udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news सरकार में तो लगता है कि कोई सहारनपुर वाला है,कोई बिजनौर वाला !

सरकार में तो लगता है कि कोई सहारनपुर वाला है,कोई बिजनौर वाला !

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इंद्रेश मैखुरी

देहरादून में रह कर पहाड़ को हिकारत से देखने वाले पहाड़ियों पर व्यंग्य करते हुए नरेंद्र सिंह नेगी जी ने गीत लिखा-“मेरे को पाड़ी मत बोलो,मैं देरादूण वाला हूँ.” पर उत्तराखंड के, गति कम,धुँआ ज्यादा छोड़ने वाले डबल इंजन की सरकार में तो लगता है कि कोई सहारनपुर वाला है,कोई बिजनौर वाला है.

 

पहले कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत,बिजनौर के गाँवों को उत्तराखंड में मिलाने की वकालत कर रहे थे.अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत कह रहे हैं कि वे तो बहुत पहले से सहारनपुर को उत्तराखंड में मिलाए जाने के पक्षधर रहे हैं !सहारनपुर उत्तराखंड में मिलेगा,नहीं मिलेगा,यह तो वक्त बताएगा. पर त्रिवेंद्र रावत साहब,आप इतना बता दो कि बीते 17 सालों में आपने और आपके जैसों ने,जो लगातार सत्ता में आते-जाते रहे, उत्तराखंड को ऐसा क्या दे दिया,जो आप अब सहारनपुर को देना चाहते हैं?

 

उत्तराखंड पर, आपने और सत्ता की मलाई चाटने वाले आपके भाई-बिरादरों ने, ऐसे कौन से सुर्खाब के पर लगा दिए हैं,जो आप चाहते हैं कि आप के कर-कमलों से सहारनपुर में भी लग जाएं ?अगर वहां किसी दूसरी पार्टी की सरकार होती तो मान लिया जाता कि सहारनपुर में ठीक से विकास नहीं हो रहा होगा,इसलिए वहां के विकास का जिम्मा भी आप,अपने हाथ लेना चाहते हैं.पर इस समय तो उत्तर प्रदेश में भी आप ही की पार्टी की सरकार है ! यह तो आपने,अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री को कठघरे में खड़ा कर दिया कि सहारनपुर वालो,इनसे तुम्हारा विकास न होगा,इसलिए तुम इधर आ जाओ !

 

और सहारनपुर में किसके लिए फिक्रमंद हैं,त्रिवेंद्र भाई?वहां जो मजदूर है,जो किसान है,जो रात दिन खट रहा है,जिंदगी से जूझ रहा है?उसकी चिंता है तो इस चिंता में हम आपके साथ हैं.पर सवाल फिर वही खड़ा होता है कि जिसे सहारनपुर के मजदूर-किसान की बदहाली सताएगी तो जिस राज्य की गद्दी पर वह बैठा है,वहां के मेहनतकशों की बदहाली क्यों नहीं सताएगी?उत्तराखंड में तो खेती तबाह है,मजदूरों की दुर्दशा.और तो और ट्रांसपोर्टर तक आत्महत्या कर रहे हैं !इनकी पीड़ा तो त्रिवेंद्र रावत के चेहरे पर देखी नहीं गयी.उलटा आत्महत्या की धमकी देने को उन्होंने फैशन करार दे दिया.यह जवाब अभी आना बाकी है कि आदमी को इस हालत में किसने पहुंचा दिया कि वह ऐसे जानलेवा फैशन अपनाने को विवश हो गया है ?

 

बहरहाल इससे यह तो तय हो गया कि वहां के गरीब-मजलूम की चिंता,त्रिवेंद्र रावत को नहीं है.तो फिर कौन हैं,सहारनपुर में जिनके लिए त्रिवेंद्र रावत जी के दिल में इतना प्रेम उमड़ा जा रहा है.सत्ता में आने के बाद शराब वालों और रेता-बजरी वालों के हक में फैसला करवाने त्रिवेंद्र रावत जी की सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गयी.तो क्या यहां के शराब और रेता-बजरी वाले कम पड़ रहे हैं,रावत साहब ? “सहयोग” की “निधि” , “आजीवन” भरी रहे,इसके लिए क्या सहारनपुर तक का सीमा विस्तार अनिवार्य हो गया है?

 

उत्तराखंड की मांग,एक पर्वतीय प्रदेश की मांग थी.इसके पीछे मकसद यह था कि यहां कि विषम भौगोलिक स्थितियों और विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के हिसाब से नीति नियोजन हो.17 सालों में इस अवधरणा को साकार करने के बजाय इसे ध्वस्त करने पर ही सत्ता में आने-जाने वालों का जोर रहा. मुख्यमंत्री का ताजा बयान भी उसी दिशा में एक कदम और है.

 

उत्तराखंड,जब उत्तर प्रदेश का हिस्सा था तो गोविंद बल्लभ पंत से लेकर एन.डी.तिवारी तक उत्तराखंडी मूल के बड़े नेता,अलग उत्तराखंड राज्य के विरोधी थे.वे उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री होना, अपने बड़े राजनीतिक कद के अनुरूप मानते थे.प्रधानमंत्री होने का रास्ता,भी उन दिनों कहा जाता था कि उत्तर प्रदेश से हो कर गुजरता है.तो इन नेतागणों को 85 सांसदों का नेता होने का ख्वाब आकर्षित करता था.त्रिवेंद्र रावत टाइप लोग उत्तर प्रदेश में रहते तो मुख्यमंत्री होने का सपना भी नहीं देख सकते थे.

 

लेकिन चूंकि उत्तराखंड में बिल्ली के भागों छींका फूट चुका है तो सोचते होंगे कि उत्तर प्रदेश न सही,उसके जितने अधिक हिस्से पर हुकूमत हो जाये,उतना ही मजा ! पर मुख्यमंत्री महोदय,राज तो छोड़िए अपने मंत्री-विधायक तो आप से संभल नहीं रहे हैं.वो खुलेआम आपको चुनौती दे रहे हैं.खतरा इस कदर मंडरा रहा है कि कहीं चाय भी पी जा रही है,तो लग रहा है कि चाय की धार ही आपकी गद्दी को बहा ले जाएगी.आप कहाँ सहारनपुर के चक्कर में पड़े हैं,जबकि अपनी कुर्सी कभी भी डोल सकती है.ऐसी हरकत करने वालों का मजाक उड़ाते हुए तो पहाड़ी बुजुर्गों ने कहावत रची थी-“अपणा नि देखणा हाल अर हैंका गौं द्यौण स्वाल”!

(अपनी स्थिति पर गौर किये बगैर, दूसरे गांव को निमंत्रण देना)
ऐसा न हो कि इस कहावत के उदारहण के तौर पर आपका नाम दर्ज हो जाये त्रिवेंद्र रावत जी !!

की फेसबुक वाल से साभार

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