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फर्जी मीट से भूख मिटाने को मजबूर हैं उत्तर कोरियाई

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प्योंगयांग। उत्तर कोरिया से भागे हुए लोगों ने अकसर देश की गरीबी और भूख से मर रहे लोगों का जिक्र किया है। अब संयुक्त राष्ट्र के कड़े प्रतिबंधों से अलग-थलग पड़े इस देश के बारे में एक और खुलासा हुआ है कि यहां खाद्य उत्पादों की कमी की वजह से लोग चावल के साथ इनजोगोगी या एक तरह का मानव निर्मित मांस खाने को मजबूर हैं।

 

एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में पब्लिक ड्रिस्ट्रब्यूशन सिस्टम (पीडीएस) 70 प्रतिशत जनसंख्या को राशन की गारंटी देता है लेकिन इसके बावजूद 61 प्रतिशत उत्तर कोरियाई नागरिक अपने खाने की बुनियादी जरूरतों के लिए भी बाजार पर निर्भर हैं। पीडीएस से सिर्फ 23.5 प्रतिशत खाद्य जरूरतों की ही आपूर्ति हो पाती है।

 

इनजोगोगी, एक तरह का फर्जी मीट है, जिसे सोयाबीन तेलों के अवशेषों को दबाकर और रोल कर के बनाा जाता है। इसके अलावा खाने के बाद मीठे के लिए स्पीड केक भी खाया जाता है। इस केक को बेक करने की जरूरत नहीं होती। इस तरह के भोजन में प्रोटीन और फाइबर बहुत बड़ी मात्रा में होते हैं और मांसपेशियों को तंदरुस्त रखने के साथ ही भूख भी जल्दी मिट जाती है।

 

इसमें कोई हैरानी नहीं है कि औसत उत्तर कोरियाई कुपोषित हैं। साल 2009 में हुई एक स्टडी के मुताबिक उत्तर कोरिया में प्री स्कूल जाने वाले बच्चे दक्षिण कोरियाई बच्चों के मुताबिक 13 सेंटीमीटर छोटे और 7 किलोग्राम हल्के होते हैं। संयुक्त राष्ट्र की फूड एजेंसी वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के मुताबिक उत्तर कोरिया को 42 अरब डॉलर की खाद्य सहायता मिली थी।

 

एजेंसी ने यह भी बताया कि उत्तर कोरियाई एक ही तरह का खाना खाते हैं। उनके खाने में मुख्यतौर पर चावल/मक्का, किमची और बीन पेस्ट होता है जिनसे जरूरी वसा और प्रोटीन भी नहीं मिलता।

 

उत्तर कोरिया में रह चुके कुछ लोगों ने यह भी बताया कि अमीर लोग अधिकतर पोर्क खाते थे लेकिन अधिकांश लोग कुत्ते, खरगोश और बिज्जू जैसे जानवरों का मांस खाकर जीवन बसर करते हैं।

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