udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news स्वर्गारोहिणी से पूर्व पांडवों ने दिए थे अपने अस्त्र-शस्त्र,आज भी परम्पराएं हैं जीवित

स्वर्गारोहिणी से पूर्व पांडवों ने दिए थे अपने अस्त्र-शस्त्र,आज भी परम्पराएं हैं जीवित

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रुद्रप्रयाग। अलकनंदा-मंदाकिनी नदी के संगम स्थल पर पांडवों के अस्त्र-शस्त्रों और देवी-देवताओं के नेजा-निशाणों की शुद्धिकरण के साथ पश्चिम भरदार की ग्राम पंचायत दरमोला में पांडव नृत्य शुरू हो गया है। इससे पूर्व देव निशाणों के साथ आए पश्वों और भक्तों ने पूरी रात जागरण कर अपने आराध्य देव का सुमिरन किया।

 

पश्चिम भरदार के पांच गांवों में प्राचीन काल से पांडवों को नचाने की परंपरा रही है। हर वर्ष छोटी दिपावली की पूर्व संध्या पर देवी-देवताओं के निशान और पांडवों के अस्त्र-शस्त्रों को संगम स्थल पर स्नान के लिए लाया जाता है। इस वर्ष भी इस परंपरा का निर्वहन किया गया। पूरी रात जागरण के बाद मंगलवार को ब्रह्ममुहुर्त मे देवताओं के निशान और शस्त्रों का विधि-विधान से पूजन और हवन किया गया।

 

इसके बाद पांडव ध्वज की अगुवाई में निशान और शस्त्रों को दरमोला गांव में स्थापित किया गया। इसके साथ ही औपचारिक रूप से गांव में पांडव लीला की घोषणा कर दी गई। केदारघाटी में पांडव लीला की अनूठी परंपरा है। मान्यता है कि पांडवों ने स्वर्गारोहिणी से पूर्व यहां के लोगों को अपने अस्त्र-शस्त्र दिए थे। ताकि वे चिरकाल तक इनकी पूजा-अर्चना करते रहें।

 

यहां के गांवों में पांडव लीला को खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान नारायण और तुलसी का विवाह हुआ था और इसी दिन भगवान विष्णु पांच महीने की निन्द्रा से जागते हैं। यही वजह है कि इस दिन से पांडव लीला का शुभारंभ होता है। केदारघाटी के लोग पांडवों को अपना पूर्वज मानते हैं।

 

इसलिए ग्रामीण पूरी शिद्दत के साथ पांडव मंचन का आयोजन करते हैं और इसमें बढ़-चढ़कर शरीक होते हैं। इस मौके पर क्षेत्र की जिला पंचायत सदस्य श्रीमती आशा डिमरी, किशन रावत, लक्ष्मी प्रसाद डिमरी, भाजुयमो जिलाध्यक्ष सुरेन्द्र रावत, अशोक चौधरी, वीर सिंह पंवार, गिरीश डिमरी, जसपाल सिंह, भोपाल सिंह सहित कई श्रद्धालु मौजूद थे।

 

यह हैं परम्पराएं – बारी-बारी से होता है आयोजन
पश्चिम भरदार के पांच गांवों में पांडव लीला मंचन की परंपरा पौराणिक काल से चली आ रही है। जिसमें मुख्य रूप से स्वीली, सेम, दरमोला, तरवाड़ी और कोटली गांव शामिल हैं। इन गांवों में बारी-बारी में पांडव लीला का आयोजन होता है। इस बार दरमोला गांव में पांडव लीला का मंचन किया जाएगा।

 

स्वीली गांव के शिवालय में पांडवों के अस्त्र-शस्त्र, शंकरनाथ, नरसिंह, हीत, चामुंडा देवी, नागराजा और पांडव ध्वजा को स्थापित किया जाता है। हर वर्ष एकादश की पूर्व संध्या पर यहीं से नेजा-निशाण और शस्त्रों को संगम स्थान पर स्नान के लिए लाया जाता है। इसके बाद पांडव ध्वजा सभी निशाणों की अगुवाई करता है।

 

परपंरा आज भी जीवित –
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व डिम्मर गांव के डिमरी अपने साथ अपने आराध्य देव नृसिंह भगवान की मूर्ति लाए थे। नरसिंह को बद्रीविशाल भगवान का रूप माना जाता है। पांच सौ वर्ष से अनवरत गांव में पांडवलीला का आयोजन होता आ रहा है। अपने पूर्वजों द्वारा सौंपी गई विरासत को ग्रामीण आज भी बेहद पारंपरिक ढंग से संजोए हुए हैं।

 

छोटी दिपावली का महत्व
रुद्रप्रयाग। छोटी दिपावली (इगास) के शुभ अवसर पर पांडवों के अस्त्र-शस्त्रों और नेजा-निशाणों को संगम स्थल पर शुद्धिकरण की परंपरा रही है। इसकी कोई तिथि घोषित नहीं की जाती। पुजारी पंचांग देखकर सिर्फ पांडव नृत्य के दिनों की तिथि निकालते हैं।

 

प्रवासी भी बनते हैं पांडव लीला का हिस्सा
रुद्रप्रयाग। पांडव नृत्य महोत्सव में धियाणियों को भी न्यौता भेजने की परंपरा रही है। इस दौरान दूर-दूर से धियाणियां (विवाहित बेटी) भी पांडव नृत्य में शिरकत कर आशीष लेती हैं। गांव से बाहर रह रहे प्रवासी भी पांडव नृत्य का हिस्सा बनते हैं।

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