भीष्म कुकरेती के साथ वार्तालाप
नाम -डा.यतेन्द्र प्रसाद गौड़ ‘यति’
जन्मतिथि -27-04-1967
पिता-स्व.गोविन्द प्रसाद गौड़,माता -श्रीमती प्यारी देवी
सिमलना बिचला पट्टी अजमीर वि.ख.-दुगड्डा पौड़ी गढ़वाल
M.A.(अर्थशास्त्र, अंग्रेजी,
B.Ed,संगीत प्रभाकर गायन,
प्राथमिक शिक्षा/मिडिल/हाई स्कूल -सिमलना (इंटर
कॉलेज पोखरी अजमीर)
उच्च शिक्षा -कोटद्वार
संप्रति -अध्यापन
*बाल्यकाल में कविता पाठ्य-पुस्तकों की पढना याद करना व सुनाना अच्छा लगता था। युवावस्था में बिना प्रेरणा से यूं ही हिंदी कविता लिखना शुरू किया।
*बचपन में निरंतर पांच वर्षों तक रामलीला में विभिन्न और प्रमुख पात्रों का रोल निभाया।गायन में काफी सराहना मिली।और युवावस्था में कुछ इस तरह का परिवेश मिला की संगीत के प्रति आस्था और अनुराग जागा और सीखना प्रारंभ हुआ..
*सर,अभी तक 7विडियो गीत और 6औडियो,जिनका कि, फिल्मांकन होना शेष है, इसके अतिरिक्त आकाशवाणी व दूरदर्शन पर 24-25गीत एवं लोकगीत गाये हैं।
*बाल कविताएं
*गढरत्न श्री नरेंन्द्र सिंह नेगी का गीत -गंगा जी की औत,तराजू न तोली लैंण….
*140से ज्यादा प्रकाशित
*1एक वीडियो एल्बम,(बरख्यळु चौमास)2-,गीत संग्रै-मयळि भौंण,3-बालगीत संग्रै-झुम्पा,4-खंड काव्य (ब्वे कि लाठी),..
5-गीत/कविता संग्रै प्रकाशाधीन…
*गढ़वाली लेखन..वर्ष 1994से नरेंद्र सिंह नेगी जी के गीतों से प्रेरित हुआ,
*हिन्दी में, वर्तमान में गुलज़ार साहब के हरेक गीत, इसके अतिरिक्त डा.नंदकिशोर ढौंडियाल की हिंदी कविताएं
*गढ़वाली में कन्हैयालाल डंडरियाल जी की सुप्रसिद्ध गीत दादू मि पर्वतूं को वासी…
*मेरी गीत एवं कविताओं में प्रकृति प्रेम और प्रेम श्रंगार और समसामयिक विषयों पर मेरा चिंतन रहा है।
*छंन्दबद्ध कविताएं कम है।शेष सभी रचनाएं छंन्दबद्ध ही लिखने का प्रयास रहता है।ताकि, गीत बन सके..
*एक दो रचनाएं ही गजल विधा में ही लिख पाया हूं।
*नई कविताएं हरेक विधा में लिखी जा रही है। ग़ज़ल विधा पर ज्यादातर रचनाएं पढने व सुनने में आ रही हैं।
*कविताओं में अभी उल्लेखनीय नये प्रयोग नहीं हुआ है।
*मेरी रचनात्मक प्रकिया विषयवस्तु को विस्तार पूर्वक समझना परखना है। तत्पश्चात ही लिखने का प्रयास करता हूं।
*लेखकों के क्रम में सर्वप्रथम नरेंद्र सिंह नेगी, स्व.कन्हैयालाल डंडरियाल, मदनमोहन डुकलान, वीरेंद्र पंवार, पयाश पोखड़ा,गिरीश सुंद्रियाल,हरीश जुयाल,आदि
मेरी रचनाधर्मिता का उद्देश्य.. प्रकृति प्रेम, प्रेम श्रृंगार, समसामयिक विषयों को समाज के समक्ष कविता के रूप में प्रस्तुत करना है।
*वर्तमान में गढ़वाली कविताओं ने खास तौर पर हास्य/व्यंग्य की कविता सामाजिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
**कविता लिखने में चुनौतियां… ऐसा कुछ विशेष कठिनाई नहीं है।
*कविता प्रकाशन में पहले जैसी आने वाली कठिनाईयों में अब काफी सरलता आ गयी है।
*
सर! मैं पहले व्यक्तिगत व स्थानीय स्तर पर संकलित रचनाओं को दो या तीन प्रूफ के साथ टाइप करवा तब किसी अच्छे प्रकाशक से संपर्क करता हूं।
*शासन की प्रेरणा से कोई रचना नहीं है।
*पुरस्कार के लिए कोई कविता नहीं लिखी है।
सर! मैं*अपनी कविता या गीतों को समाज तक पहुंचाने के लिए आकाशवाणी दूरदर्शन,लोक मंच, कविगोष्ठी, स्थानीय मेला महोत्सव,आदि माध्यमों का उपयोग कर लेता हूं।
*वर्तमान समय में सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम बन गया है।
सर!मेरा अपना कोई ब्लॉग नहीं है ।
*हां मेरा अपना यू ट्यूब चैनल है।
*फिल्मों के लिए अभी तक कोई गीत नहीं लिखा है।
*प्राकृतिक सौंदर्य,तीज त्योहार, हमारी परम्परा, प्रेम श्रंगारिक, जन जागरुकता अभियान…
*अच्छी कविता -जिसमें रस छंद, अलंकार,हो,बिम्ब प्रधान हो…
*हां सर…
*प्राथमिक स्तर पर अब धीरे-धीरे बच्चों की रुचि विकसित हो रही है। क्योंकि राज्यस्तरीय और राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से लोक-संस्कृति के कई बड़े कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। गढ़वाली/कुमाउनी/जौनसारी संस्कृति ने एक अच्छी पहचान स्थापित कर ली है।
*अपनी कविता, गीत, एवं नाटकों, को अपने व अन्य विद्यालयों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां गीत संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
*भविष्य में लोक साहित्य व लोक संगीत इसी दिशा में सृजन कार्य करता रहूं।यही अभिलाषा है।
*गढ़वाली भाषा के संदर्भ में कहूं तो भाषा की एकरुपता की कमी के कारण प्रकाशक को भी असहजता महसूस होती है।
*पुस्तक वितरण में समस्याएं हैं। व्यक्तिगत स्तर, संस्थाओं व शासन स्तर पर परस्पर सहयोग व समन्वय की आवश्यकता है।
* हमारे युवा लोक साहित्य व सांस्कृतिक आयोजनों को देखें सुने,और प्रतिभाग करते रहें….
* *मुख्य रूप से गीत,कविता ग़ज़ल
* सर… साहित्य सृजन में रत रहूं।बस यही अभिलाषा है।
* *प्रकृति कवि के रुप में…
* सर!!!आपका विशेष आभार।
* धन्यवाद, प्रणाम
नाम -डा.यतेन्द्र प्रसाद गौड़ ‘यति’
जन्मतिथि -27-04-1967
पिता-स्व.गोविन्द प्रसाद गौड़,माता -श्रीमती प्यारी देवी
सिमलना बिचला पट्टी अजमीर वि.ख.-दुगड्डा पौड़ी गढ़वाल
M.A.(अर्थशास्त्र, अंग्रेजी,
B.Ed,संगीत प्रभाकर गायन,
प्राथमिक शिक्षा/मिडिल/हाई स्कूल -सिमलना (इंटर
कॉलेज पोखरी अजमीर)
उच्च शिक्षा -कोटद्वार
संप्रति -अध्यापन
*बाल्यकाल में कविता पाठ्य-पुस्तकों की पढना याद करना व सुनाना अच्छा लगता था। युवावस्था में बिना प्रेरणा से यूं ही हिंदी कविता लिखना शुरू किया।
*बचपन में निरंतर पांच वर्षों तक रामलीला में विभिन्न और प्रमुख पात्रों का रोल निभाया।गायन में काफी सराहना मिली।और युवावस्था में कुछ इस तरह का परिवेश मिला की संगीत के प्रति आस्था और अनुराग जागा और सीखना प्रारंभ हुआ..
*सर,अभी तक 7विडियो गीत और 6औडियो,जिनका कि, फिल्मांकन होना शेष है, इसके अतिरिक्त आकाशवाणी व दूरदर्शन पर 24-25गीत एवं लोकगीत गाये हैं।
*बाल कविताएं
*गढरत्न श्री नरेंन्द्र सिंह नेगी का गीत -गंगा जी की औत,तराजू न तोली लैंण….
*140से ज्यादा प्रकाशित
*1एक वीडियो एल्बम,(बरख्यळु चौमास)2-,गीत संग्रै-मयळि भौंण,3-बालगीत संग्रै-झुम्पा,4-खंड काव्य (ब्वे कि लाठी),..
5-गीत/कविता संग्रै प्रकाशाधीन…
*गढ़वाली लेखन..वर्ष 1994से नरेंद्र सिंह नेगी जी के गीतों से प्रेरित हुआ,
*हिन्दी में, वर्तमान में गुलज़ार साहब के हरेक गीत, इसके अतिरिक्त डा.नंदकिशोर ढौंडियाल की हिंदी कविताएं
*गढ़वाली में कन्हैयालाल डंडरियाल जी की सुप्रसिद्ध गीत दादू मि पर्वतूं को वासी…
*मेरी गीत एवं कविताओं में प्रकृति प्रेम और प्रेम श्रंगार और समसामयिक विषयों पर मेरा चिंतन रहा है।
*छंन्दबद्ध कविताएं कम है।शेष सभी रचनाएं छंन्दबद्ध ही लिखने का प्रयास रहता है।ताकि, गीत बन सके..
*एक दो रचनाएं ही गजल विधा में ही लिख पाया हूं।
*नई कविताएं हरेक विधा में लिखी जा रही है। ग़ज़ल विधा पर ज्यादातर रचनाएं पढने व सुनने में आ रही हैं।
*कविताओं में अभी उल्लेखनीय नये प्रयोग नहीं हुआ है।
*मेरी रचनात्मक प्रकिया विषयवस्तु को विस्तार पूर्वक समझना परखना है। तत्पश्चात ही लिखने का प्रयास करता हूं।
*लेखकों के क्रम में सर्वप्रथम नरेंद्र सिंह नेगी, स्व.कन्हैयालाल डंडरियाल, मदनमोहन डुकलान, वीरेंद्र पंवार, पयाश पोखड़ा,गिरीश सुंद्रियाल,हरीश जुयाल,आदि
मेरी रचनाधर्मिता का उद्देश्य.. प्रकृति प्रेम, प्रेम श्रृंगार, समसामयिक विषयों को समाज के समक्ष कविता के रूप में प्रस्तुत करना है।
*वर्तमान में गढ़वाली कविताओं ने खास तौर पर हास्य/व्यंग्य की कविता सामाजिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
**कविता लिखने में चुनौतियां… ऐसा कुछ विशेष कठिनाई नहीं है।
*कविता प्रकाशन में पहले जैसी आने वाली कठिनाईयों में अब काफी सरलता आ गयी है।
*
सर! मैं पहले व्यक्तिगत व स्थानीय स्तर पर संकलित रचनाओं को दो या तीन प्रूफ के साथ टाइप करवा तब किसी अच्छे प्रकाशक से संपर्क करता हूं।
*शासन की प्रेरणा से कोई रचना नहीं है।
*पुरस्कार के लिए कोई कविता नहीं लिखी है।
सर! मैं*अपनी कविता या गीतों को समाज तक पहुंचाने के लिए आकाशवाणी दूरदर्शन,लोक मंच, कविगोष्ठी, स्थानीय मेला महोत्सव,आदि माध्यमों का उपयोग कर लेता हूं।
*वर्तमान समय में सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम बन गया है।
सर!मेरा अपना कोई ब्लॉग नहीं है ।
*हां मेरा अपना यू ट्यूब चैनल है।
*फिल्मों के लिए अभी तक कोई गीत नहीं लिखा है।
*प्राकृतिक सौंदर्य,तीज त्योहार, हमारी परम्परा, प्रेम श्रंगारिक, जन जागरुकता अभियान…
*अच्छी कविता -जिसमें रस छंद, अलंकार,हो,बिम्ब प्रधान हो…
*हां सर…
*प्राथमिक स्तर पर अब धीरे-धीरे बच्चों की रुचि विकसित हो रही है। क्योंकि राज्यस्तरीय और राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से लोक-संस्कृति के कई बड़े कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। गढ़वाली/कुमाउनी/जौनसारी संस्कृति ने एक अच्छी पहचान स्थापित कर ली है।
*अपनी कविता, गीत, एवं नाटकों, को अपने व अन्य विद्यालयों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां गीत संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
*भविष्य में लोक साहित्य व लोक संगीत इसी दिशा में सृजन कार्य करता रहूं।यही अभिलाषा है।
*गढ़वाली भाषा के संदर्भ में कहूं तो भाषा की एकरुपता की कमी के कारण प्रकाशक को भी असहजता महसूस होती है।
*पुस्तक वितरण में समस्याएं हैं। व्यक्तिगत स्तर, संस्थाओं व शासन स्तर पर परस्पर सहयोग व समन्वय की आवश्यकता है।
* हमारे युवा लोक साहित्य व सांस्कृतिक आयोजनों को देखें सुने,और प्रतिभाग करते रहें….
* *मुख्य रूप से गीत,कविता ग़ज़ल
* सर… साहित्य सृजन में रत रहूं।बस यही अभिलाषा है।
* *प्रकृति कवि के रुप में…
* सर!!!आपका विशेष आभार।
* धन्यवाद, प्रणाम
नाम -डा.यतेन्द्र प्रसाद गौड़ ‘यति’
जन्मतिथि -27-04-1967
पिता-स्व.गोविन्द प्रसाद गौड़,माता -श्रीमती प्यारी देवी
सिमलना बिचला पट्टी अजमीर वि.ख.-दुगड्डा पौड़ी गढ़वाल
M.A.(अर्थशास्त्र, अंग्रेजी,
B.Ed,संगीत प्रभाकर गायन,
प्राथमिक शिक्षा/मिडिल/हाई स्कूल -सिमलना (इंटर
कॉलेज पोखरी अजमीर)
उच्च शिक्षा -कोटद्वार
संप्रति -अध्यापन
*बाल्यकाल में कविता पाठ्य-पुस्तकों की पढना याद करना व सुनाना अच्छा लगता था। युवावस्था में बिना प्रेरणा से यूं ही हिंदी कविता लिखना शुरू किया।
*बचपन में निरंतर पांच वर्षों तक रामलीला में विभिन्न और प्रमुख पात्रों का रोल निभाया।गायन में काफी सराहना मिली।और युवावस्था में कुछ इस तरह का परिवेश मिला की संगीत के प्रति आस्था और अनुराग जागा और सीखना प्रारंभ हुआ..
*सर,अभी तक 7विडियो गीत और 6औडियो,जिनका कि, फिल्मांकन होना शेष है, इसके अतिरिक्त आकाशवाणी व दूरदर्शन पर 24-25गीत एवं लोकगीत गाये हैं।
*बाल कविताएं
*गढरत्न श्री नरेंन्द्र सिंह नेगी का गीत -गंगा जी की औत,तराजू न तोली लैंण….
*140से ज्यादा प्रकाशित
*1एक वीडियो एल्बम,(बरख्यळु चौमास)2-,गीत संग्रै-मयळि भौंण,3-बालगीत संग्रै-झुम्पा,4-खंड काव्य (ब्वे कि लाठी),..
5-गीत/कविता संग्रै प्रकाशाधीन…
*गढ़वाली लेखन..वर्ष 1994से नरेंद्र सिंह नेगी जी के गीतों से प्रेरित हुआ,
*हिन्दी में, वर्तमान में गुलज़ार साहब के हरेक गीत, इसके अतिरिक्त डा.नंदकिशोर ढौंडियाल की हिंदी कविताएं
*गढ़वाली में कन्हैयालाल डंडरियाल जी की सुप्रसिद्ध गीत दादू मि पर्वतूं को वासी…
*मेरी गीत एवं कविताओं में प्रकृति प्रेम और प्रेम श्रंगार और समसामयिक विषयों पर मेरा चिंतन रहा है।
*छंन्दबद्ध कविताएं कम है।शेष सभी रचनाएं छंन्दबद्ध ही लिखने का प्रयास रहता है।ताकि, गीत बन सके..
*एक दो रचनाएं ही गजल विधा में ही लिख पाया हूं।
*नई कविताएं हरेक विधा में लिखी जा रही है। ग़ज़ल विधा पर ज्यादातर रचनाएं पढने व सुनने में आ रही हैं।
*कविताओं में अभी उल्लेखनीय नये प्रयोग नहीं हुआ है।
*मेरी रचनात्मक प्रकिया विषयवस्तु को विस्तार पूर्वक समझना परखना है। तत्पश्चात ही लिखने का प्रयास करता हूं।
*लेखकों के क्रम में सर्वप्रथम नरेंद्र सिंह नेगी, स्व.कन्हैयालाल डंडरियाल, मदनमोहन डुकलान, वीरेंद्र पंवार, पयाश पोखड़ा,गिरीश सुंद्रियाल,हरीश जुयाल,आदि
मेरी रचनाधर्मिता का उद्देश्य.. प्रकृति प्रेम, प्रेम श्रृंगार, समसामयिक विषयों को समाज के समक्ष कविता के रूप में प्रस्तुत करना है।
*वर्तमान में गढ़वाली कविताओं ने खास तौर पर हास्य/व्यंग्य की कविता सामाजिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
**कविता लिखने में चुनौतियां… ऐसा कुछ विशेष कठिनाई नहीं है।
*कविता प्रकाशन में पहले जैसी आने वाली कठिनाईयों में अब काफी सरलता आ गयी है।
*
सर! मैं पहले व्यक्तिगत व स्थानीय स्तर पर संकलित रचनाओं को दो या तीन प्रूफ के साथ टाइप करवा तब किसी अच्छे प्रकाशक से संपर्क करता हूं।
*शासन की प्रेरणा से कोई रचना नहीं है।
*पुरस्कार के लिए कोई कविता नहीं लिखी है।
सर! मैं*अपनी कविता या गीतों को समाज तक पहुंचाने के लिए आकाशवाणी दूरदर्शन,लोक मंच, कविगोष्ठी, स्थानीय मेला महोत्सव,आदि माध्यमों का उपयोग कर लेता हूं।
*वर्तमान समय में सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम बन गया है।
सर!मेरा अपना कोई ब्लॉग नहीं है ।
*हां मेरा अपना यू ट्यूब चैनल है।
*फिल्मों के लिए अभी तक कोई गीत नहीं लिखा है।
*प्राकृतिक सौंदर्य,तीज त्योहार, हमारी परम्परा, प्रेम श्रंगारिक, जन जागरुकता अभियान…
*अच्छी कविता -जिसमें रस छंद, अलंकार,हो,बिम्ब प्रधान हो…
*हां सर…
*प्राथमिक स्तर पर अब धीरे-धीरे बच्चों की रुचि विकसित हो रही है। क्योंकि राज्यस्तरीय और राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से लोक-संस्कृति के कई बड़े कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। गढ़वाली/कुमाउनी/जौनसारी संस्कृति ने एक अच्छी पहचान स्थापित कर ली है।
*अपनी कविता, गीत, एवं नाटकों, को अपने व अन्य विद्यालयों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां गीत संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
*भविष्य में लोक साहित्य व लोक संगीत इसी दिशा में सृजन कार्य करता रहूं।यही अभिलाषा है।
*गढ़वाली भाषा के संदर्भ में कहूं तो भाषा की एकरुपता की कमी के कारण प्रकाशक को भी असहजता महसूस होती है।
*पुस्तक वितरण में समस्याएं हैं। व्यक्तिगत स्तर, संस्थाओं व शासन स्तर पर परस्पर सहयोग व समन्वय की आवश्यकता है।
* हमारे युवा लोक साहित्य व सांस्कृतिक आयोजनों को देखें सुने,और प्रतिभाग करते रहें….
* *मुख्य रूप से गीत,कविता ग़ज़ल
* सर… साहित्य सृजन में रत रहूं।बस यही अभिलाषा है।