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उत्तराखंड में आज भी जाति नहीं रिश्तों की आत्मीयता है बडी !

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उन्माद और घृणा के इस माहौल से हटकर एक नजर इधर भी डालिये , बड़ा सुकून मिलेगा !

क्रांति भटृ
कुछ दिनों से अपने देश में एक अजीब का उन्मादी , नफरत भरा . हिंसक और कटुता भरा माहौल चल रहा है । जाति . धर्म . मंदिर . मस्जिद के नाम पर आम जन में क्रोध की . घृणा कीमानसिक ताअचानक विष रूप लेकर समाज के ताने बाने को तोड रही है । अपना सनातन धर्म जो अपनी उदारता , सवेदन शीलता , प्राणियों मे सदभावना के महान मंत्र के कारण विश्व के लिए अनुसरण , उपासना और आदर का धर्म है ।

उसी धर्म के उपासकों में भाई बहिनों में आपस में ये कैसी घृणा और खाई बनने लगी है । कौन बना रहा है ये खाई ! पहाड़ के गांवों में जातिय विद्वेष , घृणा का जहर कभी इतना घृणित नहीं रहा जितना अन्य जगहों से सुनने को मिलता है । मंदिरों , पूजा आयोजनों दीवार खडी होने की या खडी करने की नफरत भरी बातें अपने पहाड़ के गांवों में बहुत कम दिखतीं हैं ।

अपने सनातन में जातिय सदभाव , और मंदिरों में ” जो ईश्वर का है वही अर्चक है , वही पुजारी है। वही भक्त है । इसके कुछ उदाहरण बडी विनम्रता से देना चाहता हूं । ऋषिकेश बदरीनाथ मार्ग पर कर्ण प्रयाग से आगे मंदिर है । ” काल्दू भैरव मंदिर ” । कालेश्वर मे । इस मंदिर के पुजारी कोई ब्राह्मण नहीं ।

अपने ही सनातन धर्म की रीढ़ समझी जाने वाली अनसूचित जाति के लोग हैं । बडी आस्था है भगवान काल्दू भैरव में । श्रद्धालु बहुत आस्था से जाते हैं इस मंदिर में। और इस मंदिर में पूजा विधान सभी मंदिर के पुजारी से ही कराते हैं । विस्वास रखते हैं कि पुजारी की पूजा से ही भगवान हमारी मान्यता पूरी करेंगे । और आस्था ही उन्हीं पुजारी की पूजा से काल्दू भैरव प्रसन्न होते हैं । और वह पुजारी मंत्रों का प्रभाव शाली उच्चारण करते हैं । सब उनसे झुककर आशीष लेते हैं ।

आज भी पहाड के गांवों में मंदिरों होने वाली सामूहिक पूजा आयोजनो . देवी देवताओं के देवरा , यात्रा में जब तक गांव की सभी जाति के लोग मिलकर आयोजन नहीं करते पूजा या आयोजन सफल ही माना जाता । धार्मिक आयोजन , ईश्वर की आराधना में बडी सम्मान घंटी बजाने वालों का , मंत्र पढने वाले का , शंख बजाने वाला का है जो ढोल दमाऊं बजाकर देवताओं को ऊर्जा देते हैं । ढोल दमाऊं की मंत्र पूर्ण थाप, उनको बजाने की ईश्वरीय कला के मर्मज्ञों के जागर से ही देवता जागृ होते हैं । ढोल दमाऊं का वही महत्व पूजा आयोजनों में है जो मूर्ति , मंत्र और मंदिर का है ।

लाता में मां नन्दा का दैवीय मंदिर है । यहाँ के पुजारी अनसूचित जनजाति के लोग हैं । हिमालय की आराध्या हैं मां नन्दा देवी । लाता नन्दा देवी के दर्शन के बाद वहाँ के पुजारी से लोग आशीर्वाद लेते हैं ।माणा में भगवान घंटाकर्ण जी की पूजा की जिम्मेदारी वहीं के अनुसूचित जनजाति के लोगों के हाथ होती है । बडी मान्यता और श्रद्धा पूर्वक पूजा करते हैं वे लोग ।

भगवान घंटाकर्ण जी के पश्वा भी वही हैं । सभ उनके आगे विनम्र होकर झुकते हैं और आशीर्वाद लेते हैं । भगवान बदरी विशाल को सबसे पहले ढोल दमांऊ की थाप पर सिकंदू दास जी और उनके भाई ही जगाते हैं । तब अभिषेक की प्रक्रिया शुरु होती है । देखना चाहेंगे तो बहुत सकारात्मक उदाहरण हैं हमारे पहाड़ी समाज में जातिय सदभाव के । मंदिरों और भगवान के साथ सामूहिक आत्मीयता के । और छिद्रान्वेषण करेंगे या ” नफरत या कटुता ढूंढने की सोच होगी । तो सब कुछ खराब ही दिखेगा ।

आइये । हम सब समाज में प्रेम , सदभाव के अनुकरणीय उदाहरणों को अंगीकार करें । आगे बढायें । आंखों में पानी हो , प्रेम हो , नफरत न हो । घृणा या कुंठा न पालें । अपने पहाड़ी समाज में आज भी रिश्तों के सम्बोधन और आदर मे जाति का अंहकार या कुंठा नहीं होती । गांवों में जाकर देखिये । यहा जाति नही रिश्तों की आत्मीयता बडी है ।

वरिष्ठ पत्रकार की फेसबुक वाल से साभार

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