udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news शीतकालीन सत्र : ऋतुचक्र पूरा तो राजधानी का वायदा अधूरा क्यूँ ?

शीतकालीन सत्र : ऋतुचक्र पूरा तो राजधानी का वायदा अधूरा क्यूँ ?

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

गैरसैंण राजधानी और उत्तराखंड के तमाम सवालों पर आवाज बुलंद करने के लिए भाकपा(माले) करेगी गैरसैंण कूच

उदय दिनमान डेस्कः किसी राज्य की विधानसभा, नीतिगत सवालों पर नीति, नियोजन के लिए होती है .लेकिन उत्तराखंड में यह चलन बन चुका है कि विधानसभा सत्र के नाम पर गैरसैंण में एक सालाना सैर-सपाटा होता है. इस वर्ष 7 दिसम्बर से गैरसैंण में विधानसभा सत्र के नाम पर मंत्री, विधायकों और अफसरों की सालाना पिकनिक फिर होने जा रही है.

पिछले साल से इस साल तक आते-आते, अंतर केवल यह है कि बीते वर्ष कांग्रेस इस पिकनिक की मेजबान थी और अब की बार मेजबान की भूमिका में भाजपा होगी. उत्तराखंड राज्य आंदोलन के समय से जनता गैरसैंण को राज्य की स्थायी राजधानी बनाना चाहती थी. गैरसैंण में सत्र के नाम पर होने वाला यह सालाना सैर-सपाटा एक तरह से उस मांग का मखौल उड़ाना है.

गैरसैंण में स्थायी राजधानी बने यह सवाल महतवपूर्ण है. लेकिन सत्ता में बैठने वालों की मंशा इस सवाल को हल करने की नहीं है. जो सरकार गैरसैंण में सत्र को अपनी उपलब्धि के तौर पर दर्शाना चाहती है, उसी के एक मंत्री-प्रकाश पन्त कह रहे हैं कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का सरकार के पास कोई प्रस्ताव नहीं है .

मंत्री जी यह भी बता देते कि यह प्रस्ताव उनके पास आना कहाँ से था? 1994 की कौशिक समिति से लेकर 2008 के दीक्षित आयोग तक तो जनता ने गैरसैंण के पक्ष की ही बात की थी. वैसे मंत्री जी को यह भी बताना चाहिए था कि जब शराब की दुकानें राष्ट्रीय राजमार्ग पर खुलवाने,उनकी सरकार उच्चतम न्यायालय में फैसला बदलवाने गयी तो वह प्रस्ताव किसका था?

उत्तराखंड में गाँव के गाँव वीरान हो रहे हैं. स्वयं कृषि मंत्री कह रहे हैं कि 1100 गाँव पूरी तरह खाली हो चुके हैं. इस गति से जल्द ही पहाड़ के गाँव सिर्फ जंगली जानवरों के बसेरे ही रह जायेंगे. पलायन आयोग के झुनझुने से तो गाँव आबाद होने से रहे! पहाड़ के अस्पतालों की दुर्दशा है. कुछ माह पूर्व कर्णप्रयाग में सरकारी अस्पताल में प्रसूता व नवजात शिशु काल-कवलित हो गए तो त्यूणी में प्रसूता ने पुल पर शिशु को जन्म दिया. बेरोजगारों की फ़ौज खड़ी है और मुख्यमंत्री, ठेके पर शिक्षक नियुक्त करने को मेले-ठेलों में अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं.

बेरोजगारों की बेहतरी तो दूर की बात है, सरकारी नौकरी पाए पन्द्रह हजार के आसपास प्राइमरी शिक्षक ही सरकारों और अधिकारियों की काहिली के चलते अप्रशिक्षित घोषित हो कर नौकरी गंवाने के कगार पर खड़े हैं. वीरान होते पहाड़ों को बसाना तो सरकार के बूते का नहीं है पर पहाड़ को डुबोने के लिए पंचेश्वर जैसा भीमकाय बाँध बनाने पर पूरा जोर जरुर है. उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान घटित खटीमा, मसूरी,मुजफ्फरनगर, श्रीयंत्र टापू जैसे जघन्य दमन कांडों के दोषियों को सजा दिलाने की तो सरकारें चर्चा करना तक गवारा नहीं कर रही हैं.

ऐसे तमाम सवाल जो उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण हैं, उनपर ठोस नीति बनाने की जरूरत है. लेकिन सत्ता में बारी-बारी आने-जाने वाले, सिर्फ तमाशों और पिकनिकों से इन सवालों को पीछे धकेलना चाहते हैं. जनता के संघर्षों से बना उत्तराखंड सिर्फ सत्ताधीशों और नौकरशाहों की ऐशगाह बन कर रह गया है. इसलिए गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के स्वर को बुलंद करते हुए उत्तराखंड के तमाम जरुरी सवालों को भी पूरे जोर से उठाने की जरुरत है.

भाकपा(माले) राज्य कमेटी सदस्य इन्द्रेश मैखुरी  का कहना है कि गैरसैंण के मामले में सरकार कह रही है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी वहां बनेगी.सत्र शीतकाल में आयोजित हो रहा है.इसका अर्थ यह कि ग्रीष्मकाल से शीतकाल तक गैरसैंण में राजधानी चलाना मुमकिन है तो फिर अन्यत्र की बात ही क्यूँ हो? आइये, गैरसैंण राजधानी और उत्तराखंड के तमाम सवालों पर आवाज बुलंद करने के लिए गैरसैंण कूच में शामिल होइए !

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •