(जानिए गढवाली कथाकार को उनकी जुबानी श्रृंखला में मनोज भट्ट’गढ़वळि’ जी को )
गढवाली के प्रसिद्ध कहानीकार मनोज भट्ट’गढ़वळि’ का कथा संसार
(भीष्म कुकरेती से लिखाभेंट )
संक्षिप्त परिचय
नाम – मनोज भट्ट’गढ़वळि’
जन्म तिथि -14/04/1974
शिक्षा – बी0एससी0, एम0ए0 ( अंग्रेजी, इतिहास )
आजीविका – ग्राम विकास अधिकारी, पौड़ी गढ़वाल |
कहानी संख्या प्रकाशित (इंटरनेट माध्यम सहित ) – लगभग 37
कहानी संग्रह प्रकाशित – दो
भीष्म कुकरेती- लेखन की शुरुआत और प्रेरणा कहां से मिली ?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- असल में जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि दिल्ली में रहते हुए बड़े भैजी जो उस समय में लेखन कार्य करते थे की रचनाएं जब पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई तो प्रेरणा मिली कि मुझे भी लिखना चाहिए |
भीष्म कुकरेती- आपने लिखना कब और कैसे शुरू किया? क्या कोई खास घटना थी जिसने आपको प्रेरित किया?-
मनोज भट्ट’गढ़वळि’ – शुरू शुरू में छुप छुप के शौकिया तौर पर लिखना प्रारम्भ किया | क्योंकि पढ़ाई लिखाई की उम्र में इस तरह के शौक को किसके घर वाले समर्थन करते खैर…! लगभग 1988 – 1989 में 8 कहानियों का एक संग्रह भी रचा | हालांकि वह संग्रह तो समय के गर्त में खो गया लेकिन लिखने का शौक कहीं न कहीं जिंदा रहा |
इस बीच दिल्ली से देहरादून तक का पड़ाव आया ओर स्कूली जीवन से कालेज लाइफ में पहुंच गए तब तक डायरी लिखने की आदत भी बन गई थी | इस बीच कहानियां तो नहीं लिखी गई पर डायरी में कविताओं के रूप में भाव जुड़ने लगे थे जो फिर कुछ कुछ समय के अवरोधों के साथ चलता रहा | 2006 में पहली बार ‘संतवार्ता’ से कविता प्रकाशन की शुरुआत हुई तो 2012 – 13 में कथा कहानियों का दौर शुरू हुआ जो पहले 2020 में ‘घेरा’ कथा संग्रह के रूप में सामने आया | और फिर 2022 में गढ़वाली भाषा में लोक कथाओं की पहली किताब ‘कथा काणी रात ब्याणी’ के रूप में सामने आई |
भीष्म कुकरेती- आपकी कहानियों के मुख्य विषय (जैसे ग्रामीण जीवन, सामाजिक मुद्दे) कहाँ से आते हैं?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’ – मेरी कहानियों के मुख्य विषय ग्रामीण जन सरोकारों से जुड़े हर वो मुद्दे हैं जो पहाड़ों में घटित होता है, इनमें आपको यहां की महिलाओं के संघर्ष, उनके दुःख, पीड़ा, तकलीफ, से लेके शराब जैसे सामजिक बुराई के दुष्परिणाम , जाति पांति जैसे सामाजिक बुराई, हमारे परम्परागत मेले, त्योहार व रीतिरिवाजों को शामिल किया गया है तो दूसरी तरफ हमारे समाज में यत्र तत्र विखरी हुई बालमन से लेके बड़ों तक को जीवन जीने का सन्देश देती लोक कथाओं को इकट्ठा कर मनोरंजन के साथ नैतिकता को बढ़ावा दिया है |
भीष्म कुकरेती- आपके पसंदीदा लेखक कौन हैं और उन्होंने आपको कैसे प्रभावित किया?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- मैंने जितना पढ़ा है उनमें प्रेमचन्द की सादगी और मार्मिकता, जयशंकर प्रसाद की अभिब्यक्ति का तरीका यशपाल की स्पष्टवादिता ने मुझे काफी प्रेरित किया |
लेखन प्रक्रिया और शैली:-
भीष्म कुकरेती- आप अपनी कहानियों के लिए रिसर्च कैसे करते हैं?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’ – समाज में घटित हो रही घटनाएं इसके लिए कभी कच्चे उत्पाद और कभी उर्वरता का काम करती हैं | हर पल दिखती विषंगति इस ओर लिखने को प्रेरित करती है |
भीष्म कुकरेती- आपकी लेखन प्रक्रिया क्या है – क्या आप योजना बनाते हैं या लिखते हुए सोचते हैं?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- हां, किसी घटना के चारों ओर एक ताना बाना तो बुनना ही पड़ता है | कुछ पहले से होता है कुछ लिखते हुए आता है |
भीष्म कुकरेती- आपकी लेखन शैली (जैसे यथार्थवादी, व्यंग्यात्मक) कैसे विकसित हुई?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- कथा कहानियों में तो ज्यादातर यथार्थ ही होता है जिसमें कभी कभी व्यंग्य का पुट सम्मलित होता है | जबकि लोक कथाएं काल्पनिकता प्रधान होते हैं | जिनको लेखन से एक स्वीकार्य रूप दिया जाता है |
कथाकार के रूप में चुनौतियाँ:-
भीष्म कुकरेती- एक लेखक के रूप में आपको किन सबसे बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’ – कथा कहानियों का ‘प्लाट’ हमेशा एक चुनौती भरा कार्य रहता है क्योंकि इसी पर आपकी कहानी का दारोमदार टिका रहता है | उसके बाद ही चरित्र चित्रण, भाषा शैली और संवाद आते हैं |
भीष्म कुकरेती- क्या आपको कभी लगता है कि आपकी कहानियों की गलत व्याख्या की गई है?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- ऐसा तो नहीं लगा लेकिन हां यह होता है, लेकिन यह अधिकांशतः व्यक्ति तक सीमित रहता है |
भीष्म कुकरेती- आप अपनी कला में ‘सच्चाई’ और ‘कल्पना’ को कैसे संतुलित करते हैं?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- किसी भी कहानी में ताना बाना का कार्य यही दो चीजें करती हैं | भाव व चित्रण प्रकट करने के लिए आप अपनी कल्पना के घोड़े जितना उड़ा सकते हैं उड़ाइये, उससे कहानी में निखार ही आएगा |
करियर और जीवन:-
भीष्म कुकरेती- क्या आपकी पत्नी/परिवार का आपके काम पर कोई प्रभाव रहा है?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- नहीं, सरकारी सेवा में होने के कारण पत्नी के पास समयाभाव रहता है | बच्चे अपने कामों में व्यस्त हैं | मैं अपने साहित्यिक काम स्वयं तक ही सीमित रखता हूं, हां कई बार जब उनके हिस्से का समय साहित्यिक कार्य में लग जाता है तो परिवार के सदस्यों को कभी कभी अखरता है, जो वाजिब भी है |
भीष्म कुकरेती- आप अपने जीवन और काम के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- बस सभी चीजों को साधना पड़ता है एक दूसरे से तालमेल बिठाते हुए मार्ग स्वयं ही बन जाता है |
भीष्म कुकरेती- आप सफलता और पहचान को कैसे देखते हैं :
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- सबसे पहले तो आपको देखना पड़ेगा कि आप किसके लिए कार्य कर रहे है पहचान और सफलता के लिए या समाज के लिए | अगर आप सच्चे मन से कार्य कर रहे हैं तो एक न एक दिन समाज आपके कार्य को जरूर नोटिस करता है और फिर उसी कार्य से आपको पहचान भी मिल सकती है |
युवा कथाकारों को सलाह-
भीष्म कुकरेती- नए लेखकों को आप क्या सलाह देंगे जो अपनी पहचान बनाना चाहते हैं?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- यही कि अपनी बोली भाषा के उत्थान के लिए आगे आएं इसका अपने दैनिक जीवन में ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें साथ ही अधिक से अधिक साहित्य रच कर अपनी भाषा का मान बढ़ाएं…|
भीष्म कुकरेती- क्या आपको लगता है कि आज के दौर में कहानी कहने का तरीका बदल रहा है ?
मनोज भट्ट’गढ़वळि’- मुझे लगता है, आज के AI के जमाने में हर तकनीक का प्रयोग हो रहा है, इसमें कोई बुराई भी नहीं है | समय के साथ चलने में ही भलाई है …|