राजनेताओं की कुदृष्टि से खंड-खंड हुआ उत्तराखंड,बना नेताओं की बपौती

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आपदा ने पूरे उत्तराखंड को खंड-खंड कर दिया और यहां के लोग बेघर हो गए। न बचे खेत-खलियान, न छत और अपनों से भी हाथ धोना पड़ा। आज पहाड़वासियों की पथराई ऑखें हमारे प्रदेश के नेताओं की ओर हैं कि वह…। लेकिन, हमारे नेताओं को दिल तो इस हृदय विदारक दृष्य को देखने के बाद भी नहीं पसीजा और वह आपदा के नाम पर भी राजनीति करने में लग गए। केंद्र से लेकर विभिन्न प्रदेशों की सरकार, विभिन्न संगठनों, विदेशों से राज्य को इतनी सहायता मिली है कि इससे एक आदर्श राज्य को पुर्ननिर्माण हो सकता है, लेकिन लगता नहीं कि यह सब हो सकेगा।

आज उत्तराखंड राज्य नेताओं की बपौती बन गया है। विकास के नाम पर राज्य को गिरवी रखा गया, पहाड़ के पानी को विदेश कंपनियों को बेच दिया और बेचा जा रहा है, पहाड़ की जवानी को नशे के दलदल में फंसा दिया, पहाड़ की जमीन को विदेशी कंपनियों को बेच दिया, गंगनचुंभी पर्वत श्रृंखलाओं को जल विद्युत परियोजनाएं बनाकर खोखला कर दिया, जो बचे थे वो यहां के तीर्थस्थल। उनमें भी आधुनिकता की चकाचौंध अपने फायदे के लिए पहुंचाकर राज्य को विनाश के गर्त में धकेल दिया और उसके परिणाम भी एक दशक के बाद प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आ गया।
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संतोष बेंजवाल
गगनचुंभी पर्वत श्रृंखलाएं, जलधराओं से बनी गहरी घाटियां, सदाबहार वृक्षों से आच्छादित भू-भाग, मखमखी बुग्याल, शिवलिंग नुमा पत्थर, सीढ़ीनुमा खेत-खलियान और अपने अतिथि को अराध्य मानने वाले लोग पहाड़ का अपने आप में पूरा परिचय है। बात ऐसे भू-भाग की हो रही है, जहां पंच बदरी, पंच केदार के साथ सि(पीठों और प्रयाग विश्व के लोगों के लिए आस्था और श्र(ा के साथ पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र है। इस भू-भाग में तब तक सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था जब तक यहां राजनेताओं की कुदृष्टि नहीं पड़ी थी। नेताओं का ध्यान आकृष्ट करने में यहीं के लोगों का हाथ है। पृथक राज्य की मांग नेताओं के सामने यहां की जनता ने रखी। उसके पीछे कारण यह था कि यह क्षेत्र पिछड़ा था और यहां विकास की किरण नहीं पहुंच पा रही थी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस भू-भाग के लोगों ने इसके लिए अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया और उसी का परिणाम रहा कि उत्तराखंड राज्य बना। राज्य बनाने के पीछे यहां के लोगों की मंशा बेरोजगारी, विकास के साथ सरकार की योजनाओं को धरातल पर लाना था, लेकिन आज दिन तक यह कुछ नहीं हुआ। राज्य तो बना पर राज्य बनाने के पीछे राज्य के लोगों की सोच के विपरीत। आज उत्तराखंड राज्य नेताओं की बपौती बन गया है। विकास के नाम पर राज्य को गिरवी रखा गया, पहाड़ के पानी को विदेश कंपनियों को बेच दिया और बेचा जा रहा है, पहाड़ की जवानी को नशे के दलदल में फंसा दिया, पहाड़ की जमीन को विदेशी कंपनियों को बेच दिया, गंगनचुंभी पर्वत श्रृंखलाओं को जल विद्युत परियोजनाएं बनाकर खोखला कर दिया, जो बचे थे वो यहां के तीर्थस्थल। उनमें भी आधुनिकता की चकाचौंध अपने फायदे के लिए पहुंचाकर राज्य को विनाश के गर्त में धकेल दिया और उसके परिणाम भी एक दशक के बाद प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आ गया। विगत जून माह में आयी आपदा ने पूरे उत्तराखंड को खंड-खंड कर दिया और यहां के लोग बेघर हो गए। न बचे खेत-खलियान, न छत और अपनों से भी हाथ धोना पड़ा। आज पहाड़वासियों की पथराई ऑखें हमारे प्रदेश के नेताओं की ओर हैं कि वह…। लेकिन, हमारे नेताओं को दिल तो इस हृदय विदारक दृष्य को देखने के बाद भी नहीं पसीजा और वह आपदा के नाम पर भी राजनीति करने में लग गए। केंद्र से लेकर विभिन्न प्रदेशों की सरकार, विभिन्न संगठनों, विदेशों से राज्य को इतनी सहायता मिली है कि इससे एक आदर्श राज्य को पुर्ननिर्माण हो सकता है, लेकिन लगता नहीं कि यह सब हो सकेगा। यहां यह बात करना जरूरी है कि उत्तरखंड को उर्जा प्रदेश का नाम देने वाली सत्ता हमेशा उत्तराखंड हिमालय के पर्यावरण और जनजीवन को आधार बनाने से मुकरती रही है। उत्तरखंड में बनने वाली परियोजनाओं के संदर्भ में किये गये भूगर्भ विभाग और उर्जा महकमे के सर्वे के अनुसार उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से चालीस फीसदी आबादी को विस्थापन का दंश झेलना है। परियोजनाऐं बनेंगी और पहाड़ खाली होगा इस तर्ज पर चल रहे विकास के योजनाकारों ने कभी यहां की परियोजनाओं के उत्पादन लक्ष्य और वर्तमान स्थिति पर नजर डालने की कोशिश नहीं की। उत्तराखंड में वर्तमान में चल रही परियोजनाओं से 20 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य है और इसके विपरीत मात्र 4 हजार मेगवाट विद्युत का उत्पादन हो रहा है। 4 सौ मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजना से मानसून सीजन में केवल 150 मेगावाट बिजली पैदा होती है।
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उत्तराखंड में आयी इस तबाही के बाद परियोजनाओं से उत्तराखंड़ की जनता डरने लगी है। अरूणांचल की तरह उत्तराखंड में बिना सुरंग, बिना बांध वाली परियोजनाओं को बनाकर उर्जा प्रदेश का लक्ष्य हासिल करने के लिये दबाव बनाने वाले जन संगठन और राजनैतिक ताकतें एक बार फिर खुलकर सामने आ गयी हैं। पंचायतों के अधीन 15 मेगवाट से कम उत्पादन की परियोजनाऐं बनाने की बात भी सामने आ रही है। अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया फैसले के बाद और आपदा की इस त्रासदी के बाद सरकार क्या सीखती है।

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