अंग्रेजी , गढ़वाली हिंदी के लेख भीष्म कुकरेती ने कई विधाओं में लिखा है जैसे – व्यंग्य , कहानी , साहित्य इतिहास , उत्तराखंड इतिहास , पादप इतिहास, पर्यटन इतिहास , भवन कला आदि। भीष्म कुकरेती ने नाटक भी लिखे व प्रकाशित किये। इसी प्रकाशन संस्थान से भीष्म कुकरेती के मौलिक लघु नाटक संग्रह ‘ मूसी पुनः मूसी भव:’ प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने २५ से अधिक विदेशी भाषाओं के नाटकों का भी रूपांतर किया है। इसी प्रकाशनगृह से में उनका ‘शेक्शपियर कृत ‘ जूलियट सीजर व अन्य नाटक ‘ रूपांतरित नाट्य संग्रह भी प्रकाशाधीन है।
प्रस्तुत पुस्तक गढ़वाली गद्य संसार हेतु एक यादगार नाटक है।
लेख अनुसार यह नाटक सन 1985 के लगभग लिखा गया था व सन 2005 में रन्त रैबार से श्रृंखलाबद्ध प्रकाशित हो चूका है। मुझे अति प्रसन्नता है कि इस नाटक को मैं प्रकाशित कर रहा हूँ व गर्व अनुभव क्र रहा हूँ।
गढ़वाली में आधुनिक नाटकों की शुरुवात ही राजनैतिक -प्रशासकीय व्यंग्य नाटक ( भवानी दत्त थपलियाल कृत भक्त प्रह्लाद , १९१३ ) से हुयी व तब से अब तक कई चर्चित व्यंग्यात्मक गढ़वाली नाटक प्रकाशित हो चुके हैं या मंचित हुए हैं। कई नाटक गढ़वाली में व्यंग्य नाटक हैं। भीष्म कुकरेती के बखरूं ग्वेर ‘ नाटक संग्रह में भी तीन नाटक व्यंग्य नाटक व अन्य लघु हास्य नाटक हैं।
जी हाँ नेहरू की विरासत ध्वस्त की जा रही है ‘ नाटक में पात्र श्रीमद भागवत रचयिता व प्रचारक हैं जो वैदिक देव राजा इंद्र की छवि धूमिल कर देवताओं के ईश्वर गद्दी पर भगवान विष्णु को बिठाया। नाटक वार्ता में ही है व आज के संदर्भ कि भाजपा किस प्रकार नेहरू की छवि को धूमिल कर रही है जैसे कि म्महाभारत युग में व्यास मुनि ने देवराज इंद्र की छवि को धूमिल किया व विष्णु को देव सम्राट बनाया।
जी हाँ नेहरू की विरासत ध्वस्त की जा रही है ‘ नाटक में पात्र तो पौराणिक हैं किंतु गढ़वाली हैं व रोचक हैं। पूरा नाटक रोचक , है व आज की परिश्थिति दर्शाने में सफल है कि किस तरह गलाकाट राजनैतिक प्रतियोगिता में कैसे कैसे खंड खेले जाते हैं ।
बखरुं ग्वेर स्याळ ‘ नाटक तो तीखा राजनैतिक नाटक है। नाटक का विषय है कि किस प्रकार आजकल के राजनीतिज्ञ सार्वजनिक संसधन को अपनी विशिष्ठ छवि निर्माण में झोक देते हैं व जनता को मिलता है चुसणा चूसने (अंगूठा ) को.
कम पात्र हैं किन्तु संवाद अति तीखे व पाठक को क्रोध दिलाने में सक्षम हैं कि किस प्रकार राजनैतिज्ञ जनता को मूर्ख बना रहे हैं।
एक वार्ता का उदाहरण
एक जनानी आवाज – ए जी यु नौन भूखान रुणु च क्या कन ?
दूसरी आवाज (कुणकुणाट ) तैक हथम खिल्वणि पकड़ै दे।
वै पुराणी आवाज – ठीक च नौन बौगे जाल
XXX
नौन -बाबा मीन गणित का सवाल करणान
मर्दानी आवाज – चुप्प बै ! सवाल करण … स्युः छूट भुला त्यार नाना न पकड़न ? बड़ो आयी गणित का सवाल करण वळ ….
पूरे नाटक में जनता की मांग की जगह राजनीतिज्ञों की स्वार्थ पूर्ति व क्रूर राजनैतिक उठा पटक दिखाई गयी है।
अंत में पाठकों से प्रश्न भी पूछा गया है।
भाषा सरल व सामान्य गढ़वाली की समझ में आने वाली भाषा है। विनय निर्माण की सभी नियमों का पालन हुआ है। नाटक में आगे क्या होगा का आकर्षण नाट्यांत तक रखा गया है।
मुखर पूरा विश्वास है कि प्रस्तुत नाटक संग्रह ‘ बखरूं ग्वेर स्याळ’ आधुनिक गढ़वाली नाटक संसार का एक चमकता गहना सिद्ध होगा