आर्थिक मंदी का खतरा: फिर मचेगा नौकरियों में हाहाकार !

नई दिल्ली: अमेरिकी बाजार में 10 साल बाद आई इतनी बड़ी गिरावट निवेशकों से लेकर आम आदमी तक के लिए चेतावनी है. क्या फिर नौकरी जाने के आसार हैं. क्या फिर अमेरिकी बाजारों की गिरावट आर्थिक मंदी की ओर इशारा कर रही है?

 

इन सवालों का जवाब मिलने में वक्त लगेगा. लेकिन, डाओ जोन्स में आई 1100 अंकों से ज्यादा की गिरावट बिल्कुल वैसी ही है जैसे आज से 10 साल पहले हुआ था. हालांकि, एक्सपर्ट्स की मानें तो बाजार की गिरावट से घबराने की जरूरत नहीं है. फिलहाल, बाजार में कंसोलिडेशन हो रहा है. इसका इम्पैक्ट किसी भी तरह से ज्यादा लंबा नहीं है.

 

खतरनाक खेल है स्टॉक मार्केट
स्टॉक मार्केट में जब मुनाफा होता है तो निवेशक इतराते हैं. लेकिन, शेयर बाजार एक खतरनाक खेल है. खासकर अमेरिका में ज्यादातर राष्ट्रपति इससे बचते रहे हैं. बराक ओबामा ने भी अपने कार्यकाल में कभी-कभार ही ऐसा किया था और वो भी तब जब अमरीकी अर्थव्यवस्था 2008 की बर्बादी के बाद ठीक ठाक संभल गई थी. डोनाल्ड ट्रंप ने भी डाओ जोन्स को खूब खरी खोटी सुनाई थी लेकिन, अब वो इस शेयर बाजार की तारीफों के पुल बांधते हैं.

 

2008 के बाद डाओ जोन्स में सबसे बड़ी गिरावट
अमरीका में शेयर कीमतों में आई 1100 से भी ज़्यादा अंकों की गिरावट साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद एक दिन में आई सबसे अधिक गिरावट है. डाऊ जोंस 4.6 प्रतिशत की गिरावट के साथ सोमवार को 24,345.75 अंकों पर बंद हुआ. एस एंड पी 500 स्टॉक इंडेक्स 3.8 प्रतिशत और नेस्डेक 3.7 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुए हैं. यह एक इशारा भर है कि अमेरिका में वित्तीय संकट गहरा रहा है. हालांकि, यह कितने दिनों के लिए है यह कहना मुश्किल है.

 

अमेरिका के लिए भुलाना मुश्किल
अमरीकी अर्थव्यवस्था को हाल में मिली कामयाबी के बीच ये सबसे बड़ी गिरावट है जिसे ज्यादातर अमरीकियों के लिए लंबे समय तक भुलाना मुश्किल होगा. राष्ट्रपति ट्रंप भले ही अब ये कहेंगे कि देश की अर्थव्यवस्था बुनियादी तौर पर मजबूत है. लोगों की सैलरी बढ़ी है और बेरोजगारी घटी है. अगर विकास की रफ्तार जारी रहती है तो बहुत मुमकिन है कि इसे ट्रंप एक बार फिर अपनी कामयाबी के तौर पर भुना लेंगे.

 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
एनालिस्ट अरुण केजरीवाल का कहना है कि अमेरिकी बाजारों में आई गिरावट को वैश्विक मंदी के रूप में देखने बिल्कुल गलत होगा. आसार बिल्कुल भी वैसे नहीं हैं. सिर्फ शेयर बाजार की गिरावट को मंदी के रूप में नहीं देखा जा सकता. गिरावट पूरी तरह से बाजार की है. इससे नौकरी या वित्तीय संकट जैसा कुछ नहीं है.

 

अरुण केजरीवाल मानते हैं कि भारतीय शेयर बाजार में भी गिरावट ज्यादा समय के लिए नहीं है. बाजार कंसोलिडेट हो रहा है. ऐसे में निवेशकों को इससे दूरी बनानी चाहिए और थोड़ा संभलकर ही निवेश करना चाहिए. उन्होंने कहा निवेशक बाजार से छुट्टी लें और थोड़े दिन बाद वापस लौटकर खरीदारी करें. गोल्डमैन सैक्स के मुख्य कार्यकारी एंड्रयू विल्सन का कहना है कि बाजार में इस साल बहुत उथल-पुथल रहेगी. सेंट्रल बैंक्स कम बांड्स खरीद रहे हैं और कुछ सेंट्रल बैंक ब्याज की दरें बढ़ा रहे हैं.

 

क्यों है नौकरियों पर खतरा?
अमेरिका में रोजगार के आंकड़े बेहतर आ रहे हैं. फिर भी अमेरिकी बाजारों में गिरावट से नौकरियों पर खतरा क्यों है? दरअसल, 2008-09 में जब वैश्विक मंदी थी, तब नौकरियों पर खतरा मंडराया था. उस वक्त भी डाओ जोन्स सहित बाकी अमेरिकी मार्केट में बड़ी गिरावट देखने को मिली थी.

 

हालांकि, सिर्फ बाजार की गिरावट की वजह से नौकरियां नहीं गई थीं. बैंकों के डूबने और कंपनियों में छाई मंदी के चलते ऐसा हुआ था. एनालिस्ट मानते हैं अभी हालात वैसे नहीं बने हैं और भारत में ग्रोथ काफी अच्छी है तो अमेरिका के हालात का असर भारत पर बिल्कुल नहीं है.

 

बढ़ेगी महंगाई
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने खुद इस बात को माना कि महंगाई बढऩे के आसार है. एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि क्रूड ऑयल की कीमतों में लगातार इजाफा सरकार के लिए चिंता का सबब है. महज तीन महीनों में 50 डॉलर से 70 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकीं कीमतें हमारे कम्फर्ट लेवल से लगभग बाहर हो चुकी हैं. इससे करेंट अकाउंट डेफिसिट बढऩे और इकोनॉमिक ग्रोथ कम होने के साथ ही महंगाई भी बढ़ सकती है.

 

महंगा डीजल भी डालेगा बोझ
डीजल के बढ़ते दाम आने वाले दिनों में महंगाई का झटका दे सकते हैं. कच्चे तेल के दाम बढऩे की वजह से पिछले 3 महीने में डीजल के दाम करीब 8 फीसदी तक बढ़ चुके हैं. ऐसे में महंगे डीजल की मार ट्रांसपोर्ट और कृषि सेक्टर पर पड़ रही है. इससे आने वाले दिनों में महंगाई बढ़ सकती है.

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