(साहित्यकार का साहित्य उनकी जुबानी )
संकलन -भीष्म कुकरेती
1-डाॅ सत्यानन्द बडोनी। । ।
2- स्वर्गीय पंडित हरि दत्त बडोनी, स्वर्गीय शाकम्बरी बडोनी।
3-10 मई 1963।
4-एम ए हिन्दी, पीएचडी ।
5-राजकीय सेवा से सेवानिवृत्त
6-गढ़वाली कथा संग्रह – बस! इथगि चैन्दू। ।
इसके अतिरिक्त गढ़वाली एवं हिन्दी की कई क
हानी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं आकाशवाणी एवं दूरदर्शन केन्द्रो से सतत प्रसारण। 7- पहले बचपन में अपनी पाठ्य पुस्तकों एवं गीता प्रेस की छोटी-छोटी पुस्तकों, तरूणाई में पत्र-पत्रिकाओं एवं आकाशवाणी केन्द्र के विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों के माध्यम से।। गढ़ कवि जीवानन्द श्रीयाल, घनश्याम शैलानी, धर्मानन्द उनियाल , गुणा नन्द पथिक, अबोधबधु बहुगुणा, कन्हैया लाल डण्डरियाल , भजनसिंह सिंह , तोता कृष्ण गैरोला एवं हिन्दी कवि एवं कहानीकारो को पढ़कर लिखने की प्रेरणा। पहली गढ़वाली कविता प्यारू हिमालै 1977-78 के लगभग हिमालय और हम में प्रकाशित हुई। बात लगभग 1971-72 की होगी जब कांग्रेस सरकार के दौरान वृहद स्तर पर परिवार नियोजन कार्यक्रम चल रहा था, मेरे बाल मन में न जाने यह कार्यक्रम पसंद नहीं आया और मैंने परिवार नियोजन पर एक कविता लिख ली। कविता लिखकर जेब पर रख ली। संयोग से पड़ोस के किसी बड़े भैया ने यह सोचकर मेरी जेब की तलाशी ले ली कि कहीं यह धुम्रपान तो नहीं करता । मैं इस तलाशी से यकायक सहम गया। नहीं समझ पाया कि यह तलाशी किस प्रयोजन से ली जा रही है। उन्होंने वह कविता वाला कागज अपने पास रख लिया। मैं अबोध बालक डर के मारे कागज़ को उनसे नहीं मांग सका। बात आई गई हो गई। 11वीं कक्षा में राजकीय इंटर कॉलेज डांगचौंरा टिहरी गढ़वाल में आ गया। वहीं उन भाई साहब के बच्चे भी स्कूल में भर्ती हो गए, जो मेरे बाल सखा भी थे। पड़ोसी थे, इस लिए हमारी आपस में खूब बनती थी। मैं लिखने लग था था। संयोग से बातों-बातो में उन्होंने कहा चाचा आपकी एक कविता पिता जी ने रामायण के अन्दर रखी है। बस! यह बात सुनकर कि कविता रामायण में रखी है। कुछ बात तो है। मैंने तब से मुड़ कर पीछे नहीं देखा। हां घर-परिवार में ही क्या इर्द गिर्द भी कोई ऐसा साहित्यिक वातावरण नहीं था। उधर पुलिस आरक्षी में भर्ती हो गया। वहां भी साहित्यिक वातावरण कोसों दूर, किंतु मैंने लिखना -पढ़ना बंद नहीं किया। मां सरस्वती की असीम कृपा से ही आज साहित्य संसार में चहलकदमी कर पा रहा हूं। तरूण होने पर पत्र-पत्रिकाओं और बड़े साहित्यकारों को पढ़ कर जो भी लिख पा रहा हूं, उन्हीं का स्नेहिल आशीष मेरे ऊपर बनता रहा। समाचार पत्रों का विशेष योगदान मेरे सृजनात्मक को पंख लगाते रहे। आज जो भी, जैसे भी हूं, आपके समक्ष भीड़ में खड़ा हूं। यह यात्रा सतत यूं ही गतिमान बनी रहेगी। यही ईश्वर से प्रार्थना भी करता हूं। मेरी कहानियां अपनी आसपास की घटित घटनाओं पर आधारित होती है। पर्वत प्रांत में जन्म लेने, वहीं ग्रामीण अंचल में लिखने -पढ़ने के कारण आंचलिक और लोककथाएं अधिक लिखता हूं। सारे विषय अपने ही परिवेश से आसानी से मिल जाया करते हैं ।
इसीलिए मैंने मंगतू,भागै भताक, पच्छांण, धर्मसंकट,एक्स झाझी,अर अफु, बस! इथगि चैन्दू, हिट्स, थैस पड़गि, खन्सामा मस्तराम, वीर भड़ माधोसिंह, फुण्ड फूका, फट्यूं बौल़ु, फिर बौड़िक आला, फ्योंली, अपजश, आणि पड़गि, हाण्डी, जगदि मुछ्यालि, हमारि मन्सा, कुणैटि बुढ़िढ़, भुकण्यां तैं लुकण्यां लिगि, टल्लू, घट्टौ भूत, डाल़्या जैसी लोककथाओं एवं आंचलिक कथाओं का सृजन हो सका है। इन कथाओं में लोकोक्तियां, आणां-पखाणों का भरपूर प्रयोग किया गया है। इन कहानियों में अपने लोक की कथा, व्यथा, राग, अनुराग, हास, परिहास, दुःख, सुख, हंसी-ठिठोली, पर्यावरण, नशा मुक्ति , प्रतिस्पर्धा, वीर गाथा, गरीबी, अमीरी, भविष्य की चिंता, व्रत, पर्व, तीज त्यौहार, शर्म हया तमाम ग्रामीण सामाजिक मुद्दों जैसे विषयों पर कथाओं के माध्यम से अपने लोक में प्रेषण का कार्य किया गया है। जिसकी सराहना की जानी चाहिए, जिससे कथाकार को संबल प्रदान किया जा सकता है। ऐसा मेरा मानना है।
मेरे प्रिय कहानीकार मुंशी प्रेमचंद, गुलेरी, फणीश्वर नाथ रेणु, इधर पहाड़ों के मोहनलाल नेगी, महावीर प्रसाद गैरोला, कवियों में सुमित्रानंदन पंत, राधाकृष्ण कुकरेती आदि विद्वानों से प्रेरणा मिली है। हिन्दी कवियों में जयशंकर प्रसाद, अयोध्या प्रसाद हरिऔध, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, प्रसून जोशी जैसे साहित्य साधकों से सीखने का अकिंचन प्रयास किया गया है। अभी भी नये-पुरानें साहित्य साधकों से सीखने की चेष्टा करता रहता हूं। जहां तक शैली की बात है, मैं सरल और सहज भाषा को अधिक प्राथमिकता देता हूं। चूंकि मेरी दृष्टि में अच्छा साहित्य वही है, जो आसानी और सुलभता से पाठक तक पहुंच जाय। कहानियों के लिए रिसर्च करना बड़ा आसान है। पहाड़ों के लोक जीवन में विषयों की अंबार है। मैं यथार्थवादी सृजन पर विश्वास करता हूं। व्यंग्यबाण से भी यदा-कदा लेखनी चलाई है, चूंकि लोगों तक सीधी बात अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाती है। इसीलिए कभी कभार ऐसा सृजन भी आवश्यक हो जाता है।। । कभी अपने लोक में कुछ रूढ़ी बाध्यताएं नजर आती हैं, तो नई दृष्टि से पिरोकर उसमें संतुलन कर कहानियों को नया आकार दिये जाने का यथासंभव प्रयास किया जाता है। नयेपन के लिए यदि आवश्यकता होती है,तो कभी कभार कपोल कल्पना करने में कोई गुरेज नहीं करता। परिवार में अपनी जीवनसंगिनी भरपूर सहयोग करती है। सेवा निवृत्ति के उपरांत जीवन में एक नये बदलाव की अनुभूति अवश्य हुई है। घर-परिवार के छोटे-छोटे कार्यों में हाथ बंटाने के संग साहित्य सर्जना के लिए ईमानदारी से नहीं तो बेमानी से समय निकालना श्रेयष्कर समझता हूं। अपनी साहित्य सृजनात्मक से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हूं। कभी कोई भी सशक्त हस्ताक्षर अपने को साहित्य में परिपूर्ण नहीं समझता। मेरी दृष्टि में यही उचित भी है। । । नवांकुर लेखकों को मेरी दृष्टि में सबसे पहले एक अच्छा पाठक होना जरूरी है। जब हम बरिष्ठ लेखकों को पढ़ेंगे तो हम लिखने का सलीका सीखेंगे और साथ-साथ हमारी शब्द सम्पदा में भी श्रीवृद्धि होगी, ऐसा मेरा मानना है। बरिष्ठ टिप्पणीकार और हिन्दी, गढ़वाली और आंग्ल भाषा के मर्मज्ञ श्री भीष्म कुकरेती जी का साधुवाद और आभार जिन्होंने यह भागीरथ प्रयास से हम सभी साहित्यकारों को अपनी लेखनी से अभिसिंचित किया है। आज कल वर्तमान परिदृश्य को दृष्टिगत रखते हुए लेखन समीचीन होगा, ऐसा मेरा मानना है
विशेष – शैशव हिंदी कविता संग्रह, ताता दूधै घूट गढ़वाली कविता संग्रह, बस! इथगि चैन्दू गढ़वाली कथा संग्रह, पिंटू बोला मम्मी से बाल कविता संग्रह, उत्तराखंड हिमालय जो लोक भाषा संस्कृति एवं पर्यटन पर केंद्रित है, बूंद -बूंंद सागर निम्बंध संग्रह और माल्दा से कणोणी तक बडोनी वंशावली कृति प्रकाशित। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, प्रादेशिक सम्मानों से अलंकृत।