वादियों के प्रदेश में आईएएस अफसरों के हाथों की कठपुतली बनी सरकार

देहरादून । उत्तराखण्ड में सरकार के मुखिया भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस के दावे करते हुए नहीं थक रहे और उन्होंने राज्य में स्वच्छ प्रशासन देने की हुंकार लगाई लेकिन मात्र सौ दिन से पहले ही उत्तराखण्ड सरकार आईएएस लॉबी के हाथों की कठपुतली बनती हुई नजर आ रही है?

 

सरकार ने दावे किये थे कि लोकायुक्त का गठन किया जायेगा लेकिन दावे करने वाली सरकार लोकायुक्त से डर गई और उसे प्रवर समिति के हवाले कर दिया गया। वहीं पूर्व राष्ट्रपति के हाथों अवार्ड हासिल करने वाले तेज तर्रार आईएफएस अफसर भी उत्तराखण्ड की आंखों में ऐसी किरकिरी बने की उन्हें वन अनुसंधान में तैनात कर उन्हें खामोश कर दिया गया?

 

हरियाणा व दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ बडी जंग लडने वाले आईएफएस अफसर को विजिलेंस विभाग में तैनात करने से सरकार आज तक डरी हुई नजर आ रही है? वहीं तेज तर्रार आईपीएस अफसर अभिनव कुमार को उत्तराखण्ड बुलाने के लिए सरकार के मुखिया ने गृहमंत्री को पत्र लिखा लेकिन चंद दिन बाद चर्चा है कि आईएएस अफसरों की एक लॉबी के कहने पर अभिनव कुमार को उत्तराखण्ड से आने से रोक दिया गया

 

केन्द्रीय गृहमंत्री को पत्र लिख दिया गया कि उन्हें अभिनव कुमार की जरूरत नहीं है? हैरानी वाली बात है कि जो आईपीएस अफसर बीएसएफ में स्पेशल ऑपरेशन के चीफ के पद पर तैनात रहकर भारत के दुश्मन पाकिस्तान से भारत सीमा पर लोहा ले रहे हैं उस अफसर का सरकार ने जिस तरह से अपमान किया है उससे उत्तराखण्ड सरकार पर सीधा दाग लग रहा है कि वह चंद आईएएस लॉबी के हाथों की कठपुतली बनी हुई है?

 
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड सरकार को अस्तित्व में आये अभी 100 दिन भी पूरे नहीं हुए लेकिन सरकार में शामिल कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने जिस तरह से राज्य की ब्यूरोक्रेसी पर बडा हमला करते हुए सरकार को कटघरे में खडा किया था उससे साफ नजर आ रहा था कि प्रचंड बहुमत वाली सरकार में भी ब्यूरोक्रेसी हावी है?

 

हरक सिंह रावत जैसे नेता द्वारा ब्यूरोक्रेसी पर हमला करना इस ओर इशारा कर गया कि शायद सरकार में फैसले चंद आईएएस अफसर ही ले रहे हैं? मात्र 100 दिन से पहले ही जिस तरह से सरकार के भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस के दावे हवा हवाई होते हुए दिखाई दे रहे हैं उससे सरकार कटघरे में खडी हुई है।

 

सवाल खडे हो रहे हैं कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो भ्रष्टाचार पर हरीश रावत को जमकर घेरते हुए उन्हें निशाने पर लिया था और राज्य में सरकार आने के बाद उत्तराखण्ड पर खुद नजर रखने के दावे किये थे लेकिन उनके यह दावे तो अभी तक राज्य में परवान चढ़ते हुए नजर नहीं आ रहे?

 

सरकार भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लडने का दम भर रही हो लेकिन जिस तरह से आईएफएस अफसर संजीव चतुर्वेदी को प्रचंड बहुमत वाली सरकार ने कुमांऊ के वन अनुसंधान में तैनात कर उन्हें हाशिये पर डाला है उससे सरकार की भ्रष्टाचार से लडने की मुहिम पर बडे सवाल उठने लगे हैं?

 

अगस्त 2005 में पूर्व राष्ट्रपति रहे ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने संजीव चतुर्वेदी को इंदिरा गांधी नेशनल फोरेस्ट देहरादून से ट्रेनिंग पूरी करने पर अवार्ड दिया था वहीं 2009 में भी संजीव को अवार्ड से नवाजा गया तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई लडने के लिए संजीव चतुर्वेदी को 2011 में एसआर जिंदल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था जिसमें उन्हें दस लाख रूपये नगद भी मिले थे।

 

वहीं 2012 से 2014 तक संजीव चतुर्वेदी एम्स में चीफ विजिलेंस के पद पर तैनात रहे और उन्होंने वहां भ्रष्टाचार के खिलाफ बडी लडाई लडी थी तथा 2015 में उन्हें रेमन मैगसेसे अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा लडाई लडने वाले संजीव चतुर्वेदी को विजिलेंस में तैनात न करके सरकार ने साफ संदेश दे दिया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लडना उसकी कोई प्राथमिकता नहंी है?

 

वहीं 18 मई को तेज तर्रार आईपीएस अभिनव कुमार को उत्तराखण्ड बुलाने के लिए मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा तो यह बात उठी कि उन्हें मुख्यमंत्री का सचिव बनाया जायेगा इससे चंद आईएएस लॉबी ने सरकार पर दबाव बनाकर अभिनव कुमार को उत्तराखण्ड न आने देने के लिए एक बार फिर राजनाथ सिंह को मात्र चंद दिन बाद ही दूसरा पत्र भिजवा दिया। सरकार की इस मंशा से वह कटघरे में खडी हुई है और अब यह साफ झलक रहा है कि उत्तराखण्ड सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लडने वाले अफसरों को अपने से दूर रखना चाहती है?