जानिये गढ़वाली कवयित्री श्रीमती सुनीता ध्यानी से उनके कवित्व को उनकी जुबानी
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता-लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती-कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये ।
जन्म तिथि – 13/09/1972
माता पिता नाम – श्री सतेश्वर प्रसाद मधवाल।
श्रीमती कमला मधवाल।
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – ग्राम- औंलेथ,नैनीडाँडा पौड़ी गढ़वाल।
ससुराल – ग्राम- चैबाड़ा , नैनीडाँडा पौड़ी गढ़वाल।
पति – श्री शशि ध्यानी।
शिक्षा – बी० ए ०, बी० एड०।
आधारिक – आधारिक विद्यालय नैनीडाँडा ।
मिडल /हाई स्कूल – ज० इ० का० नैनीडाँडा ।
उच्च शिक्षा – पी० एन० जी० स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर।
विड़ला संघटक महाविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल।
आजीविका – शिक्षिका,प्राथमिक विद्यालय।
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया ।
सुनीता ध्यानी – बाल्यकाल में हिंदी अध्यापक श्री गोपाल सिंह नेगी जी ने निबंध प्रतियोगिता हेतु लिखे गए निबंध को पढ़कर लेखन की प्रशंसा की थी और लिखने के लिए प्रेरित किया था।
परिस्थितिवश आरंभ में लेखन पर ध्यान नहीं दे पाई परंतु मन के विचार यदा- कदा लिखती रही । तदोपरांत सोशल मीडिया से ही प्रेरणा मिली ।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी ।
सुनीता ध्यानी – सबसे पहले
“उठो लाल अब आँखे खोलो , पानी लाई हूँ मुँह धो लो ।”
माँ ने पढ़ाई सुनाई थी ।
हम इसे सोहनलाल द्विवेदी जी की कविता समझते थे पर बाद में बताया गया कि यह अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी की कविता थी ।
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
सुनीता ध्यानी – जी मेरे पापा रेडियो पर ग्राम जगत कार्यक्रम सुनते थे, हम बच्चे भी ग्रामजगत कार्यक्रम में गढ़वाली वार्ता , कहानी , कविता सुनते रहते थे ।आज याद तो नहीं मगर बाद में श्री महेन्द्र ध्यानी जी की किताब “तर्पण” में पहली बार उनकी कविताएँ पढ़ी थी। राजुला-मालुशाही , हरुहित जैसे कुमाउँनी काव्य और सदेई गढ़वाली गीत भी पढ़े थे ।
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
सुनीता ध्यानी – लगभग सौ तक लिख चुकी हूँ ।
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
सुनीता ध्यानी – कोई भी पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं की है ।
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
सुनीता ध्यानी – सोशल मीडिया पर हिंदी में लिखती थी । पाठकों ने ही गढ़वाली में लिखने को प्रेरित किया । यद्यपि विद्यार्थी जीवन में लिखा था गढ़वाली में मगर वह सिर्फ अपने तक सीमित था । फिर “धाद” से जुड़ी तो श्रीमती बीना वेंजवाल जी के संचालन में अपनी गढ़वाली कविता पढ़ी ।
आदरणीय जी आपने भी अपनी टिप्पणियों के द्वारा बार-बार गलतियों को सुधारने और कविताओं में नयापन लाने के लिए प्रेरित किया ।
आदरणीय नवानी जी का मार्गदर्शन मिला । बल्कि यूँ कहूँ कि ‘धाद’ से जुड़े सभी कवियों का सानिध्य सकारात्मक रहा ।
आदरणीय पयाश पोखड़ा जी ने गजल शैली में लिखने को प्रेरित किया।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
सुनीता ध्यानी – “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।”
शायद इस कविता के बारे में बचपन में सबसे पहले मुझे यह पता चला कि यह किसी महिला (सुभद्रा कुमारी चौहान) ने लिखी है तब मुझे अच्छा लगा था कि महिला भी लिखती हैं/लिख सकती हैं।
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों ?
सुनीता ध्यानी – सदेई खुदेड़ गीत पढ़ा था तो वही अच्छी लगी । गीतों से इतर बात करूँ तो मुरली दीवान जी की कविताएँ अच्छी लगती हैं, वे लगभग सभी विषयों पर काव्य शैली में अपनी बात कह जाते हैं ।
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
सुनीता ध्यानी – प्रकृति ,प्रेम ,अध्यात्म , समाज ।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
सुनीता ध्यानी – कुछ तुकांत हैं कुछ छंदबद्ध और कुछ अतुकांत।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
सुनीता ध्यानी – जी हाँ।
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
सुनीता ध्यानी – कविता में प्रवाह , विचार और गागर में सागर वाला भाव निहित हो ।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
सुनीता ध्यानी – जी , गढ़वाली में कहमुकरी जैसी रचना, माहिया छंद, बाल पहेली लिखने का प्रयास किया है ।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
सुनीता ध्यानी – प्रकृति का कोई भी दृश्य प्रभावित कर दे , समाजिक उठा-पटक में कोई विचार कौंधे या फिर स्वयं ही मन होता है कभी कुछ रचने का ।
भी . कु. – आप किन-किन लेखकों, कवियों, ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
सुनीता ध्यानी – आपसे प्रभावित हैं आदरणीय। आपने अपना लेखन तो किया ही है , अन्य सभी लेखक और कवियों की रचनाओं को भी संकलित और सुरक्षित किया है । मैं हमारे प्राचीन कवियों व लेखकों से प्रभावित हूँ जिन्होंने छंदबद्ध महाकाव्य, ग्रंथ लिख दिए । आज के समस्त कवि भी उस काल के एक कवि के बराबर नहीं हैं।
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
सुनीता ध्यानी – वैसे तो लगता है कि लेखन स्वान्त्य सुखाय के लिए ही होना चाहिए पर हाँ इसका यह मतलब नहीं कि दूसरों के लिए कष्टकारी लिखें । इसलिए लेखन में कोई न कोई सीख और एक झकझोरने वाली ताकत अवश्य होनी चाहिए कि पढ़ने-सुनने वाले कुछ सकारात्मक सोचने को मजबूर हो जाएँ ।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
सुनीता ध्यानी – जी हाँ काफी हद तक ।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
सुनीता ध्यानी – जी , मैंने अनुभव किया है कि स्त्री विमर्श मुखर होकर लिख दें तो आस-पास से ही विरोध सा होने लगता है । इसके अलावा आज के समाज में किसी भी अनियमितता के बारे में लिखो तो उसे राजनीतिक संदर्भ में ले लिया जाता है ।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
सुनीता ध्यानी – अभी तक तो कुछ नहीं । कुछ पत्रिकाओं और साझा संकलनों में जो भी प्रकाशित हुआ उसमें आप जैसे वरिष्ठ जनों का ही योगदान है ।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
सुनीता ध्यानी – जी मैंने मतदाता दिवस हेतु , भाषा संवर्धन हेतु, शिक्षा के अधिकार के प्रसार हेतु कविताएँ लिखी हैं ।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
सुनीता ध्यानी – जी नहीं ।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
सुनीता ध्यानी – अपने सोशल मीडिया अकाउंट के द्वारा ही लोगों तक पहुँची हूँ । धाद संस्था के द्वारा एवं आदरणीय मोहन जोशी जी द्वारा ‘मोहनकृति’ पटल पर चलाए जाने वाले गढ़वाली भाषा कार्यक्रम में अपनी रचनाओं को सुरक्षित और संकलित किया है ।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
सुनीता ध्यानी – पाठक मुझे सोशल मीडिया पर ही पढ़ते हैं, पुस्तक तो अभी छपवाई नहीं ।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
सुनीता ध्यानी – जी नहीं । साधारण फेसबुक अकाउंट है ।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
सुनीता ध्यानी – जी कुछ कवियों ने अपने चैनल पर मेरी कविताएँ प्रकाशित की हैं ।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
सुनीता ध्यानी – जी नहीं ।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
सुनीता ध्यानी – जी नहीं ।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
सुनीता ध्यानी – विचार महत्वपूर्ण है ।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
सुनीता ध्यानी – सुप्रवाह के साथ सुविचार लिए अंतर्मन को उद्वेलित करने वाली ।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
सुनीता ध्यानी – जी कभी-कभी ।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
सुनीता ध्यानी – शिक्षा को रटन आधारित और पुस्तक आधारित बना दिया हो तो यह सब नहीं हो पाता । परन्तु आज के समय में उत्तराखंड में विभिन्न कार्यक्रमों में गढ़वाली भाषा में सभी कार्यक्रम हो रहे हैं।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
सुनीता ध्यानी – अध्यापिका होने के नाते मैं विद्यार्थियों को अपनी रचनाओं से अवगत कराती हूँ । बाकी सोशल मीडिया ही एकमात्र साधन है ।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
सुनीता ध्यानी – नयी दुनिया, नए विषयों से सम्बन्धित, कुछ नीतिपरक कुछ आनंददायी ।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
सुनीता ध्यानी – जी आज तो हर मोहल्ले में प्रकाशक हैं, जब चाहें,जो चाहें प्रकाशित करवा सकते हैं ।
मगर इसमें समस्या यह है कि गुणवत्तापूर्ण साहित्य किसे माना जाए । इंटरनेट के दौर में पुस्तकें कम पढ़ी जा रहीं हैं जिस कारण पाठक भी निर्णायक नहीं बन पा रहे हैं। किसी पुस्तक की सौ प्रतियाँ बिक जाएँ वही बड़ी बात है , वो जमाना गया जब लाखों प्रतियाँ एक पुस्तक की बिकती थी । गढ़वाली क्या हिंदी की भी नयी पुस्तकें शायद ये आँकड़ा छू पाएँ ।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए ?
सुनीता ध्यानी – ग्रामीण गढ़वाल तो हर बात में पिछड़ ही गया है। गढ़वाली भाषा का शुद्ध रूप यहीं बचा हुआ है मगर गढ़वाली साहित्य से यह क्षेत्र अछूता है । आज भी पढ़ने के लिए पुस्तकों को यहाँ सहर्ष स्वीकार भी नहीं किया जाता, कारण यह बताते हैं कि यह सब पढ़कर क्या होगा , भविष्य में काम तो अंग्रेजी और हिंदी ने ही आना है ।
वर्तमान में विद्यालयों के पुस्तकालयों में गढ़वाली पुस्तकें रखी हुई हैं और नियम से सप्ताह में नियत एक दिन के लिए अभिभावकों को यह पुस्तकें पढ़ने हेतु दी जाती हैं।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
सुनीता ध्यानी – अपने मन के विचारों, प्रश्नों, समाधानों को कागज पर उकेरिए ,अपनी भाषा के शब्दों में पिरोइए, अपनी ऊर्जा भरिए और समाज को संदेश दीजिए। रचनात्मक कार्य में मन लग जाए तो व्यक्ति ऊँचाइयों की ओर बढ़ता है ।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
सुनीता ध्यानी – जी कुछ कहानियाँ लिखी हैं।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
सुनीता ध्यानी – अपने जमाने का लिखें । जो समस्याएँ हैं, जो आवश्यकताएँ हैं, जो समाधान चाहते हैँ उनको रचना बद्ध कीजिए ।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है ?
सुनीता ध्यानी – कविता का संसार बहुत विस्तृत है , हम तो अभी देहरी पर ही हैं, इच्छा ऊँचाइयों पर पहुँचने की सबको होती है ,यह भविष्य पर ही निर्भर है ।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
सुनीता ध्यानी – आंचलिक भाषा को समर्पित प्रकृति के उपासक के रूप में।