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विश्व का अकेला *अस्पताल* यहां डाक्टर खुद होते हैं *बीमार*

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कौन करेगा चमोली के बीमार अस्पतालों का ईलाज, १७० के सापेक्ष महज ४१ डॉक्टर कार्यरत, यहाँ ट्रांसफ़र होने वाले अधिकतर डॉक्टर हो जातें है बीमार

 

उदय दिनमान डेस्कः विश्व का अकेला *अस्पताल* यहां डाक्टर खुद होते हैं *बीमार* । है ना अजीब बात। लेकिन यह सत्य है और इस सत्य को आप जानेंगे तो आपके होश उड जाएंगे। आप सोच रहे होंगे कि यह भी कोई भूत प्रेत की कहानी की तरह है, लेकिन ऐसा नहीं है। यहां तो हम अकेले चमोली जिला मुचयालय की बात कर रहे है, लेकिन पहाड में हर अस्पताल के यही हाल है और पहाड में लोग भगवान भरोसे है और भगवान ही यहां के डाक्टर हैं। अगर ऐसा नहीं है तो क्यों सरकार और स्वास्थ्य महकमा चुप है। आइए जानते है इस स्टोरी के बारे में विस्तार से।

 

उत्तराखंड का सीमांत जनपद चमोली सामरिक, धार्मिक और पर्यटन के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण जनपद है। हिन्दुओं के आस्था का सर्वोच्च धाम बैकुंठ धाम बद्रीनाथ से लेकर सिखों के पवित्र स्थल हेमकुंड तक इसी जनपद में स्थित है। इसके अलावा प्रकृति ने इस जनपद में अपना सब कुछ न्योछावर किया है। विश्व प्रसिद्ध हिमक्रीडा स्थल औली से लेकर, फूलों की घाटी, और देश की द्वितीय रक्षापंक्ति नीति-माणा की घाटी सहित ऐतिहासिक नंदा देवी राजजात का पूरा परिक्षेत्र इसी जनपद में है।

 

 

हर साल इस जनपद में लाखों तीर्थयात्री और पर्यटक आतें हैं। अगर इसी साल की बात करें तो अब तक ६ लाख १० हजार से भी अधिक तीर्थयात्री बद्रीनाथ आ चुकें हैं। तो ७० हजार से अधिक श्रदालु हेमकुंड साहिब की यात्रा कर चुकें हैं। जबकि १ हजार से अधिक पर्यटक फूलों की घाटी पहुँच चुके है।लेकिन इन सबके बाबजूद सामरिक दृष्टी से अति महत्वपूर्ण चमोली की स्वास्थ्य सेवाएँ वर्तमान में बैकुंठ धाम बद्रीनाथ के भरोसे ही चल रही है।

 

 

लोगों को अस्पताल से ज्यादा भगवान् बद्रीविशाल पर ही भरोसा होता है, हो भी क्यों न –?? क्योंकि विगत 17 सालों से सूबे के अधिकतर अस्पताल फार्मासिस्ट और डॉक्टरों के आभाव में सफ़ेद हाथी साबित हो रहें हैं। जनपद में १७० के सापेक्ष महज ४१ डाक्टर वर्तमान में कार्यरत हैं। हालत इस कदर गंभीर है की कई अस्पतालों ने आज तक डॉक्टर देखा ही नहीं!वहीँ अधिकतर अस्पताल महज पर्ची काटने के रेफर सेंटर बनें हुयें हैं। जहाँ मरीज को ईलाज के नाम पर रेफर की पर्ची पकड़ा दी जाती है।

 

और मरीज को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। जनपद के जोशीमठ, घाट, पोखरी, देवाल, गैरसैण, नारायणबगड, थराली, दशोली, कर्णप्रयाग ब्लाक में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति दयनीय बनी हुई है। अगर जनपद में स्वास्थ्य सेवाओं की बात की जाय तो यहाँ पर सबसे बड़े अस्पताल के रूप में जिला अस्पताल गोपेश्वर है। जहाँ स्वीकृत ३६ पदों के सापेक्ष २० पद खाली है। पहले से ही डॉक्टर की कमी झेल रहे अस्पताल से हाल ही में ४ डॉक्टरों का स्थानान्त्र्ण अन्यत्र हो गया है। जिससे डॉक्टरों के आभाव में जिले का सबसे बड़ा अस्पताल खुद ही बीमार हो गया।

 

जब जिले के मुख्य अस्पताल की ऐसी दुखद स्थिति है तो सुदूरवर्ती इलाकों की स्थिति क्या होगी खुद ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जोशीमठ, पोखरी, कर्णप्रयाग, थराली में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी डॉक्टरों का अभाव बना हुआ है। जबकि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर राजकीय एलोपेथिक अस्पताल और स्वास्थ्य उपकेंद्रों की कहानी तो अत्यंत ही दुःखदाई है। जबकि सूबे की जनाकांक्षाओं की राजधानी गैरसैंण के अस्पताल को पीपीपी मोड़ में दिए जाने के बाद से उक्त अस्पताल लाईलाज बना हुआ है।

 

ऐसे में इस अस्पताल से लोगों की उमीदें बेईमानी है। कई मर्तबा उक्त अस्पताल को पीपीपी से हटाकर वापस सरकार को संचालित करने की मांग को लेकर लोगों ने जनांदोलन भी किया पर नतीजा सिफर तक ही सिमित होकर रह गया है। वहीँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पीपलकोटी को लम्बे समय से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बनाये जाने की मांग स्थानीय लोगों द्वारा की जा रही है।

 

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा इसके उच्चीकरण की घोषणा भी बंड मेले के दौरान की गई थी। परन्तु आज तक अस्पताल के उच्चीकरण की पत्रवाली कहाँ है किसी को नहीं मालूम।प्राकृतिक आपदाओं और भूस्खलन की दृष्टि से अतिसंवेदनसील जनपद की सुध लेने वाला कोई नहीं है! तंत्र नींद में सोया है तो नीति नियंताओ के पास समय ही नहीं चमोली के वाशियो की समस्याओं के समाधान का!

 

इसे चमोली के लोगों का दुर्भाग्य ही कहेंगे की हर साल होने वाले डॉक्टरों के ट्रांसफर में यहाँ से मैदानी जनपदों में स्थानांतरित होने वाले डॉक्टर तबादला सूची जारी होने के अगले ही दिन नई तैनाती स्थल में कार्यभार ग्रहण कर लेतें हैं। जबकि मैदानी इलाकों से चमोली तबादला होने वाले अधिकतर डॉक्टर यहाँ आने से पहले ही खुद बीमार होकर लम्बी छुटी पर चले जातें हैं।

 

और यहाँ आने की जहमत तक नहीं उठातें हैं। और कुछ महीनों बाद पता चलता है की उनका यहाँ से भी तबादला हो गया है। विगत कई सालों से यही परिपाटी चली आ रही है। जिसका ताजा उदहारण विगत दिनों डॉक्टरों के तबादलों में भी देखने को मिला यहाँ से मैदानी इलाकों में तबादला होने वाले डॉक्टर तो यहाँ से चले गये लेकिन मैदानी जनपदों से चमोली तबादला होने वाले डॉक्टर आज दिन तक नहीं पहुंचे(12 डाक्टर का तबादला हुआ है चमोली के लिए)।

 

जबकि शासन द्वारा स्पष्ठ निर्देश भी दिए जा चुकें हैं की जून महीने का वेतन नये तैनाती स्थल से ही मिलेगा। फिर भी इसका कोई असर अभी तक देखने को नहीं मिला है। अब ये देखना दिलचस्प होगा की चमोली के हिस्से आये डाक्टर कब तक तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण करते हैं।

 

वास्तव में जनपद चमोली में अभिभाजित उत्तरप्रदेश के समय में स्वास्थ्य सेवाएँ राज्य गठन के बाद से ज्यादा मजबूत थी। सीमिति संसाधनों के बाद भी उस समय यहाँ पर बीमार ब्यक्तियों का इलाज और शल्यचिकित्सा होती थी। लेकिन राज्य बनने के बाद से तो स्थिति बद से बदतर हो गई है। जिले के लिए स्वीकृत बेस अस्पताल और महिला बेस अस्पताल भी घोषणाओं और कागजो में कहीं खो गये हैं। ऐसे में किससे उम्मीद लगाएँ सीमांत के वाशिन्दे——–????

 

हे बद्रीनाथ अस्पताल में डॉक्टर जब आयेंगे तब आयेंगे, बरसों से तेरे भरोसे हैं, सीमांत के वाशियों पर अपनी कृपा यों ही बनाये रखना !!!!

 संजय चौहान की फेसबुक वाल से साभार

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