सूर्य उपासना का पर्व है मकर संक्रांति

मकर संक्रांति सूर्य उपासना का विशेष पर्व है. इस दिन से सूर्य उत्तरायण होना शुरू होते हैं और इसके बाद बाद से धरती के उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु की ठंडक में कमी आनी शुरू होती है. प्रायः हर साल 14 जनवरी को सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए तिथि को मकर संक्रांति कहते हैं

सही मायने से देखा जाए तो यह भारत में एक महापर्व की तरह मनाया जाता है, जहां एक ही मान्यता अपने अंदर विभिन्न रीति-रिवाजों और परंपराएं समेटे हुए है. उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली आदि, में यह लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल में संक्रांति, उत्तर प्रदेश, बिहार में खिचड़ी पर्व के रूप के मनाया जाता है.

धर्मग्रंथों और लोकश्रुतियों में इस दिन को बहुत विशेष बताया गया है. इस दिन दान का विशेष महत्व है, विशेष कर तिल दान का. महिलाएं पूजा करते वक्त सुहाग की निशानियों को चढ़ाती हैं और फिर इन्हें 13 सुहागनों को बांटती हैं.
महाराष्ट्र में सुहागन महिलाएं पुण्यकाल में स्नानकर तुलसी की आराधना और पूजा करती हैं. इस दिन महिलाएं मिट्टी से बना छोटा घड़ा, जिसे सुहाणा चा वाण कहते हैं, में तिल के लड्डू, सुपारी, अनाज, खिचड़ी और दक्षिणा रखकर दान का संकल्प लेती हैं.

गुजरात मकर संक्रांति पर पतंबाजी और खूब मौज-मस्ती होती है. पुरुष-महिलाएं दोनों ही पतंगें उड़ाते हैं. पूरा परिवार घर की छत पर सामूहिक रूप से भोजन करता है. यहां तिल और गुड़ के लड्डुओं के अंदर सिक्के रखकर दान करने की भी परंपरा
सिंधी समाज में संक्रांति पर कन्याओं दान दिया जाता है. इस दिन पूर्वजों के नाम पर बेटियों को आटे के लड्डू, तिल के लड्डू, चिक्की और मेवा (स्यारो) दान स्वरूप दी जाती है.

इस दिन लोग पानी में तिल डालकर स्नान करते हैं. साथ ही स्नान के बाद आग में तिल का तेल या तिल के पौधे के सूखे डंठल डालकर हाथ सेंकते हैं.
बंगाली समाज में भी विशेष रूप से संक्रांति का महापर्व मनाया जाता है. जिसमें तिल के व्यंजनों के अलावा खास चावल से बने व्यंजन पीठा और पाटी सपता को विशेष तौर पर बनाया जाता है.

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