(जानिये गढ़वाली कवि आशीष सुंदरियाल से उनके कवित्व पर उनकी जुवानी श्रृंखला )
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
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भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि – 4-मई-1980
माता पिता नाम – श्रीमती समोदरा देवी व स्व. दयानंद सुंदरियाल
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है:- जन्म तो देहरादून में हुआ पर बचपन मूल गॉंव- चुरेड़गौं, चौन्दकोट, गढ़वाल में बीता।
शिक्षा – परास्नातक
आधारिक – प्रा. वि. जगस्याखाल
मिडल /हाई स्कूल:- ज. इं. कॉ.- चौबट्टाखाल/नौंगांवखाल
उच्च शिक्षा – डी.ए.वी.कॉलेज, देहरादून
आजीविका – स्वतंत्र लेखन व स्वरोजगार
सम्प्रति – लेखन व शोध
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
आशीष- स्वयं से ही
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
उत्तर- शायद उठो लाल अब ऑंखें खोलो।
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
आशीष- चिट्ठी (मदन मोहन डुकलाण) द्वारा प्रकाशित कविता पोस्टर और गज़ल फोल्डर से
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
आशीष- 100 के लगभग
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
आशीष- एक, द्वी मिन्टौ मौन (गढ़वाळि कविता संग्रै)
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
आशीष- सन् 1999-2000 से, शायद सामाजिक परिवेश और आसपास के साहित्यिक वातावरण ने।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
आशीष- पाश की कविता है- सबसे खतरनाक होता है सपनो का मर जाना… शायद मूल ये पंजाबी मे लिखी गई है। घोर यथार्थवादी और व्यवस्था के प्रति खिन्नता के कारण, बाकी कवियों की भी पसंद हैं जैसे- नागार्जुन, धूमिल, अदम गोंडवी आदि।
भी . कु. – गढ़वाली में पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
आशीष- काफी हैं। एक नाम बताना मुश्किल है।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
आशीष- यथार्थ चित्रण के माध्यम से व्यवस्था की विसंगतियों पर कटाक्ष
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
आशीष- सामान्यतः व्यंग्य और फैंटेसी
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
आशीष- कुछ गज़ले लिखने का प्रयास किया है, नवगीत नहीं।
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
आशीष- आवश्यक था और है भी।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
आशीष- जी! लोक के अतिरिक्त राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विषय और प्रतीकों का प्रयोग, दैनिक दिनचर्या में प्रयोग होने वाले अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग- जैसे इंटरनेशनल अफेयर, बमबारी, घ्याळू, पुछकट्या ढॉंगू और गैळ बल्द जैसी प्रतीकात्मक व अतुकांत कविताएँ लिखने का प्रयास
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
आशीष- कुछ निश्चित नहीं है। मैं कभी-कभी का कवि हूँ
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
आशीष- मुख्यत: गढ़वाळि साहित्य पढ़ता हूँ। काफी हैं विशेषकर कन्हैयालाल डंडरियाल, नेत्र सिंह असवाल, चिन्मय सायर और निरंजन सुयाल आदि और समकालीन सभी कवियों को पढ़ता हूँ, कुछ कविताएँ प्रभावित करती हैं कुछ नहीं।
भी . कु.- आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
आशीष- स्वान्त सुखाय
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
आशीष- जी! सोशलमीडिया के आने के बाद कुछ कविताओं ने प्रभाव छोड़ा तो है।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
आशीष- हॉं, कई कविताएँ हैं जो पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि अधिकांशतः मेरी कविताएँ अतुकांत होती हैं एक बार में लिख ली तो लिख ली, बाद में उसी भाव-भूमि पर लौटना मुश्किल होता है मेरे लिए।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
आशीष- फिलहाल तो कुछ नहीं कर पा रहा हूँ- ये समझिए।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
आशीष- अवसर भी नहीं मिला और और ऐसे लेखन में खास रूचि है भी नहीं।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
आशीष- नहीं।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
आशीष- सौभाग्य से- प्रिंट और डिजिटल-दोनों ही माध्यम उपलब्ध हैं।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
आशीष- मुख्य रूप से फेसबुक और थोड़ा बहुत यूट्यूब व न्यूज़ पोर्टल।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
आशीष- नहीं, अब ये शायद इतने ट्रेंड में भी नहीं है। इससे अधिक सुलभ साधन हो गये हैं।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
आशीष- जी!
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
आशीष- जी!
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
आशीष- कविता तो नहीं, पर संवाद जरूर लिखे हैं।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
आशीष- ये तो समीक्षक और पाठक ही बता सकते हैं।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
आशीष- अनुभूति और अभिव्यक्ति- जिसके दोनों पक्ष मजबूत हो।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
आशीष- जी परंतु अत्याधिक उत्साहित नहीं रहता मंचीय कविता पाठ को लेकर।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
आशीष- समाज की अपनी भाषा के प्रति जागरूकता की कमी।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युवाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
आशीष- कविता में ताकत होगी तो वो स्वयं ही पंहुच जायेगी। बाकी सोशलमीडिया व साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहने का प्रयास रहता है।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
आशीष- यह तो भविष्य ही तय करेगा। हॉं इतना जरूर है कि कुछ ऐसी रचनाएँ नाम के साथ जुड़ जायें जिनका साहित्यिक मूल्य हो, तो सौभाग्य समझूंगा।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
आशीष- समस्याएं ही समस्याएं हैं और डिजिटल युग और जेन-ज़ी पीढ़ी के साथ यह और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। प्रिंट मीडिया में भविष्य भयावह है पर डिजिटल माध्यम से कुछ धनार्जन कर संघर्ष किया जा सकता है। फिर गढ़वाली जैसी आंचलिक भाषा में तो प्रयोक्ताओं की संख्या पहले ही कम है फिर पढ़ने की संस्कृति भी इस समाज में कुछ खास नहीं और गढ़वाली में तो बोलना आसान है पर लिखना और पढ़ना बड़ा कठिन है। सामाजिक चेतना और सामूहिक सहभागिता से कुछ प्रयास किए जा सकते हैं।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
आशीष- पुस्तक वितरण की व्यवस्था से पहले पढ़ने की संस्कृति और अपनी भाषा के प्रति जागरूकता जरूरी है। पाठक हों तो वितरण में चुनौती नहीं होगी, आज संचार और यातायत दोनों सुगम हो गये हैं। सिलोगी से मूळा, ककड़ी और जख्या जब शाहदरा या सेलाकुई पहुंच सकता है तो शाहदरा या सेलाकुई से पुस्तक सिलोगी भी पंहुच सकती है। बात इतनी है कि बाजार/डिमांड है या नहीं।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
आशीष- सलाह तो……. शायद आजकल किसी को आवश्यकता नहीं है।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
आशीष- प्रयास तो है कि गद्य में अधिक लिखा जाए पर इसके लिए श्रम व समय दोनों फिलहाल पर्याप्त नहीं हैं।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
आशीष- अपनी मातृभाषा के ॠण से उॠण होने के लिए हमें अपनी मातृभाषा में तो लिखना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त स्थापित लोगों को नई पीढ़ी तैयार करनी चाहिए वरना कल उनके लिखे को पढने वाला भी कोई नहीं होगा, चाहे आज वे कितने भी बड़े लेखक अपने को मानते हों, कितनी भी पोथियां छाप लें।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
आशीष- अभी इतना कुछ किया नहीं कि स्थान के बारे में सोचें बाकी तो भविष्य के गर्भ में है कहॉं होगें कहॉं नहीं।