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शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन की कुंजी: राज्यपाल

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देहरादून। राज्यपाल डॉ. कृष्ण कांत पाल ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन की कुंजी बताते हुए कहा कि शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जिसके बल पर दुनिया को बदला जा सकता है। शिक्षा ऐसी हो जो आधुनिक तौर तरीकों के साथ हमें अपने प्राचीन आदर्शों से भी जोड़े। सोमवार को राज्यपाल, हरिद्वार में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के सातवें दीक्षांत समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।

राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालय को सेंटर फॉर एक्सीलैंस बनाने के लिए और गम्भीरता से प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। छात्रों के कौशल विकास के साथ ही शोध और अभिनव प्रयोगों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाए। तभी आने वाले समय में देवभूमि उत्तराखण्ड में स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय, ज्ञान का ऐसा उत्कृष्ट केन्द्र बन पाएगा जैसे कभी तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय थे। राज्यपाल ने उपाधि प्राप्त करने वाले छा़त्र-छात्राओं को बधाई देते हुए आशा व्यक्त की कि वे सभी अपनी शिक्षा और संस्कारों के आधार पर नए मापदंड और आदर्श कायम करेंगे। शिक्षा एक अंतहीन यात्रा है जो जीवन पर्यन्त चलती है।

अच्छी पुस्तकें पढऩे की आदत विकसित करें। राज्यपाल ने कहा कि देवभाषा संस्कृत के संरक्षण व संवर्धन के लिए उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय लगातार प्रयासरत है। संस्कृत भाषा में लोक जीवन से लेकर विज्ञान तक के ग्रंथ शामिल हैं। यह भाषा विभिन्न दर्शन शास्त्रों और अध्यात्म से लेकर लौकिक साहित्य को अपने भीतर समेटे हुए है। संस्कृत ने हमारे देश को एकसूत्र में बांधा है। देश में उत्तर-दक्षिण के बीच संस्कृत ही सबसे प्रभावी भाषा-सेतु है। विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में संस्कृत का उच्च स्थान रहा है। यह अनेक प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओं की जननी भी है। संस्कृत भाषा, अलंकार व बाहुल्य, उच्चारण की स्पष्टता, वैज्ञानिकता के गुणों के कारण देववाणी भी कही जाती है।

राज्यपाल ने कहा कि हमारे आज के संस्कृत विश्वविद्यालय आधुनिक युग के गुरुकुल हैं और यहां के छात्र और शिक्षक किसी न किसी स्तर पर प्राचीन परंपरा के आधुनिक रूप हैं। ऐसे में, खुद-ब-खुद उनके कंधों पर यह दायित्व आ जाता है कि वे प्राचीन विद्याओं और उसकी परंपराओं का संरक्षण करें। वैदिक साहित्य ने ज्ञान की अनेक शाखाओं को आधार प्रदान किया है। इनमें वैदिक गणित से लेकर व्याकरण तक शामिल हैं। भारत ने दुनिया को शून्य दिया, जिस पर आधुनिक विज्ञान टिका है। पाणिनी के व्याकरण को त्रिमुनि व्याकरण भी कहते हैं। प्रातिशाख्य ग्रंथों में ध्वनि विज्ञान आदि का जितना प्राचीन और वैज्ञानिक विवेचन मिलता है, उसकी तुलना किसी दूसरे ग्रंथ से करना बहुत मुश्किल है।

चिकित्सा विज्ञान के रूप में आयुर्वेद का वैदिक काल से ही प्रचार था। राज्यपाल ने कहा कि आयुर्वेद के ग्रंथ चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता आदि प्राचीन भारतीय ज्ञान की महान वैज्ञानिक धरोहर हैं। इसी प्रकार संस्कृत में धनुर्वेद और राजनीति आदि पर भी व्यापक साहित्य उपलब्ध है। वेद, वेदांग आदि के अलावा संस्कृत में दर्शनशास्त्र पर भी बड़ी मात्रा में साहित्य मौजूद है। राज्यपाल ने कहा कि वर्तमान समय में संस्कृत को नई दृष्टि और नए संदर्भों के साथ देखने की जरूरत है। हम अपने समृद्ध प्राचीन ज्ञान को तभी बचा सकते हैं जबकि संस्कृत भाषा बची रहे। संस्कृत के संरक्षण व संवर्धन के लिए इसे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोडऩा जरूरी है। देवभाषा को जनभाषा बनाने के लिए विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

राज्यपाल ने कहा कि संस्कृत और उत्तराखण्ड के बीच बहुत गहरा नाता है। संस्कृत विश्वविद्यालय को अपनी उपाधियों को इस प्रकार निर्धारित करना चाहिए कि एक ओर वे परंपरा की वाहक हों और दूसरी ओर उनका रिश्ता आधुनिक दुनिया के साथ हो। राज्यपाल ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि विवि में योग विज्ञान भवन, सभागार व डिजीटल लाईब्रेरी भवन तैयार हो चुका है। आई.आई.टी. रूडक़ी के साथ मिलकर डव्व्ब् के अंतर्गत तीन ऑनलाईन पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।

विश्वविद्यालय ने संस्कृत में फिल्म निर्माण पाठ्यक्रम के साथ ही इंदिरा गांधी कला केंद्र, छण्।ण्क् आदि से महत्वपूर्ण समझौते किए हैं। विश्वविद्यालय समाज के प्रति अपने दायित्यों के निर्वहन में भी आगे बढ़ा है। दुर्गम व पिछड़े क्षेत्र के पांच गांवों को गोद लेकर वहां संस्कृत के प्रचार प्रसार के साथ ही योग, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओ, कैशलैस ट्रांजेक्शन, स्वच्छता अभियान आदि के तहत जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए हैं।

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