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सूर्योदय की आस में उत्तराखंड का एक गांव,यहां उजाले का सहारा है चिमनी

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डिजिटल इंडिया में एक ऐसा भी गांव,गंगी गांव लगता है आज भी पाषाणकालीन युग का गां

 

 

संतोष बेंजवाल
मोदी सरकार की ग्राम उदय से भारत उदय की योजना के बाद उत्तराखंड के एक गांव में सूर्योदय की किरण पडने की संभावना है। क्योंकि गंगी गांव लगता है आज भी पाषाणकालीन युग का गांव, यहां उजाले का सहारा है चिमनी। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो अब आगामी २२ दिसंबर को यहां सूर्योदय होगा अगर मौसम ने साथ दिया और प्रदेश सरकार की मंशा पर कोई शंका और संसय के बादल नहीं मंडराये तो।

 

उल्लेखनी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को डिजिटल बनाने के लिए क्या-क्या नहीं कर रहे हैं। देश में नोटबंदी तक कर दी और वहीं उत्तराखंड राज्य के कई गांव और यहां निवास करने वाले ग्रामीण आज भी आदम युग में जी रहे है कहें तो इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राज्य के भाग्यविधाताओं ने अपनी बपौती समझ रखा है अगर यह सही नहीं है तो फिर आप ही बताइए कि राज्य के कई इलाके आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित क्यों है? राज्य बने सोलह साल हो गए, लेकिन राज्यवासियों के भाग्य का उदय आज भी नहीं हुआ। उत्तराखंड राज्य के गठन के पीछे का मकसद हमारे भाग्य विधाता भूल गए हैं शायद उनके पेट की आग इतनी ज्यादा है कि वह अपने पेट के सिवाय कोई और चीज पर ध्यान ही नहीं देते। यही कारण है कि राज्य का अधिसंख्य वर्ग आंदोलनों के पीछे आज भी भटक रहा है कि उसे उसकी इस बुलंद आवाज से शायद उसकी मांगें पूरी हो जाएग, लेकिन भाग्यविधाताओं का क्या वह तो मस्त है अपने रंग में। कभी कुर्सी-कुर्सी तो कभी दल-दल का खेल खेलने में।


राज्य की हालात सुधरी है तो शहरों में ग्रामीण इलाके आज भी सदियों पहले जैसे ही हैं। वर्तमान सीएम जो खुद को गाड-गदेरों का बेटा कहते है ने कुछ पहल तो की पर उनकी पहल को उनके ही सिपे-सलाहकार बट्टा लगाने में लगे रहते हैं। यहां कुछ दिनों से राज्य में एक मुद्दा उठा हुआ है वह भी राज्य के टिहरी जिले का। इस जिले के सबसे सीमान्त गांव गंगी में आजादी के 68 वर्ष बाद भी अंधेरा पसरा हुआ है। आपके दिल को इस बात से धक्का लगा होगा न।

 

सभी का लगा होगा जब ऐसा समाचार आया कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी यह गांव चिमनी की रोशनी से जगमग होता है। आधुनिकता के इस युग में गंगीवासी अंधेरे में जीने को मजबूर है और विकास के दौर में काफी पिछड़ चुके हैं। गंगीवासियों का दर्द सुनते ही मन में पाषाणकालीन यु्ग की तस्वीर सामने आती है, जो किताबों में पढ़ा करते हैं। गंगी के करीब 150 परिवार वर्षों से अंधेरे में अपना जीवन गुजार रहे हैं और इनकी आजीविका का साधन पशुपालन और खेती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से कोसो दूर गंगीवासी आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं और गांव में बिजली की राह देखते.देखते इनकी आंखे तरस गई। कई पीढियां गुजर गई लेकिन बिजली नहीं पहुंची। गंगी निवासी देवेंद्र सिंह का कहना है कि आंदोलन हुए और नेताओं ने वायदे किए। बावजूद इसके बिजली के नाम पर गांव में सिर्फ पोल लगा दिए गए हैं।


बताते चलें कि राजधानी देहरादून से महज 215 और टिहरी जिला मुख्यालय से करीब 110 किलोमीटर दूरी पर स्थित हिमालय श्रंखला की तलहटी में बसा गंगी गांव में सड़क नहीं है। नई टिहरी से रीह तक सड़क मार्ग से गांव तक पहुंचना पड़ता है। उसके करीब 12 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई और पहाडयि़ों के कच्चे रास्ते से होते हुए पगडंडियों से पैदल पहुंचना पड़ता है।

 
टिहरी जिले का आखिरी गांव गंगी का ये हाल तब है जब देश के आठ राज्यों को बिजली से रोशन करने वाला टिहरी डैम इसी जिले में है। ग्रामीणों ने अपनी जिंदगी के कई बरस बस यही सुनते सुनते काट दिए हैं कि बिजली पहुंचने वाली है। लोग दिन में ही अपने सभी काम निपटाते हैं और सूरज ढलते ही घरों में कैद हो जाते हैं। बच्चों ने तो सिर्फ आज तक बिजली का नाम ही सुना है। गंगी तो एक उदाहरण है। गंगी ही नहीं मेड, मरवाड़ी, पिसंवाड़, गेंवली भी ऐसे ही गांव हैं, जहां बिजली के साथ.साथ बुनियादी सुविधाएं तक नहीं है।कई बार चुनाव के बहिष्कार की चेतावनी दे चुके हैं। हर बार भरोसा दिलाया गया। वायदे किए गए, लेकिन आज तक समस्याएं हल नहीं हुई। नेताओं के आश्वासनों और वादों से हताश और निराश हो चुके है। उनके पास अब मोदी सरकार की ग्राम उदय से भारत उदय पर भरोसे करने के सिवाय और कुछ चारा नहीं है।

टिहरी जिले के भिलंगना ब्लॉक के सीमांत गांव गंगी के लिए 22 दिसंबर की सुबह एक नई सुबह होगी। घनसाली से 31 किमी दूर घुत्तू कस्बे से नौ किमी की दूरी पर स्थित गांव रीह तक सड़क जाती है। उसके बाद 15 किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़कर खतोलग ग्लेशियर पर गंगी गांव बसा है। गंगी गांव में आज भी बिजली. पानी, संचार और अन्य मूलभूत सुविधाओं का आभाव है। छह सौ की आबादी वाले इस गांव में जाने से लोग कतराते हैं। कोई यहां पर ना ही अपनी बेटी की शादी करता है और ना ही कोई यहां की बेटी को बहू बनाता है। विषम हालातों में यहां पर जीवन जिया जाता है।

 

खेती और पशुपालन से ही ग्रामीण यहां पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। अब 22 दिसंबर को गंगी में पहली बार कोई मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से पहुंचेगा। इसके लिए प्रशासन ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। 21 दिसंबर की रात डीएम इंदुधर बौड़ाई सहित पूरा प्रशासनिक अमला पैदल ही गांव पहुंच जाएगा। गांव में ही हेलीपेड बनाने के लिए प्रशासन की रेकी टीम भेज दी गई है। 22 दिसंबर को मुख्यमंत्री हरीश रावत यहां पर गंगी मोटर मार्ग और जड़ी बूटी नर्सरी का शिलान्यास करेंगे। इसके अलावा यहां पर मंदिर सौंदर्यीकरण का भी शिलान्यास किया जाएगा।

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