जानिये गढ़वाली कवियत्री डॉ शशि देवली से उनके कवित्व पर को उनकी जुवानी
(भीष्म कुकरेती से गढ़वाली कवि की वार्ता -लिखाभेंट )
भीष्म कुकरेती कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जन्म तिथि – 25/02/1977
माता पिता नाम – श्रीमती शकुन्तला डिमरी श्री जनार्दन प्रसाद डिमरी
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – तिरुवनन्तपुरम (केरल ) मूलतः चमोली गढ़वाल उत्तराखंड
शिक्षा – बी एस सी , एम ए , बी एड, एम एड , शिक्षा विशारद,
आधारिक –
मिडल /हाई स्कूल – आइ. टी. बी. पी पब्लिक स्कूल जोशीमठ
उच्च शिक्षा -एम के पी (पी जी ) कॉलेज देहरादून
आजीविका – प्राइवेट नौकरी
सम्प्रति – शिक्षिका
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया
शशि देवली- बाल्यकाल में शिक्षकों से प्रेरणा मिली और प्रत्येक वर्ष स्कूल मैगज़ीन के लिए कविता व कहानी लेखन के प्रति रुझान रहा । यौवनावस्था में आसपास घटित होती कुछ घटनाओं ने दिल को बहुत झकझोर दिया तब अकेलापन लिए शायरी से लिखना शुरू किया और डायरी लेखन की आदत ने लेखन की ओर प्रेरित किया ।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी
शशि देवलीअपनी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में पहली कविता थी ‘सूरज निकला चिड़िया बोली ‘
भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
शशि देवली-साहित्यिक मंचों पर यूँ तो बहुत सी गढ़वाली कविताएँ सुनती रहती लेकिन बहुत प्रभावित तब हुई थी जब मूर्धन्य कवयित्री आदरणीया बीना बैंजवाल दीदी जी की कविता ‘उर्ख्यळी ‘ सुनी ।
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
शशि देवली-गढ़वाली में हाल ही में ‘ब्वारी’ नाम से एक पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसमें साठ (60) कविताएँ हैं ।
भी . कु. – कितने कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं और नाम –
शशि देवली- अब तक कुल सात काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं ।
1) मुड़ के देखना कभी (हिन्दी काव्य संग्रह)
2) मन कस्तूरी ( हिन्दी काव्य संग्रह)
3) उड़ने की चाह (हिन्दी काव्य संग्रह)
4) इश्क से राब्ता (हिन्दी काव्य संग्रह)
5) यादों की दस्तक (हिन्दी काव्य संग्रह)
6)थोड़ा सा आसमान (हिन्दी काव्य संग्रह)
7) ब्वारी ( गढ़वाली काव्य संग्रह)
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
शशि देवली- लगभग 2010 से लिखना शुरू कर दिया था लेकिन मेरे हिन्दी शब्दों के स्पष्ट उच्चारण को देखते हुए किसी ने मुझे गढ़वाली भाषा के साथ स्वीकार नहीं किया । मंचों पर भी मेरी हिन्दी कविताओं को ही सराहना मिली बावजूद इसके मैंने गढ़वाली कविताएँ लिखना बन्द नहीं किया और मैं अपनी लेखन शैली को निखारने का प्रयास निरन्तर करती रही ।
गढ़वाली में बहुत सारे शब्द ऐसे होते हैं जो सीधे और सरलता से सुनने वालों के दिल तक पंहुचते हैं ख़ासतौर पर तब जब हमारा परिवेश गढ़वाली हो ।हालाँकि हमारे चमोली जनपद में बोली जाने वाल गढ़वाली भाषा ठेठ खड़ी भाषा मानी जाती है लेकिन हमारे लिए तो वही कर्णप्रिय रही । हाँ वाचन शैली को थोड़ा लचीला बनाने का प्रयास ज़रूर करना पड़ता है । तो मेरा परिवेश और मातृभूमि के प्रति मेरा लगाव ही रहा जो मुझे गढ़वाली लिखने की ओर प्रेरित करता रहा ।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
शशि देवली- बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी ।
मुझे यह कविता वाचन करना बहुत अच्छा लगता था । मैं बार बार दोहराती थी क्योंकि इस कविता को कहते हुए मेरे चेहरे के भाव और शारीरिक मुद्राएँ भी जोशीली हो जाती थी । रगों में जैसे रक्त प्रवाह की गति में भी तीव्रता आ जाती । एक रोमांचकारी प्रवाह लाने की कोशिश में मैं बार बार यही कविता कहती जाती ।
भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
शशि देवली-
भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
शशि देवली- मैंने अपनी स्वरचित कविताओं में लगभग सभी सामाजिक बिन्दुओं को छूने का प्रयास किया है । फिर भी अगर माने तो प्रकृति और प्रेम – विछोह की कविताओं की प्राथमिकता रही है ।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
शशि देवली- अधिकतर छन्द मुक्त कविता व गीत ।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
शशि देवली- हाँ जी ।
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
शशि देवली- कविताओं के स्वर और अंदाज बदलने चाहिए । क्योंकि समय की तेज रफ़्तार के साथ पाठक जैसे जैसे कम होते जा रहे या कविताओं से विमुख होते जा रहे यह देखते हुए लगता है कि कविताओं की पुरानी धाराओं में नयी गति का प्रवाहित होना अतिआवश्यक है ।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
शशि देवली- हाँ अधिकतर प्रयास रहता है ।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
शशि देवली- भावयुक्त वेग के साथ दार्शनिक तथ्यों की परिपूर्णता जो अंतिम पंक्तियों में सन्देश देती हो ।
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
शशि देवली- राहुल सांस्कृत्यायन , महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर आदि ।
रामायण और महाभारत
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
शशि देवली- समाज में जागृति लाने का प्रयास और भाषा व विचारों का सम्प्रेषण ।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
शशि देवली- हाँ जी बिल्कुल । जन जागृति की कविताओं ने हमेशा ही समाज की दशा और दिशा बदलने का प्रयास किया है । सरकारी ग़ैरसरकारी महकमों के नियमविरुद्ध तथ्यों को प्रमाणिकता के आधार पर उजागर कर जन चेतना यात्रा को सफल बनाया है ।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
शशि देवली- हाँ जी ।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
शशि देवली- अपनी आर्थिकी के अनुसार प्रकाशन व्यवस्था को चुन लेती हूँ ।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
शशि देवली- हाँ जी जनजागरुकता के लिए कई बार वोट देने के लिए लोगों को प्रेरित किया है ।
भी . कु. – क्या किसी पुरूस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
शशि देवली- नहीं- नहीं ।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
शशि देवली- फेसबुक के माध्यम से पोस्ट डालकर और वीडियो बनाकर ।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
शशि देवली- काफ़ी हद तक ।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
शशि देवली- नहीं । बस फ़ेसबुक अकाउंट है ।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
शशि देवली- नहीं । यू ट्यूब चैनल तो है लेकिन उपयोग नहीं कर पाती ।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
शशि देवली- हाँ जी ।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
शशि देवली- नहीं ।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
शशि देवली- सन्देशपरक ।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
शशि देवली- एक अच्छी कविता वो होती है जिसमें भावों, विचारों और शब्दों की मर्यादित व्यवस्था हो ।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
शशि देवली- हाँ जी बराबर ।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
शशि देवली- आज की भौतिकवादी परंपरा और विचारों ने लोगों की मानसिकता को क्षीण कर दिया है । भविष्य के प्रति भय की स्थिति ने लोगों को अवसरों की खोज के लिये विवश कर दिया । गत्यात्मक क्रियाकलापों की दौड़ में गढ़वाली को पीछे धकेला जा रहा है ।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
शशि देवली- कविताओं के निम्मित पुस्तकें पंहुचाकर या विभिन्न विशेष अवसरों पर काव्य पाठ व प्रतियोगिताओं के माध्यम से ।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
शशि देवली- वो भविष्य ही तय करेगा क्योंकि सामाजिक बदलाव कीअवधारणा किस ओर ले जाये क्या पता ।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
शशि देवली- प्रकाशन खर्च अधिक होना
नए लेखकों को आर्थिक सहयोग न मिलना जिसके लिए
सरकारी/संस्थागत अनुदान योजनाएँ होनी चाहिए ।
सह-प्रकाशन (Co-publishing) मॉडल
ई-बुक और प्रिंट-ऑन-डिमांड जैसे विकल्प होने चाहिए गुणवत्ता की समस्या।अधिकांशतः संपादन व प्रूफरीडिंग की कमी
विषय की गंभीर जाँच न होना । जिसके लिए अनुभवी संपादकों की भूमिका अनिवार्य
विषय विशेषज्ञों से समीक्षा
प्रकाशन से पूर्व बहुस्तरीय जाँच जरूरी है ।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
शशि देवली- क्षेत्रवार वितरकों की नियुक्ति होनी चाहिए,
स्थानीय पुस्तक विक्रेताओं, स्कूल–कॉलेज व पुस्तकालयों से समझौता करना चाहिए । और
मेलों, साहित्यिक आयोजनों में स्टॉल लगाना अति आवश्यक है ।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
शशि देवली-खूब पढ़ें, पर नकल न करें
कविता की समझ पढ़ने से गहरी होती है—कबीर, निराला, मुक्तिबोध से लेकर समकालीन कवियों तक।
कविता अनुभव से जन्म लेती है—संघर्ष, प्रेम, प्रकृति, समाज, पीड़ा और खुशी… जितना जीवन को महसूस करेंगे, कविता उतनी सच्ची होगी।भाषा से दोस्ती करें
भारी-भरकम शब्दों से नहीं, भावों से कविता असर करती है। सरल, संवेदनशील और ईमानदार भाषा अपनाएँ।धैर्य रखें, त्वरित प्रसिद्धि न चाहें।
कविता वायरल होने की चीज़ नहीं, टिकने की चीज़ है। समय के साथ परिपक्वता आती है। आलोचना से डरें नहीं
सार्थक आलोचना कविता को माँजती है। अहंकार नहीं, सीखने का भाव रखें।समाज से जुड़ें
आज का कवि सिर्फ़ अपने मन का नहीं, समय और समाज का भी साक्षी होता है। प्रश्न उठाइए, सच लिखिए । नियमित लिखें
हर रचना उत्कृष्ट हो, यह ज़रूरी नहीं—लेकिन लिखना बंद न करें। अभ्यास ही कवि को गढ़ता है।
अंत में
कविता पद या पुरस्कार पाने का साधन नहीं, आत्मा की आवाज़ है। जब मन सच्चा होगा, कविता स्वयं रास्ता बना लेगी।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
शशि देवली- हाँ जी । कुछ छंदों व गीतों का प्रयास कर लेती हूँ ।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
शशि देवली- गढ़वाल की भाषा, लोकगीत, रीति-रिवाज़, प्रकृति, पीड़ा और संघर्ष आपकी कविता की आत्मा हैं। शहर या आधुनिक विषय लिखें, पर जड़ों से कटें नहींगढ़वाली भाषा की शुद्धता और प्रवाह
स्थानीय शब्दों, मुहावरों और उच्चारण का ध्यान रखें।
बुजुर्गों से बातचीत कर भाषा की मिठास सीखें।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
शशि देवली-मैं अपने आप को गढ़वाली कविता संसार में किसी शिखर या सिंहासन पर नहीं, बल्कि सीखते हुए पथिक के रूप में पाती हूँ।
मैं उस परम्परा की कड़ी हूँ जहाँ लोकगीतों की मिट्टी है, माँ की लोरी है, खेत-खलिहान, पहाड़ का दर्द, विस्थापन और उम्मीद—सब साथ चलते हैं।
आज का स्थान अगर कहूँ तो—
संवेदना की धरती पर खड़ी एक साधक जो भाषा को बचाने से अधिक भाषा के भीतर छिपे मनुष्य को खोज रही है।
और जिस स्थान की कल्पना है—
वह किसी पुरस्कार, मंच या प्रसिद्धि का नहीं,
बल्कि उस दिन का है जब कोई कहे—
इस कविता में हमारा पहाड़ बोलता है।
भीष्म – आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?
—यदि कोई यह कह दे कि
“इस कवि ने हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखा और अपने समय से सवाल करना सिखाया,”
तो वही मेरा सबसे बड़ा काव्य-परिचय होगा ।