मेरी नई पुस्तक प्रकाशित हुयी
प्रकाशकीय
एक समय रहा होगा जब किसी विदेशी नाटक का अनुवाद हो और वह अनुदित नाटक मंचित हो तो दर्शकों को विदेशी परिवेश व सांस्कृतिक प्रतीकों को पचाना कठिन रहा होगा। जैसे सन 1913 में विदेशी नाटक मंचन में चुम्मे का दृश्य या पति पत्नी का उत्साह वर्धन हेतु बार बार पत्नी के गलों को चूमे तो सामान्य पहाड़ी दर्शक को दृश्य नहीं पच सकता था। किन्तु अब ग्लोबल इकॉनोमी , सुलभ संचार पद्धतियों ने देस विदेश की दूरी कम करने का प्रयत्न हुआ है।
अब दर्शक विदेशी पृष्ठभूमि को पचाने में सक्षम ही नहीं है अपितु अपनाने को भी आतुर हो जाते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक ‘ शेक्सपियर कृत जूलियस सीजर अर अन्य विदेशी नाटक ‘ में महान नाटककार शेक्सपियर के दो नाटक व अंतोव चेखव के दो नाटक प्रकाशित हुए हैं। होना तो यह था कि मैं महान लेखकों के कार्य व उनके अनुवाद की समीक्षा पाठकों के समक्ष पेश करता किन्तु मैं गढ़वाली व कुमाउँनी भाषा संसार में विदेशी नाटकों के अनुवाद पर चर्चा की आकांक्षा चाहता हूँ और चाहता हूँ नाटककार , साहित्यकार विदेशी नाटकों के अनुवाद का महत्व व अनुवाद में सावधानियों पर चर्चा करें।
सर्वप्रथम प्रश्न आता है कि विदेशी नाटकों के अनुवाद से क्या लाभ हो सकते हैं।
विदेशी नाटकों के अनुवाद से सांस्कृतिक व भाषायी विवधता का आदान प्रदान होता है व विदेशी विचार इधर से उधर पंहुचते हैं।
विदेशी नाटक अनुवाद से गढ़वाली व कुमाउँनी रंगमंच के विकास में सहायक होता है व कई नई शैलियों व तकनीक का समावेश गढ़वाली -कुमाउँनी रंगमंच में होता है। कई नए विषय मिलते हैं जो प्रेरणा हेतु आवश्यक होते हैं। नए व विविध विषयी नाटक उपलब्ध हों को भी अनुवाद पुरे करते हैं।
विदेशी नाटक अनुवाद से दर्शकों में वृद्धि होते हैं। अनुवाद से सामजिक व वैचारिक लाभ भी होते हैं।
अनुवाद से कई चुनौतियां भी खड़ी हो जाती हैं जैसे परिवेश व सांस्कृतिक भिन्नता मिलता है व बहुत से प्रतीक हमारे समाज में वर्ज्य भी होते हैं या हम उन प्रतीकों व कार्यों को बिलकुल सहन नहीं कर सकते।
विदेशी नाटक अनुवाद करते समय मूल भाव सांस्कृतिक संदर्भ , पात्रों की ध्वनि बनाये रखने के साथ पृष्ठभूमि को दसिय परिश्थिति में ढालना आवश्यक हैं।
भीष्म कुकरेती ने महान नाटककार शेक्सपियर व अंतोव चेखव के नाटकों का अनुवाद करने में सावधानियां ली हैं। किन्तु भीष्म कुकरेती के नाटक अनुवाद भवानुवाद कतई नहीं हैं .
मुझे पूरा यकीन है कि पाठक, निर्देशक भीष्म कुकरेती के कार्य को सराहनीय मानेंगे।