शराब में ओवर रेटिंग का खेल जारी,आबकारी महकमा कटघरे में ?

देहरादून। उत्तराखण्ड सरकार के मुखिया अपने एक साल के कार्यकाल में लगातार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का ऐलान करते आ रहे हैं लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात है कि शराब में आज तक खेल ही खेल नजर आ रहा है और यह खेल किसके इशारे पर हो रहा है यह हैरान करने वाली बात है।

शराब में ओवर रेटिंग का खेल तेरह जिलों में से कुछ जिलों में तांडव की तरह हो रहा है और उस पर नकेल लगाने में न तो आबकारी मंत्री आज तक आगे आते हुए दिखाई दिये हैं और न ही विभाग के अफसरों ने शराब ठेकों पर ओवररेटिंग की हो रही खुली दबंगई को रोकने के लिए कोई कदम आगे बढाया।

अब बहस इस बात की छिड रही है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत राज्य के मुखिया हैं और अगर किसी भी विभाग में भ्रष्टाचार का तांडव हो रहा है तो उस पर नकेल लगाने के लिए उन्हें ही आगे आना चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार छोटा हो या बडा वह कोई मायने नहीं रखता इसलिए मुख्यमंत्री को आगे आकर शराब में हो रही ओवररेटिंग के काले कारोबार पर बडा हंटर चलाने के लिए आगे आना चाहिए तभी उनका भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा सच साबित हो पायेगा?

उल्लेखनीय है कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के दौरान भी आरोप लगते रहे कि शराब ठेकों पर ओवररेटिंग का काला कारोबार चलता रहा है और आबकारी विभाग ने कई बार ओवररेटिंग करने वाले दुकानदारों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए भी अपने कदम आगे बढाये। राज्य में पिछले एक साल से डबल इंजन की सरकार के मुखिया ऐलान करते आ रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के तहत काम होगा और राज्य में भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।

सरकार के इन दावों से आवाम को पंख लगे थे कि अब राज्य में भ्रष्टाचार का काला साया देखने को नहीं मिलेगा। हालांकि उत्तराखण्ड की जनता को पिछले एक साल से डबल इंजन की सरकार का ऐसा कोई करिश्मा देखने को नहीं मिला जिससे कि यह साबित हो सके कि राज्य के अन्दर बदलाव की कोई लहर देखने को मिली है।

उत्तराखण्ड सरकार ने शराब को लेकर बडे-बडे दावे किये थे कि वह शराब को हतोसाहित नहीं करेंगे और पहाड़ व मैदान के शराब ठेकों के खुलने व बंद होने के समय में भी बदलाव कर सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई थी लेकिन कुछ समय बाद ही सरकार अपने वायदे से मुकर गई और उसमे शराब प्रेम खुलकर देखने को मिल गया। सरकार के आबकारी मंत्री मीडिया में बार-बार बयानबाजी कर चुके हैं कि शराब ठेकों पर किसी भी कीमत पर ओवररेटिंग का खेल नहीं होने दिया जायेगा।

सरकार की मंशा में यहां भी खोट दिखाई दिया क्योंकि आबकारी मंत्री ने ऐलान किया कि अगर किसी शराब पर तीन बार ओवररेटिंग होती हुई दिखाई दी तो उसकी दुकान को निरस्त कर दिया जायेगा। जिससे बहस छिडी कि आखिर जब कोई दुकानदार पहली बार अपराध करता है तो उसे उसी समय सजा देने से क्यों आबकारी मंत्री पीछे हट गये क्योंकि बार-बार किसी दुकान पर आबकारी के अफसर भी नहीं जा सकते और न ही आवाम के पास किसी अधिकारी का नम्बर है जिससे कि वह उन्हें बता सके कि शराब ठेकों में ओवररेटिंग को लेकर किस तरह से खुलेआम भ्रष्टाचार का काला कारोबार हो रहा है।

सरकार के मुखिया पर भले ही भ्रष्टाचार का कोई दाग न लगा हो लेकिन जिस तरह से आबकारी मंत्री के महकमें में ओवररेटिंग का काला कारोबार राजधानी से लेकर मैदान व पहाड के कुछ जिलों में बेखौफ हो रहा है उससे इस बात में कोई शंका नहीं है कि ओवर रेटिंग के इस काले कारोबार में कुछ राजनेता व अफसरों की मिलीभगत न हो? सरकार के मुखिया अगर भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के दावे को चरितार्थ करने का सपना अभी भी देख रहे हैं तो उन्हें शराब में हो रही ओवररेटिंग पर बडा चाबुक चलाना चाहिए। गजब बात तो यह है कि सरकार को जब मालूम था कि उन्होंने राज्य की नई शराब पॉलिसी लागू करनी है तो फिर एक साल तक उस पर मंथन व चिंतन कर अंतिम मोहर लगाने में क्यों देरी की गई इसको लेकर भी आबकारी महकमा कटघरे में खडा है?

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