udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news उत्तराखंड में स्थित रूपकुड के ‘रूप’ का ‘रहस्य’दबा है अरबों का खजाना

उत्तराखंड में स्थित रूपकुड के ‘रूप’ का ‘रहस्य’,दबा है अरबों का खजाना !

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रूपकुंड श्री नंदा देवी राजजात का अद्भुत, अलौकिक, अतुलनीय, अति प्राचीन, अविस्मरणीय और अति दुर्लभ पड़ाव

हिमालय की श्रृंखलाओं और कंदराओं में अनेकों रहस्य छिपे हैं। इनकी जितनी खोज की जाए, उतने ही रहस्य सामने आते जाते हैं। प्राचीन काल से ही जिज्ञासु और पर्यटक इन आकर्षक एवं मनमोहक स्थलों को देखने के लिये यहां आते रहे हैं। इतिहास इस बात की पुष्टि करता है। हिमालय की गोद में उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में एक ऐसे ही रहस्य को समेटे हुए है रूपकुंड। रूपकुण्ड के रहस्य को भेदने के दावे तो बहुत होते हैं लेकिन आज भी रूपकुण्ड के नरकंकाल रहस्य ही बने हुए हैं। इस बर्फीली झील के आस-पास सैकड़ों नरकंकाल बिखरे पड़े हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इन नरकंकालों की संख्या सैकड़ों में है। इनका रहस्य सैकड़ों वर्ष पुराना है। वर्षों तक यह कुंड दुर्गम होने के कारण अज्ञात रहा था। इसी पर केंद्रित यह खास आलेख।

संतोष बेंजवाल
चमोली जनपद के सीमांत देवाल विकासखंड में नंदाकोट, नंदाघाट और त्रिशूल जैसे विशाल हिमशिखरों की छांव में चट्टानों और पत्थरों के विस्तार के बीच अवस्थित रूपकुंड एक ऐसा मनोरम स्थल है, जो अपनी स्वास्थ्यवर्धक जलवायु, दिव्य, अनूठे रहस्यमय स्वरूप और नयनाभिराम दृदृश्यों के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि एक बार कैलाश जाते समय देवी नंदा को प्यास लगी। नंदा के सूखे होंठ देख भगवान शिव ने चारों ओर देखा, परंतु कहीं पानी नहीं दिखाई दिया।

 

सो उन्होंने अपना त्रिशूल धरती पर गाड़ दिया और वहां से कुंडाकार में जलधारा फूट पड़ी। नंदा ने कुंड से पानी पिया और उसके स्च्च्छ जल में स्वयं को शिव के साथ एकाकार देख आनंदित हो उठी।तब से यह कुंड रूपकुंड और शिव यहां का पर्वत त्रिशूल और नंदा-घुंघटी, उससे निकलने वाली जलधारा नंदाकिनी कहलाई।समुद्रतल से 5029 मीटर ;16499 फीटद्ध कि ऊचाई पर स्थित रूपकुंड जिसके चारो और ऊचे-ऊचे बर्फ के ग्लेशियर हैं। यह झील यहाँ पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित हैं। यहाँ पर गर्मियों मैं बर्फ पिघलने के साथ ही कही पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात हैं।

 

यहाँ तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी मैं भी नरकंकाल पड़े दिखते हैं। यहाँ पर सबसे पहला नरकंकाल 1942 मैं खोज गया था। तब से अब तक यहाँ पर सैकड़ों नरकंकाल मिल चुके हैं। जिसमे हर उम्र व लिंग के कंकाल शामिल हैं। यहाँ पर इतने सारे नरकंकाल आये कैसे इसके बारे मैं तीन अलग अलग कहानियां प्रचलित हैं। इतिहास के पन्नों में उल्लेखित है कि 40 गुणा 30 फीट लंबाई-चौड़ाई में सिमटी भयानक हिमकगारोंयुक्त कुंड आकृति वाली इस हिमानी झील का नाम सर्वप्रथम 1898 में ब्रिटिश अन्वेषकों को ज्ञात हुआ। 1907 में त्रिशूली अभियान पर निकले लौंगस्टाफ होमकुंड गली ;पासद्ध तक पहुंचे थे।

 

उन्होंने वहां अस्थि-पंजर, चप्पल आदि वस्तुओं का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया है। 1927 में अल्मोड़ा के डिप्टी कमिश्नर रटलेज ने आधुनिक पर्वतारोहण उपकरणों से लैस होकर त्रिशूली अभियान किया, परंतु वे भी होमकुंड गली से आगे नहीं बढ़ सके। 1883 में पुनरू ग्राह्मा ने भी इसी रास्ते से एक असफल पर्वतारोहण अभियान किया था। 1942 में वन विभाग के एक अधिकारी मधवाल और स्काटिश ले.हेमिल्टन जब रूपकुंड पहुंचे तो उन्हें भी चप्पलें और अस्थि अवशेष प्राप्त हुए थे।

 

1955 में मधवाल को फिर तत्कालीन उपवन मंत्री जगमोहन सिंह नेगी के साथ वहां जाने का अवसर मिला और तब रूपकुंड के कंकालों के नृवंश का और ऐतिहासिकता का अन्वेषण आरंभ हुआ। निष्कर्ष यह निकला कि ये अवशेष कम से कम 650 वर्ष पुराने हैं, जिसमें 150 वर्ष की वृ(ि या कमी की जा सकती है।लोक मान्यताओं और कथाओं में कन्नौज के राजा यशधवल की सेना के साथ कैलाश की यात्रा देवी के कुपित होने से सैकड़ों सैनिकों एवं लोगों के हिमशिखरों के नीचे रूपकुंड के समीप दब जाने से मौत होने का जिक्र है। ये नरकंकाल उन्हीं लोगों के हैं। साहित्यकार यमुना दत्त वैष्णव कहते हैं कि गढ़वाल के कुछ सीमांत गांवों में मुर्दो को ऊंचे-ऊंचे हिमकुंडों तक ले जाकर विसर्जित करने की प्रथा है।

 

माणा ;12 हजार फीटद्ध गांव के लोग अपने मृतकों को सतोपंथ कुंड ;18 हजार फीटद्ध तक ले जाकर विसर्जित करते हैं। संभव है कि रुद्रकुंड ;रूपकुंडद्ध ऐसा ही श्मशान हो, जहां प्राचीनकाल में कत्यूर के लोग भी अपने मुर्दो को उनकी सद्गति के लिए वैतरणी को पार कराकर डाल जाते हों। आज भी यहां इस झील को देखने आ रहे हैं।ओलों की एक भयंकर बारिश 1942 में हुए एक रिसर्च से हड्डियों के इस राज पर थोड़ी रोशनी पड़ सकती है। रिसर्च के अनुसार ट्रेकर्स का एक ग्रुप यहां हुई ओलावृष्टि में फंस गया जिसमें सभी की अचानक और दर्दनाक मौत हो गई।

 

हड्डियों के एक्स-रे और अन्य टेस्ट्स में पाया गया कि हड्डियों में दरारें पड़ी हुई थीं जिससे पता चलता है कि कम से कम क्रिकेट की बाल की साइज के बराबर ओले रहे होंगे। वहां कम से कम 35 किमी तक कोई गांव नहीं था और सिर छुपाने की कोई जगह भी नहीं थी। आंकड़ों के आधार पर माना जा सकता है कि यह घटना 850 ई0 के आस पास की रही होगी।


नंदा देवी का प्रकोप
स्थानीय लोगों के माने तो उनके अनुसार एक बार एक राजा जिसका नाम जसधावल था, नंदा देवी की तीर्थ यात्रा पर निकला। उसको संतान की प्राप्ति होने वाली थी इसलिए वो देवी के दर्शन करना चाहता था। स्थानीय पंडितों ने राजा को इतने भव्य समारोह के साथ देवी दर्शन जाने को मना किया। जैसा कि तय था, इस तरह के जोर-शोर और दिखावे वाले समारोह से देवी नाराज हो गईं और सबको मौत के घाट उतार दिया। राजा, उसकी रानी और आने वाली संतान को सभी के साथ खत्म कर दिया गया।

 

मिले अवशेषों में कुछ चूडि़यां और अन्य गहने मिले जिससे पता चलता है कि समूह में महिलाएं भी मौजूद थीं। तो अगर आप सुपरनैचुरल और देवी-देवताओं में विश्वास करते हैं तो इस कहानी को मान सकते हैं। अपने साथ किसी स्थानीय व्यक्ति को ले जाइए और रात के समय यह कहानी उनसे सुनिए। आपके रोंगटे जरूर खड़े हो जाएंगे। वहीं एक दूसरी किवदंती के मुताबिक तिब्बत में 1841 में हुए यु( के दौरान सैनिकों का एक समूह इस मुश्किल रास्ते से गुजर रहा था। लेकिन वो रास्ता भटक गए और खो गए और कभी मिले नहीं। हालांकि यह एक फिल्मी प्लाट जैसा लगता है पर यहां मिलने वाली हड्डियों के बारे में यह कथा भी खूब प्रचलित है।

 

रूपकुंड के बारे में जब पता चला तो उस समय यह कोई अचंभा नहीं था और था भी। समय के साथ इसके बारे में जैसे-जैसे प्रचारित होता गया वैसे-वैसे यहां के बारे में कई कहानियां सामने आयी और स्थानीय लोगों की मदद से इनकी पुष्टि भी हुई।रूपकुंड के रहस्य के बारे में जब यह समाचार पत्रों में प्रकाशित कियागया कि झील में अरबों का खजाना छिपा है तो पूरी दुनिया यहां आने लगी और धीरे-धीरे यह इतना प्रचारित हो गया कि यहां देश-विदेश से मीडिया का जमावड़ा लगने लगा। लेकिन रूपकुंड के रूप के रहस्य के बारे में आज दिन तक कोई स्पष्ट जानकारी आज दिनतक किसी के पास नहीं है।

 

 

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