोग हजार-दो हजार रुपए एक बोतल शराब पर तो आसानी से खर्च करने को तैयार हो जाते हैं लेकिन दो सौ रुपये की एक अच्छी सी किताब खरीदने के लिए आना-कानी करने लगते हैं यह सब देखकर पुस्तक प्रकाशित करने का मन ही नहीं होता।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
नवीन डिमरी – ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तक वितरण की समस्या का समाधान ग्राम पंचायत स्तर पर पुस्तकालय की व्यवस्था होनी चाहिए। या मोबाइल पुस्तकालय भी होने चाहिए ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी आसानी से पुस्तकें पहुंचाई जा सकें।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
नवीन डिमरी – पढ़िए खूब, लिखिए कम।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
नवीन डिमरी – जी हांँ, मैंने 20-21 वर्ष की अवस्था में एक उपन्यास जिसका नाम ‘तपन’ रखा था, लिखकर पूरा किया। सन 1992 से 2000 तक कई यात्रा वृतांत भी लिखे। मैंने अपनी पहली-पहली नौकरी के दौरान घटी घटनाओं को भी संस्मरण के रूप में लिखा है। उनमें से एक संस्मरण ‘वह स्याह रात’ जो 1995-96 में उत्तराखंड की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘युगवाणी’ में प्रकाशित हुआ था, पाठकों द्वारा खूब सराहा गया।
भी . कु. – युवाओं को गढ़वाली कविता के क्षेत्र में आने हेतु क्या परामर्श है ?
नवीन डिमरी – भाषा संरक्षण के लिए यह अति आवश्यक है कि युवा अपनी बोली- भाषाओं से जुड़े, व्यवहार में लाएंँ और साहित्य रचें!
भीष्म कुकरेती- आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
नवीन डिमरी – जी अभी तो मेरी हैसियत गढ़वाली साहित्यकारों के सामने एक कण के बराबर भी नहीं है लेकिन मैं ऊँचा उठने के लिए सदैव प्रयासरत रहता हूँ, चाहता हूँ कि लोग मुझे भी पहचानें।
भीष्म- आपको किस प्रकार के कवि के रूप में याद किया जाएगा ?
उत्तर- आदरणीय कुकरेती जी मेरा लेखन गंभीर ही रहा है मैंने मंचों पर भी कभी चुटकुले जैसी रचनाएँ नहीं पढीं, एक रचना को कभी दूसरी बार भी मंच पर नहीं पढा। मैंने अपनी रचनाओं में सम सामयिक विषयों और सामाजिक विमर्शों को ही वरीयता दी है। अब यह पाठक पर निर्भर करता है कि वह मुझे किस श्रेणी में पाता है।