जानिये गढ़वाली कवि श्री अश्विनी गौड़ जी के बारे में से उनकी जुवानी श्रृंखला )
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती – कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि – बाइस सितंबर उन्नीस सौ सत्तासी
माता पिता नाम – मां- मनोरमा गौङ अर पिताजी-हर्षमणि गौङ
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – मेरा जन्म रुद्रप्रयाग जनपद के मनसूना, गांव में हुआ जो मध्यमहेश्वर धाम के मुख्य मार्ग पर ऊखीमठ के पास स्थित है।
शिक्षा – एम. एस. सी (जंतु विज्ञान), बी-एड़
मिडल /हाई स्कूल राजकीय इंटर कॉलेज किमाणा-दानकोट,
उच्च शिक्षा – B.Sc-स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि अर एम.एस.सी- बी-जी-आर कैम्पस पौड़ी,
आजीविका – शिक्षक, विज्ञान
सम्प्रति – अध्यापक विज्ञान राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पालाकुराली, जखोली रुद्रप्रयाग
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
अश्विनी- कलश साहित्यिक संस्था रुद्रप्रयाग से जुड़ना जिससे मेरी कलम को गढ़वाली लेखन की और उन्मुक्त किया। इसके साथ गढरत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी और प्रीतम भरतवाण के गीतों से भी शब्दकोश और रुचि बढ़ती गई। इसके अलावा मेरा गांव दानकोट का ग्रामीण लोक जीवन मुझे निशुल्क सब कुछ सिखा गया।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
अश्विनी बहुत सारी कविताएं पढी जिसमें पं0 श्यामनारायण पांडे जी की हल्दीघाटी कविता बहुत पसंद थी
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
अश्विनी- सदेई खंडकाव्य सबसे पहली रचना है जिससे मेरा सबसे पहले साक्षात्कार हुआ।
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
अश्विनी- लगभग छै सौ सौ तक कविताएं अभी तक प्रकाशित हो चुकी है,
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम – जी अभी तक दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके है,
2014 में “चौमासि हैर्याळि”
2018- में “बुंराशकांठा”
इसके अलावा “उत्तराखंड की लोकपरम्पराओं में विज्ञान” नाम से एक पुस्तक 2025 में प्रकाशित हुई है।
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
अश्विनी- मैं 2007 कॉलेज समय से ही कविताएं लिख रहा हूं, पर धीरे धीरे समय के साथ कुछ नया सीखता रहता हूं, नये प्रयोग करता रहता हूं, जैसे नयी पीढ़ी से कविताएं लिखवाना, पढ़ाना, और नये हस्ताक्षर को अजमाना,
मुझे कलश संस्था रुद्रप्रयाग के कविता मंचों ने गढवाली लेखन के लिए बहुत प्रोत्साहित किया, मुरली दीवान जी और जगदंबा चमोला जी जैसे रचनाकारों की रचनात्मकता ने तो गढवाली कविताओं की ताकत महसूस करवाई।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
अश्विनी- मैं हिंदी में कुमार विश्वास की कविताएं बहुत पसंद करता हूं, क्योंकि वो नये-नये प्रयोग के साथ हिंदी कविताएं प्रस्तुत करते है
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
अश्विनी- जगदंबा चमोला जी की सूख्यां मुंगर्योट कविता मुझे बहुत पसंद आती है, पलायन के दर्द के साथ साथ सहज भाव भी इस कविता को मार्मिक बना देते है।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
अश्विनी- पहाड़ की संवेदनाएं और नये नये विषय जो समाज मे दिखते है मैं उन्ही पर कलम चलाता हूं, जैसे मोबाइल, बंदर, आदमखोर बाघ, आपदा,
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
अश्विनी- मेरी कविता शैली शुरुआत के दिनों में तुकांत होती थी पर धीरे-धीरे पद्यात्मक और संवादात्मक शैली कविताओं में उतारने लगा।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
अश्विनी- गजल तो बहुत कम लिखी पर बहुत सारे नवगीत लिखे है जैसे मतदान जागरुकता, विज्ञान जैसे विषय पर भी नवगीत लिखकर पोषण, खानपान, स्वच्छता, तत्वों के नाम जैसे विषय पर नवगीत प्रयोग किया है,
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
अश्विनी- नव कविता आंदोलन ने कविताओं में नये आयाम स्थापित किये है, कवियों ने अपने अनुभवजन्य ज्ञान को शब्दों में पिरोया है और कविताओं को जीवंत रखा है जिससे आम जनमानस के मन की बात को छूते हुए कविताएं आगे बढ़ रही है।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
अश्विनी- जी हां, जो देखता हूं, मैं वो लिखता हूं, कोशिश रहती है कि नये पीढ़ी के कलम कंठ के लिए लिख सकू।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
अश्विनी- रचनात्मक प्रक्रिया के चरणों में, सबसे पहले विषयवस्तु देखता हूं, समझता हूं अक्सर समस्या के साथ समाधान की दिशा में कलम चलाता हू और कविता लिखता हूं।
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
अश्विनी- मैं हिंदी लेखन में पं0 श्यामनारायण पांडे, रामधारी सिंह दिनकर, डॉ0 कुमार विश्वास, डॉ0 हरिओम पंवार, कई रचनाओं से बहुत प्रभावित हूं,
साहित्य ग्रंथ में मुझे, रामायण, गोदान, गबन, गुनाहों का देवता पसंदीदा साहित्य है।
गढवाली लेखन में नरेंद्र सिंह नेगी, मदन डुकलान,
ओमप्रकाश सेमवाल, वीरेंद्र बर्त्वाल, भीष्म कुकरेती,
जगदंबा चमोला, विरेन्द्र पंवार, संदीप रावत, गणेश खुगशाल, बीना बेंजवाल, रमाकांत बेंजवाल, नरेंद्र कठैत, इत्यादि मेरे पसंदीदा लेखक है
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
अश्विनी- नये-नये प्रयोग के साथ नयी पीढ़ी तक सार्थक कविताएं पहुंचाना।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
अश्विनी- बिल्कुल जी,
भाषाई स्तर पर मातृभाषा आंदोलन की अलख कविता के मंचों ने जरूर जगाई है, मेले गांव, देहात तक गढ़वाली कविताओं की मांग आना गढवाली कविता लेखन की सार्थकता है।
कलश संस्था, धाद संस्था, ने गढवाल के कवियों को स्थापित किया है, जो कि मातृभाषा लेखन की ताकत को दिखाता है।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
अश्विनी- जी हां, पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लिखना सबसे बड़ी चुनौती है, पर परिवार का समय चुराकर लिखते-लिखते कभी समय का पता नहीं चलता।
भी . कु. -आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
अश्विनी- मैं कोशिश करता हूं कि मैं स्वयं के साथ छात्रों या नए बच्चों को लेखन के लिए प्रोत्साहित कर सकूं और विभिन्न मंचों तक उनको ला सकूं।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
अश्विनी- जी कुछ रचनात्मकता शासकीय कार्यों के निहितार्थ की है जैसे मतदाता जागरुकता गीत, धूम्रपान निषेध रचना, स्वच्छता, सड़क सुरक्षा।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
अश्विनी- नहीं, दरअसल कविता के श्रोता और वो बच्चे जिन्हें मैं ब्यक्तिगत लेखन के लिए प्रोत्साहित करता हूं वो मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार है।
कविताओं से लोक में जो ज्ञान, पहचान मिली है वहीं सबसे बड़ा पुरस्कार है।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
अश्विनी- जी मैं पहले तो कविताएं प्रकाशित करवाता था, धीरे धीरे आपने ( श्रद्धेय भीष्म कुकरेती जी ) मुझे सोशल मीडिया में कविताए प्रसारित करने को प्रोत्साहित किया तबसे में लगभग हर दूसरे तीसरे दिन कविताएं प्रकाशित करता रहता हूं।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
अश्विनी-सोशल मीडिया कविता को विस्तार तो दे रहा है पर वास्तविक श्रोता पाठक से अभी भी साहित्य दूर है।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
अश्विनी- नहीं
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
अश्विनी- जी हां साप्ताहिक रूप से अपने यूट्यूब चैनल में कविताएं प्रसारित करता रहता हूं।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
अश्विनी- हां, गढवाली चैनल कविताएं
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
अश्विनी- जी फिल्मों के लिए लिखने का अवसर तो नही मिला पर सामुदायिक रेडियो केंद्र के लिए बराबर लिखता रहता हूं।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
अश्विनी- पहाड, पारम्परिक लोकपरंपरा, और समाज की समस्याओं को केंद्र बिंदु रखकर कविताए लिखता हूं।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
अश्विनी- जिस कविता में लोक की ब्यथा हो, जिसे हर कोई अपना सके यानि कविता की विषयवस्तु अनुभवजन्य हो, वही एक अच्छी कविता हो सकती है।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
अश्विनी- जी हां, कलश साहित्यिक संस्था के बहुत सारे कविता मंचों पर कविता पाठ किया है।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
अश्विनी- लोकभाषा के प्रति समाज में नीरसता और हीनता का भाव के कारण हमारी भाषा आमबोलचाल और स्कूली माहोल में यथोचित स्थान नहीं बना पा रही है, अंग्रेजी भाषा के प्रति हमारा औपचारिक और अनौपचारिक लगाव के साथ सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के लिए लोकभाषा के अलग अलग मानक
गढ़वाली भाषा की दीन हीन स्थिति में धकेलते जा रहे है।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
अश्विनी- मैं लेखन कार्यशालाएं आयोजित करके बच्चों को लिखने के लिए प्रेरित करता हूं, अपनी कविताएं बच्चों तक पहुँचाने के लिए दिवस विशेष पर कविता स्वयं भी वाचन करता हू और बच्चों से भी कविता गीत पढ़ाता हूं,
बच्चों के समूह में मेरी स्वयं की कविता को नया आयाम मिलता है।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
अश्विनी- भविष्य में नवाचारी वैज्ञानिक कविताएं लिखने की कोशिश रहेगी जो विज्ञान के साथ लोकपम्परा को मातृभाषा के साथ जोड़े।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
अश्विनी- प्रकाशन के लिए सरकार की और से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा रहती ही है लोकभाषाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए स्तरीय लिखना और छपना बहुत जरूरी है।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
अश्विनी- हर गांव गांव में पंचायत भवनों की अपनी लाइब्रेरी होनी चाहिए जिसमें समय समय पर बजट आवंटन करके स्थानीय लोकसाहित्यकारों की पुस्तकें क्रय की जानी चाहिए और सार्वजनिक रुप से नियमित पाठकों तक पहुंचानी चाहिए
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
अश्विनी- लोक में जाकर समाज के शब्द भाव ब्यथा को महसूस करना बहुत जरूरी है इसलिए अनुभवजन्य रचनाएं ही रची जानी चाहिए जो हर स्तर के समाज का प्रतिनिधित्व करें।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
अश्विनी- जी हां, पद्य के अलावा गढवाली हिंदी गद्य लेख निबन्ध टिप्पणी भी लिखता हूं। दरअसल मैं कॉलेज के समय से ही मूलत: समाचार-पत्रों, पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख ही लिखता था धीरे धीरे कविताओं की तरफ झुक गया।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
अश्विनी- युवा कवि, भाषा संस्कृति साहित्य का भविष्य है अत: अपनी भाषा संस्कृति को लेखनी के माध्यम से सशक्त करें, जितना स्तरीय लिखेंगे, छपेंगे भाषा उतनी ही समृद्ध होगी, परन्तु लिखने से पहले पढ़ना बहुत जरूरी है इसलिए अपने से पहले के साहित्यकारों को पढ़ना, समझना बहुत जरूरी है।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
अश्विनी- मैं दरअसल अभी सीखने की सीढ़ी में ही हूं अपने वरिष्ठ साहित्यकारों को पढ़ कर सुनकर सीखता हूं,
मेरे लेखन से गढ़वाली साहित्य शब्दकोश में लेशमात्र भी श्रीवृद्धि हो तो मेरे लिए बहुत बड़ी बात होगी।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
अश्विनी- ये तो भविष्य पर निर्धारित है, मेरी रचनात्मकता सृजनशीलता ही इस प्रश्न का जवाब देगी, आज भी बहुत सारे नये बच्चे संपर्क करते है अपनी कविता भेजते है, तब मैं गलतियां बता कर उनको सुधार कर और बेहतर लिखने को प्रोत्साहित करता हूं, नये बच्चों से रचनात्मकता का ये रिश्ता अहसास शब्दों के रुप में बयां करना मुश्किल है।