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उत्तराखंड के चारधामः शीतकालीन गद्दीस्थलों में देवदर्शन

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उत्तराखण्ड के सुप्रसि( चारधामों से देव-डोलियाँ शीतकाल के लिए अपने विश्राम स्थलों में पहुंच गयी है। अब शीतकाल के छः माह इन्हीं धामों में भगवान बद्री विशाल, बाबा केदार, मां गंगा और मां यमुना की विधिवत पूजाएं सम्पादित हो रहीं हैं। प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन पवित्र धामों की पूजाएं मानव तथा देवताओं द्वारा बारी-बारी से की जाती हैं। इसलिए छः माह के अंतराल के बाद पूजाओं का क्रम परिवर्तित कर दिया जाता है। एक दूसरे के साथ तारतम्य बना रहे इसलिए उत्सव मूर्तियाँ मुख्य मंदिरों से शीतकालीन गद्दीस्थल में लाई जाती है जिससे मानवों को अपने आराध्यों को पूजने और देखने का अवसर प्राप्त होता है। डोलियों के अपने विश्राम स्थलों पर पहुंचने के साथ ही शीतकालीन चार धाम यात्रा की विधिवत शुरूआत हो चुकी है। चारधाम यात्रा के साथ यहां पर्यटन की दृष्टि से भी शीतकालीन यात्रा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी पर केंद्रित दीपक बेंजवाल का यह विशेष आलेख। संपादक
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उत्तराखंड के चारधामों के कपाट बंद होने के बाद शीतकालीन गद्दीस्थल भी चारधामों की तरह ही पवित्र और गहरी लोकमान्यताओं से जुड़े हैं। धर्मग्रन्थों में इन शीतकालीन गद्दीस्थलों की महत्ता का सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है। छः माह के प्रवास में यही गद्दीस्थल मुख्य मंदिर की तरह आस्था की पवित्र डोर को प्रवाहित करते रहते है।आपदा की दृष्टि से भी शीतकाल में यात्रा बरसात के महीनों से अधिक सुरक्षित माना जा रहा है। अधिकतर गद्दीस्थल उच्च हिमालयी क्षेत्र से पर्याप्त दूरी पर है अंौर पूरे वर्षभर यहाँ मानवीय आबादी निवास करती है। सरकार यातायात तथा आवास की अच्छी व्यवस्था करें तो तीर्थयात्रियों को आकर्षित किया जा सकता है। पर्यटन की दृष्टि से भी यह समय पर्यटकों को खासा आकर्षित करता है। बाबा केदार के शीतकालीन गद्दीस्थल ऊखीमठ को छोड़कर अन्य गद्दीस्थलों में बर्फवारी का आंनद भी लिया जा सकता है।
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ऊखीमठ में श्री केदारनाथ-ऊखीमठ बाबा केदार का शीतकालीन गद्दीस्थल है। रूद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से महज 30 किमी की दूरी पर स्थित इस स्थान की खूबसूरती देखते ही बनती है। धार्मिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं को अपने आँचल में समेटे केदारघाटी के मध्य हिमालयी भू-भाग में बसा ऊखीमठ अनादिकाल से साधना एवं आस्था का केन्द्र रहा है। यह स्थान जहाँ धर्मिक गाथाओं से ओतप्रोत है, वहीं प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण होने के कारण मनोहारी भी है। ऊखीमठ नागपुर परगने के मल्ला कालीफाट में मन्दाकिनी के बायें तट पर एक पहाड़ी की गोद में 1311 ीटर ऊँचाई पर बसा है। बाणासुर की कन्या ऊषा की तपस्थली होने के कारण ही इसे ऊषामठ कहा गया। ऊषा का गढ़वाली भाषा में उच्चारण ऊखा और इसी कारण से ऊषामठ ऊखामठ अर्थात वर्तमान में ऊखीमठ नाम से प्रसि( है। शीतकाल के छः माह भगवान केदारनाथ का पूजा-अर्चना ऊखीमठ के आंेकारेश्वर मन्दिर में की जाती है। यही पर रावलों का भव्य निवासगृह एवं श्री बदरीनाथ केदारनाथ मन्दिर समिति का कार्यालय भी मौजूद है। वैदिक साहित्य में ऊखीमठ का एक नाम मान्धाता भी है। स्कन्द पुराण के केदारखण्ड के 19 वें अध्याय के कुवलाशव के वंश वर्णन के श्लोक संख्या एक से छह में सतयुग के महाप्रतापि राजा कुवलाशव की पांचवी पीढ़ी में यौवनाश्व नाम से मान्धता वर्णन मिलता है। माँ की कोख से पैदा न होने के कारण बालक का नाम मान्धाता रखा
गया। समय रहते मान्धाता चक्रवती सम्राट बना और सुखपूर्वक गृहस्थ आश्रम के उपरांत हिमालय की गोद में आकर ऊखीमठ में भगवान शंकर की तपस्या में लीन हो गया। राजा मांधता की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें ओंकारेश्वर रूप में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। जिस पर राजा मांधता बोले की प्रभु आपको विश्व कल्याण व भक्तों के उ(ार के लिए यहीं निवास करना होगा। तब से लेकर वर्तमान समय तक भगवान शंकर यहीं पर आंेकारेश्वर रूप में तपस्यारत हैं। इसी कारण इस स्थान को मान्धता नाम से भी जाना गया है। आज भी केदारनाथ की बहियों का प्रारंभ जय मान्धता से होता है।

पूजा व्यवस्था- ओंकारेश्वर मंदिर में प्रातः एवं सांयकालीन पूजाए होती है। प्रातःकाल में भगवान का जलाभिषेक व श्रृगांर किया जाता है। जबकि सायं को आरती की जाती है। मंदिर का पुजारी केदारनाथ के रावल द्वारानियुक्त दक्षिण भारतीय लिंगायत होता है।
तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए मंदिर समिति के वेदपाठी व आचार्य भी यहाँ तैनात होते है।
कैसे पहुंचे – देश की राजधानी दिल्ली से ऊखीमठ की दूरी 405 किमी है। दिल्ली से हरिद्वार, )षिकेश, देवप्रयाग,रूद्रप्रयाग होते हुए ऊखीमठ पहुंचा जा सकता है। नगर से एक छोटी सड़क मुुख्य मंदिर को जाती है।
जाश्षीमठ-पाण्डुकेश्वर में श्री बदरीनाथ-जोशीमठ-पाण्डुकेश्वर भगवान बद्रीविशाल का शीतकालीन गद्दीस्थल है। नवम्बर माह में बदरीनाथ के कपाट बंद होने पर भगवान कुबेर व उ(व जी चलविग्रह मूर्तियाँ शीतकालीन पूजा के लिए पाण्डुकेश्वर लायी जाती है। जबकि शंकराचार्यजी की गद्दी को जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में रखा जाता हैं। मंदिरों के हर प्राचीन शहर की तरह जोशीमठ भी ज्ञानपीठ है जहाँ आदि गुरू शंकराचार्य ने भारत के चार मठों के पहले मठ ‘ज्योर्तिमठ’ की स्थापना की। यहीं उन्होंने शंकर भाष्य ग्रंथ की रचना की जो सनातन धर्म के सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। पैनखंडा परगना मंे समुद्रतल से साढ़े छह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थितजोशीमठ के कण-कण में आध्यात्मकिता ी छाप मिलती है। भगवान विष्णु से इस नगरी का संबध पुराकल से अनेकदुर्लभ मान्यताए लिए है। नगर के बीचों-बीच स्थित नृसिंह मंंिदर वैष्णव सभ्यता का प्रमुख तीर्थ है। नृसिंह मंदिर में
भगवान विष्णु शालीग्राम शिला में श्यामल व सुखासन में बैठी मुद्रा में है। नृसिंह को विष्णु का अवतार माना जाता है। जिन्हें दूधाधारी नृसिंह के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डुकेश्वर अलकनन्दा के पावन तट पर बसा हुआ प्रमुख धार्मिक तीर्थ है। यहाँ भगवान बदरीविशाल साक्षात योगध्यान अवस्था में विराजमान हैं। शीतकाल में भगवान बद्रीनाथ के प्रतिनिधि उ(व जी एवं कुबेर जी चलविग्रह मूर्तियाँ यहाँ लाई जाती हैं, जिससे मंदिर के दर्शनों का फल दुगणित हो जाता है। मंदिर सालभर खुला रहता है, यहाँ डिमरी ब्राह्मणों द्वारा नियमित पूजाए की जाती है। तिब्बत-चीन सीमा के कारण यह सीमांत के व्यापार का पुराना परम्परागत बाजार होने के साथ-साथ बदरीनाथ, औली तथा नीति घाटी का केन्द्र बिन्दु होने के कारण जोशीमठ एक महत्पूर्ण पर्यटन स्थल है, जहाँ वर्षभर पर्यटकों का जमावाड़ा लगा रहता है। शीतकाल में जोशीमठ के नजदीक स्थित ‘औली’ में अर्न्तराष्ट्रीय स्तर की विंटर गेम्स ‘हिमक्रिड़ाएँ’ आयोजित की जाती हैं। इस दृष्टि से भी जोशीमठ शीतकालीन यात्रा की संभावनाओं में सबसे अधिक आय वाला स्थान बन सकता है।
कैसे पहुंचे -जोशीमठ-पाण्डुकेश्वर पहुंचने के लिए दिल्ली से सड़क द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस स्थान पर रहने, खाने की अच्छी सुविधाए उपलब्ध हैं।
मुखबा ;मुखवासद्ध गांव में माँ गंगा-मुखबा गाँव जिसे मुखवास गांव भी कहते हैं, हिन्दुओं के लिए बड़ा धार्मिक महत्व रखता है। शीतकाल में माँ गंगा की भोगमूर्ति को इस गाँव में लाया जाता है। मुखबा में गंगोत्री मंदिर जैसा ही मंदिर निर्मित है। यह गांव में गंगोत्री धाम के तीर्थपुरोहितों का मूल गांव भी है, और वही इस मंदिर में माँ गंगा की नियमित पूजाए सम्पादित करते है। लंबे समय से तीर्थ पुरोहित मुखबा गांव को शीतकालीन यात्रा से जोड़ने की मांग करते रहे है। लेकिन इस दिशा में कभी ठोस प्रयास हुए ही नहीं है। बीते वर्ष उत्तरकाशी से हर्शिल होते आठ किमी की कच्ची सड़क काटी गई है। जिस पर वाहन चलाना जोखिम भरा है। इस मार्ग के उपयोग के लिए स्थानीय टैक्सी चालकों की मदद लेनी आवश्यक है। दिसम्बर के अंत तक मुखबा को जाने वाली यह सड़क पूरी तरह बर्फ से ढक जाती है। जिससे आवाजाही बिल्कुल ठप्प हो जाती है। गांव में आवास, भोजन, बिजली व संचार जैसी बुनियादी सुविधाए अभी भी कामचलाऊ हालत में है जिन्हें सुधारे जाने की आवश्यकता है। मुखबा के पास धराली और हर्षिल दर्शनीय स्थल है।
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कैसे पहुंचे- जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से 75 किमी और )षिकेश से 180 किमी0 की दूरी तय कर मुखबा गांव पहुंचा जा सकता है। हर्षिल तक सड़क अच्छी हालत में है। हर्षिल से आठ किमी की कच्ची सड़क मुखबा को जोड़ती है।
खरसाली गांव में माँ यमुना-खरसाली माँ यमुना का शीतकालीन प्रवास है, जिसे ‘खुशीमठ’ भी कहा जाता है। यमुना जी के तट पर बसे खरसाली गांव को माँ यमुना का मायका भी माना जाता है जहाँ उनके भाई शनि देव का मंदिर भी है। यह गांव यमुनाजी के पुरोहितों का गांव है जो यमुनोतरी और खरसाली में माँ यमुना की पूजाए सम्पादित करते हैं। गांव में दो मुख्य मंदिर है पहला शनि देव का है, जो उत्तराखण्ड का इकलौता शनि मंदिर है। किलेनुमा परम्परागत पहाड़ी शिल्प में बने 16 कमरों वाले चार मंजिले मन्दिर में शनि देव की चल मूर्ति की पूजा अर्चना की जाती है। गांव में एक अन्य छत्र शैली का मन्दिर भी है जहाँ शनि देव की डोली रखी जाती है। यहाँ एक शिला के रूप में शनि देव की अचल मूर्ति भी स्थापित है। शनि तीर्थ के पुजारियों तथा शनि अष्टक जैसे प्राचीन ग्रंथों पर विश्वास करें तो यहां तीन दिन पूजा अर्चना करने से शनिदेव भक्तों को कष्टों से छुटकारा दिला देते हैं। दशरथ कृत शनि अष्टक के पांचवे श्लोक में कहा गया है कि ‘प्रयाग कुले यमुना तटे वा सरस्वती पुण्य जले गुहाय, यो योगिनां ध्यान गतो अपि सूक्ष्म तस्मे नमः श्री रवि नन्दनाय’।
सावन संक्रान्ति को खरसाली में तीन दिवसीय शनि देव मेला लगता है, मन्नत पूरी होने पर श्र(ालु शनि देवता की डोली को चारधाम यात्रा पर भी लेकर जाते है। एक मंदिर माँ यमुना का है जहाँ यमुनाजी की भोग मूर्ति स्थापित की जाती है। जिसके पुजारी यमुनोत्री मंदिर के रावल हैं। माँ यमुना के शीतकालीन प्रवास के साथ-साथ राज्य के इकलौते शनि मंदिर के कारण वर्षभर श्र(ालु यहाँ आते रहते है। यमुना जी की घाटी में बसा यह क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता का खजाना लिए है। यदि शासन-प्रशासन इसका उचित प्रचार-प्रसार करें तो यात्री और बड़ी संख्या में पर्यटक व श्र(ालु यहां पहुंच सकते हैं।
कैसे पहुंचे – हरिद्वार से बाया )षिकेश होते बड़कोट, जानकीचट्टी होते हुए 222 किमी का सफर कर खरसाली पहुंचा जाता है। एक दूसरा रास्ता देहरादून-मसूरी-नैनबाग-बड़कोट होते हुए भी है। इस मार्ग से विश्वप्रसि( पर्यटक स्थल मसूरी के भी दर्शन किए जा सकते हैं।
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पाण्डुकेश्वर में यज्ञोपवीत, त्रियुगीनारायण में विवाह

शीतकाल पर्यटन एवं चार धाम यात्रा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उत्तराखण्ड सरकार ने लुभावने धार्मिक पैकेज घोषित करने जा रही है। ऑफ सीजन में भगवान बदरीविशाल के दर्शन को आने वाले यात्रियों के लिए पाण्डुकेश्वर मंदिर में यज्ञोपवीत संस्कार व बाबा केदार के दर पर मत्था टेकने वालों के लिए त्रियुगीनारायण मंदिर में विवाह संस्कार की मुफ्त सुविधा मुहैया करवाई जायेगी। इस धार्मिक पैकेज की खासियत यह है कि ये संस्कार बदरीनाथ व केदारनाथ मंदिर के धर्माधिकारियों व वेदपाठियों की मौजूदगी में होंगे जिनका आयोजन श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति करेगी। इसके अलावा गंगोत्री व यमुनोत्री की शीतकालीन यात्रा के धार्मिक पैकजों पर भी विचार-विमर्श किया जा रहा है ताकि धार्मिक संस्कारों के रियायती पैकेज की डोर भक्तों को देवभूमि की ओर खीच सकें। धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु के धाम में यज्ञोपवीत ;जनेऊद्ध संस्कार का काफी महत्व होता है, लिहाजा शीतकाल में बदरीविशाल के दर्शन को आने वाले भक्तों के लिये पाण्डुकेश्वर स्थित योगधाम बदरी मंदिर में इस महत्वपूर्ण संस्कार को मुफ्त करने का प्रस्ताव रहेगा। जबकि बाबा केदार के भक्तों को केदारघाटी में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर में विवाह संस्कार का निशुल्क धार्मिक पैकेज उपलब्ध करवाया जायेगा। दरअसल धार्मिक मान्यता है कि त्रियुगीनारायण मंदिर में ही त्रेतायुग में भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। विवाह के दौरान देवताओं ने अपनी शक्ति से वेदी में विवाह अग्नि पैदा की थी जो आज भी प्रज्जवलित है। इसी कारण मंदिर में विवाह बधंन में बंधना अति शुभ व सौभाग्य माना जाता है।

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