जानिये गढ़वाली कवित्री /कवि श्री / डॉ. उमेश चमोला से उनके कवित्व पर को उनकी जुबा नी
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि – 14 जून 1973
माता पिता नाम – माता- श्रीमती राजेश्वरी चमोला, पिता – स्व. श्रीधर प्रसाद चमोला
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – ग्राम- कौशल पुर, रुद्रप्रयाग
शिक्षा – एम. एस-सी, एम. एड, डी. फिल, पत्रकारिता स्नातक (रजत पदक)
आधारिक – राजकीय प्राथमिक विद्यालय बीरों तथा बसुकेदार
मिडल /हाई स्कूल – जूनियर हाई स्कूल भीरी, राजकीय इंटर कॉलेज श्रीनगर गढ़वाल
उच्च शिक्षा – एम. एस-सी, एम. एड, डी. फिल
आजीविका – शिक्षण
सम्प्रति – शिक्षक
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
उमेश चमोला – बचपन में पिता जी को दूसरों को कविता सुनाते देखता था। तब से कविता के प्रति आकर्षण का भाव पैदा हुआ। विद्यालय जाने पर साहित्य की विभिन्न विधाओं से परिचित हुआ। कक्षा 10 में पहली कविता लिखी. विद्यालय में निबंध, कविता,भाषण और वाद विवाद प्रतियोगिताओं अपनी लिखी कविताओं का उपयोग करता था। यह क्रम उच्च शिक्षा तक भी लगातार चलता रहा। बचपन में रेडिओ से कविताएं विशेषकर काका हाथरसी की सुनने को मिलती थी। कक्षा 9 से 12 तक श्रीनगर स्थित छात्रावास में समाचार पत्र, कामिक्स और अन्य पत्र – पत्रिकाएं पढ़ने को मिलती थी। कुछ पत्रिकाओं और कामिक्स सीरीज को चोरी छिपकर पढ़ता था। इन सब परिस्थितयों और साहित्यिक वातावरण ने साहित्य सृजन की ओर उन्मुख किया.
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
उमेश चमोला – प्राइमरी कक्षा की पुस्तक से लाठी लेकर भालू आया. इसके बाद यदि होता किन्नर नरेश मैं, हठ कर बैठा चाँद एक दिन आदि कविताएं आज भी याद हैं।
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
उमेश चमोला – पिताजी की भारत- चीन युद्ध के समय लिखी कविता- आज उठा देशवास्यों सीमा की ललकार, कालीमाथै कालिका माँ, जागि जै हे कालिका मां, भक्तों की तू पालिका माँ, दुष्टों की तू घालिका माँ, चंड चावो, मुंड मावो कर ले तू संघार, आज उठा…….
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
उमेश चमोला – 120 से अधिक
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
उमेश चमोला – पथ्यला ( गढ़वाली गीत- कविता संग्रह), पड़वा बल्द ( गढ़वाली व्यंग्य कविता संग्रह), नंतीनो कि सजोली ( बाल कविता संग्रह), उमाळ ( गढ़वाली खंडकाव्य)
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
उमेश चमोला – 1997 – 98 से लगातार, वैसे कुछ बचपन में भी लिखी थी.
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
उमेश चमोला – ज्यों निकल कर बादलों की गोद से, बूँद कुछ आगे एक बड़ी. इस कविता में जीवन में संघर्ष कर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है.
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
उमेश चमोला – श्री कन्हैया लाल डं डरियाल जी की कविता/ गीत दादू मैं परवतों कु वासी। इसमें अपनी माटी के प्रति प्रेम और गढ़ भूमि की सुंदरता का जीवंत चित्रण किया गया है।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
उमेश चमोला – राजनीति, भ्रष्टाचार,देश प्रेम कामचोरी, समाज का दोहरा चरित्र, पहाड़ का नैसर्गिक सौंदर्य, पलायन, पहाड़ के तीज त्यौहार आदि।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
उमेश चमोला – व्यंग्य, परम्परा गत, नई कविता, बाल कविता।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
उमेश चमोला – नव गीत बहुत कम.
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
उमेश चमोला – समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बदलाव आवश्यक है किन्तु कविता के नाम पर सीधा सपाट लेखन उचित नहीं हैं। नए बिम्ब और प्रतीकों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
उमेश चमोला – लोक में रचे बसे प्रतीकों का नए रूप में प्रयोग करने का प्रयास करता हूँ।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
उमेश चमोला – जो विषय मन को गहराई से प्रेरित करता है, उस पर कई दिनो तक मन में मंथन चलता है. फिर एक दिन कागज में उतरकर कविता का आकार ले लेता है.
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
उमेश चमोला – यह तो समीक्षक ही अच्छी तरह बता सकते हैं मेरे साहित्य का विश्लेषण कर। मैं तो अपने को एक पाठक भी मानता हूँ। हर युगीन साहित्य को पढ़ने का प्रयास किया है। लिओ तालसतोय, शेक्सपियर, प्रेम चंद, जय शंकर प्रसाद, आदि की रचनाओं को बहुत पढ़ा है। हो सकता है इनकी रचनात्मक ता का कुछ प्रभाव मेरे साहित्य पर पड़ा हो.
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
उमेश चमोला – कविताएं राख के अंदर छिपी चिंगारी को सुलगाने का कार्य करती है। साहित्य विभिन्न विधाओं के माध्यम से हताश व्यक्ति के अंदर आशा का दीप जलाने का कार्य करता है। समाज की विदरूपताओं पर तिरछी मुस्कान तो बिखेर ही सकता है साहित्य।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
उमेश चमोला – कविताओं का समाज पर प्रभाव पड़ता तो है किन्तु कभी कभी यह समाज के भीतर धीरे- धीरे अपना प्रभाव दिखाती है। वर्तमान गढ़वाली कविताएं त्वरित गति से अपना प्रभाव तो नहीं दिखा पा रही हैं किन्तु धीमा और निरंतर प्रभाव भविष्य में अपना साकार रूप दिखा सकता है।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
उमेश चमोला – कई कविताएं तीन चार पंक्तियों से आगे नहीं बढ़ पाती है. वर्षों तक सुसुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
उमेश चमोला – कविताएं पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेजता हूँ। प्रकाशित होने पर रुचिवान मित्रों को भेजता हूँ। सोशल मीडिया का भी उपयोग करता हूँ।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
उमेश चमोला – हाँ, नव भारत साक्षरता कार्यक्रम के लिए स्वास्थ्य, वित्तीय, कानूनी, स्वच्छता, मतदान आदि विषयों पर सामाजिक जागरूकता के प्रसार के लिए जिंगल लिखे हैं।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
उमेश चमोला – नहीं
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
उमेश चमोला – सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। किसी कार्यक्रम में संचालक के माध्यम से भी लोगों तक साहित्य पहुँच जाता है।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
उमेश चमोला – पर्याप्त
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
उमेश चमोला – जी
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
उमेश चमोला – हाँ, समय- समय पर।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
उमेश चमोला – हाँ, अपने ही नाम से
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
उमेश चमोला – अभी तक तो नहीं लिखा.
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
उमेश चमोला – लोक में प्रचलित उपमानो का प्रयोग, समाज की विदरूपताओं पर आक्रोश और अप्रत्यक्ष अभिव्यक्ति।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
उमेश चमोला – अच्छी कविता हृदय से निकली स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। वह कल्याणी है।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
उमेश चमोला – कभी – कभी
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
उमेश चमोला – यह शिक्षक पर निर्भर होता है. अब तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के क्रम में पहले पाँच वर्ष बुनियादी साक्षरता और आँकिकता के लिए रखे गए हैं। इसमें छोटे बच्चों के लिए लोरी और अन्य राइम गढ़वाली में रखे जा सकते हैं. कक्षा 1 औरआगे की कक्षाओं के लिए इस संबंध में कार्य नीति बनाए जाने की आवश्यकता है और बाल मनोविज्ञान के अनुरूप पठन सामग्री भी बनाए जाने की आवश्यकता है।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
उमेश चमोला – विद्यालयों तक पुस्तकें पहुँचने पर कुछ जुझारू शिक्षक इनका उपयोग बच्चों के लिए करते हैं। कुछ संस्थाएं समर कैम्प या शीतकालीन शिविरों में बच्चों के लिए रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन भी करते हैं। यहाँ कविताओं का उपयोग शिक्षण – अधिगम सामग्री के रूप में किया जा सकता है। ऐसा मुझे करने का अवसर भी मिलता रहा है। भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
उमेश चमोला – बच्चों को प्रेरणा देने वाली और व्यवस्था पर चोट करने वाली।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
उमेश चमोला – गढ़वाली भाषा में पाठकों की संख्या कम होने से गढ़वाली साहित्य का प्रकाशन घाटे का सौदा सिद्ध हो रहा है। इस संबंध में उत्तराखंड भाषा संस्थान की पुस्तक अनुदान योजना एक सकारात्मक पहल है।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
उमेश चमोला – विभिन्न स्थानों पर पुस्तक मेलों का आयोजन किया जाना चाहिए। सरकार पोषित संस्थानों के स्टाल भी लगाए जानेचाहिए.
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
उमेश चमोला – अपने से पूर्व पीढ़ी के लेखकों की रचनाओं को अवश्य पढ़ें। सोशल मीडिया की रचनाओं को मानक न माने। लेखन में जल्दबाजी न करें। चिंतन- मनन को महत्व दें। रचनाओं में संख्या बल के बजाए गुणवत्ता का ध्यान रखें. भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
उमेश चमोला – कहानी, नाटक, क्षणिका आदि।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं इस हेतु क्या परामर्श है ?
उमेश चमोला – युवा कवि गढ़वाली में अवश्य लेखन करें। कर भी रहे हैं, यह गढ़वाली के स्वर्णिम भविष्य का संकेत है। गढ़वाली केवल प्रयोग की भाषा नहीं है अपितु गढ़वाली में लिखने के लिए गढ़वाली में जीना भी पड़ेगा।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
उमेश चमोला – मैं अपने को सदैव कविता और साहित्य का विद्यार्थी मानता हूँ और सीखने को तत्पर रहता हूँ।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
कविता सृजन के प्रति उत्साही और सतत जिज्ञासु.