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29 अप्रैल को खुलेंगे भगवान शिव के धाम केदारनाथ के कपाट

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लक्ष्मण नेगी
उखीमठः गढ़वाल हिमालय की ऊंची पहाड़‍ियों पर स्थित भगवान शिव के धाम केदारनाथ के कपाट इस साल श्रद्धालुओं के लिए 29 अप्रैल को खुलेगे। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में केदारनाथ मंदिर के कपाट खोले जाने का विधिवत मुहूर्त निकाला गया।

गढ़वाल हिमालय की ऊंची पहाड़‍ियों पर स्थित चारों धाम, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री सर्दियों में भारी बर्फवारी की चपेट में रहने के कारण हर साल अक्टूबर-नवंबर में कपाट बंद कर दिए जाते हैं जो अप्रैल-मई में दोबारा खोल दिए जाते हैं। हर साल छह माह के यात्रा सीजन के दौरान देश-विदेश के लाखों श्रद्घालु मंदिरों के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं

 

महाशिवरात्रि के पर्व पर केदारनाथ और पंच केदारन के गदृदी स्थल उखीमठ स्थित आंकेरेश्वर मंदिर में आज विधि-विधान के साथ केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि तय की गयी।केदारनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए 29 अप्रैल को 6 बजकर 15 मिनट पर खोले जाएंगे।

 

उखीमठ में आज इसका दिन तय किया गया। केदारनाथ की उत्सव डोली और भैरव पूजन का दिन भी तय किया गया। 25 अप्रैल को उखीमठ में भैरव पूजा के आयोजन के साथ केदारनाथ की डोली 26 अप्रैल को प्रातः 10 बजे ओकारेश्वर मंदिर से प्रस्थान कर फाटा पहुंचेगी। 27 अप्रैल को फाटा से गौरीकुड और 28 अप्रैल को गौरीकुड से केदारनाथ और 29 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर श्रद्धालुओं के दर्शनाथ केदारनाथ के कपाट खुल दिए जाएंगे।

 

आपको बता दें कि चौरीबारी हिमनद के कुंड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में, कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित, विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर (३,५६२ मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसे १००० वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। जनश्रुति है कि इसका निर्माण पांडवों या उनके वंशज जन्मेजय द्वारा करवाया गया था।

 

साथ ही यह भी प्रचलित है कि मंदिर का जीर्णोद्धार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने करवाया था। मंदिर के पृष्ठभाग में शंकराचार्य जी की समाधि है। राहुल सांकृत्यायन द्वारा इस मंदिर का निर्माणकाल १०वीं व १२वीं शताब्दी के मध्य बताया गया है।

 

यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत व आकर्षक नमूना है। मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है। केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं और अगहन संक्रांति के निकट बलराज की रात्रि चारों पहर की पूजा और भइया दूज के दिन, प्रातः चार बजे, श्री केदार को घृत कमल व वस्त्रादि की समाधि के साथ ही, कपाट बंद हो जाते हैं।

 

केदारनाथ के निकट ही गाँधी सरोवर व वासुकीताल हैं। केदारनाथ पहुँचने के लिए, रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, २० किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से और १४ किलोमीटर की यात्रा, मध्यम व तीव्र ढाल से होकर गुज़रनेवाले, पैदल मार्ग द्वारा करनी पड़ती है।

 

मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घारे अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं। शिवलिंग स्वयंभू है। सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान को घृत अर्पित कर बाँह भरकर मिलते हैं, मूर्ति चार हाथ लम्बी और डेढ़ हाथ मोटी है। मंदिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियाँ हैं। मंदिर के पीछे कई कुण्ड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जा सकता है।

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