udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news सपनें आज भी अधूरे हैं और राज्य वासियों की ख्वाहिशें खारिज

सपनें आज भी अधूरे हैं और राज्य वासियों की ख्वाहिशें खारिज

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उत्तराखंड राज्य बनाने के पीछे के सपनें आज भी अधूरे हैं और राज्य वासियों की ख्वाहिशें आज खारिज हो गई हैं। राज्य में सत्तासीन नेता सिर्फ अपने मतलब के लिए राज्य में राज कर रहे हैं और जनता हैरान-परेशान नजर आ रही है। आज राज्य किस स्थिति में यह किसी से छुपा नहीं है, हम उस समय से ठगे से खड़े हैं।

दुर्भाग्य कि विकास के नाम पर तो राजनीति हो रही है, लेकिन विकास के लिए नहीं। विकास इस प्रदेश के लिए प्राथमिक जरूरत आज भी है और उस समय भी थी। इसके लिए चाहिए तमाम विरोधों के बीच-बावजूद सर्वदलीय सर्वानुमति, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र की तरह यह भी बेहद दुर्गम-दुर्लभ हो गई है और तरक्की की तमाम नेक मंशा भी दलीय विरोध के कारण मूर्त रूप नहीं ले पा रही है। सियासी दलों के आंदोलन का साझा मकसद पृथक राज्य था, लेकिन मकसद पूरा होते ही वे इतने कच्चे निकले कि बिखर गए। राज्य के वर्तमान हालात पर संतोष बेंजवाल का यह आलेख

उत्तराखंड में विकास के नाम पर हो रही हैे राजनीति राज्य बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ चला राज्य बने एक दशक से अधिक का समय हो गया, लेकिन राज्य के लोग आज भी हैं परेशान

उत्तराखंड राज्य बने इतना लंबा समय हो गया, लेकिन राज्यवासियों के सपने आज भी उडान नहीं भर पाए और उनकी जो ख्वाहिसें थी वह खारिज हो गई हैं। राज्य के अभी तक के सत्तासीन लोगों ने कभी राज्य की जनता के सपनों का उत्तराखंड बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। कभी राजधानी-राजधानी, तो कभी कुर्सी-कुर्सी का खेल तो कभी घोटालों की परतों में उलझकर राज्य के सत्तासीन नेता यह भूल गए कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण क्यों किया गया और राज्य के लोगों की भावनाएं क्या हैं।

राज्य बने एक दशक से अधिक का समय हो गया, लेकिन जनता आज भी उसी हाल में है जैसे की यूपी के समय में थी। जो बदलाव आये हैं वह आधुनिकता की चकाचौंध के कारण स्वतः ही आ गए। उत्तराखंड राज्य जब अलग बना तो उस समय राज्य की नई कहानी लिखने की आवश्यकता थी कि किस प्रकार का राज्य होगा हमारा उत्तराखंड।

 

इस कहानी के लेखक की भूमिका में भाजपा को मुख्य  कहानीकार बनाया गया था और कांग्रेस, यूकेडी सहित अन्य दलों के नेतानबीसों को सहायक, लेकिन किसी ने भी राज्य की भावना का ख्याल नहीं रखा और चले अपने-अपने कदमों पर कदमताल करते हुए। आज राज्य किस स्थिति में यह किसी से छुपा नहीं है, हम उस समय से ठगे से खड़े हैं।

दुर्भाग्य कि विकास के नाम पर तो राजनीति हो रही है, लेकिन विकास के लिए नहीं। विकास इस प्रदेश के लिए प्राथमिक जरूरत आज भी है और उस समय भी थी। इसके लिए चाहिए तमाम विरोधों के बीच-बावजूद सर्वदलीय सर्वानुमति, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र की तरह यह भी बेहद दुर्गम-दुर्लभ हो गई है और तरक्की की तमाम नेक मंशा भी दलीय विरोध के कारण मूर्त रूप नहीं ले पा रही है। सियासी दलों के आंदोलन का साझा मकसद पृथक राज्य था, लेकिन मकसद पूरा होते ही वे इतने कच्चे निकले कि बिखर गए। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में पहाड़ी जिलों की जनता ने संघर्ष किया और अनेक कुर्वानियां दी, मातृशक्ति की सहादतें आज भी याद की जाती हैं।

सरकारी कर्मचारियों ने अपनी नौकरियां दांव पर लगा दी और चाहते थे कि इन पहाड़ी जिलों के विकास के लिए इसे प्रथम चरण में केन्द्र शासित प्रदेश घोषित किया जाय। उस समय राजनैतिक दलों ने बड़े-बड़े दावे किये  कि अपना राज्य होगा, पहाड़ की राजधानी गैरसैण में होगी, जमीन से जुड़े हुए यहां के अपने लोग यहां की जरूरत के अनुरूप योजनायें बनायेंगे, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली पानी की समस्या हल होगी। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र का विस्तार होगा, लोगों को रोजगार मिलेगा और पहाड़ी जिले के लोगों की खाद्यान्न के मामले में बाहरी निर्भरता समाप्त होगी।

आज उत्तराखंड बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ चला है। लेकिन पीछे मुड़कर देखें आंखें गीली हो आती हैं। तमाम आधारभूत-मूलभूत सुविधाएं अभी भी नवजात अवस्था में ही हैं। सपने अभी भी अधूरे ही है, तमाम ख्वाहिशें खारिज-सी हो चुकी हैं। अभी दो आज दो उत्तराखंड राज्य दो-जैसे नारे उस वक्त आवाज नहीं, जुनून थे। हमारा राज्य-हमारा राज की जिद से जूझकर-जान देकर हासिल किया गया उत्तराखंड आज खंडित आशाओं का प्रदेश बन गया है, शासन-सत्ता से नैराष्य घर करता जा रहा है। कुछ हमने तरक्की की है, कुछ मिसालें कायम की हैं, लेकिन ये लौ अ-विकास के घनघोर-घटाटोप अंधेरे का मुकाबला करने के लिए नाकाफी हैं।

यहां पर बहने वाली सदानीरा नदियों से पर्याप्त मात्रा में बिजली का उत्पादन एवं उसे दूसरे राज्यों को बेच कर आर्थिक उन्नति हो सकेगी। नदियों से मिलने वाले उपखनिजों के चुगान, दुर्लभ जड़ी-बूटियों आदि के दोहन से आर्थिक समृ(ि होगी वहीं विकास कार्य कम लागत एवं समय पर पूरे हो सकेंगे। पहाड़ के पानी व जवानी को पहाड़ में रोका जायेगा। राज्य बनने के बाद प्रथम चुनाव के समय राजनैनिक दलों द्वारा उक्त मुद्दों को अपने चुनावी घोषणा पत्रों में भी रखा और आज एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी यहां की समस्याओं को हल करना तो दूर इनके लिए स्पष्ट नीतियां तक नहीं बन पायी।

राष्ट्रीय दलों द्वारा देहरादून को अस्थायी राजधानी कह कर सियासत की जा रही है और विकास के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।  प्रदेश के जल, जंगल एवं जमीन का नारा देकर बना उत्तराखंड राज्य आज इन राजनैतिक पार्टियों की बेरूखी के कारण बदहाली का शिकार हो गया हैं।आज उत्तराखंड की स्थिति ऐसी है कि आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैय्या है। स्वास्थ्य सेवाओं का हाल ये है कि अस्पतालों में तैनात चिकित्सकों के 60 फीसदी पद खाली हैं और प्रसव के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है।

शिक्षा क्षेत्र के सबक भी विडंबना ही है। हमने कामचलाऊ-कथित राजधानी में तो एजूकेशन हब बना लिया, रुड़की में आईआईटी है लेकिन राज्य के बाकी हिस्सों में स्कूल हैं तो इमारत नहीं, इमारत है तो शिक्षक नहीं। और तो और, बिजली-पानी-शौचालय की व्यवस्था के लिए सुप्रीम कोर्ट तक को जोर लगाना पड़ रहा है और सरकार सफाई दिए-दिए परेशान है। अलग राज्य के लिए एक आधार पलायन भी था।

पहाड़ी राज्य के पहाड़ी गांव सूने होते जा रहे हैं और देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्र पर आबादी का दबाव बढ़ता जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्र को दुर्गम का दर्जा देकर विकास की मुख्य धारा से ही दूर कर दिया गया है। जिसे बाकी सहोदर सूबों के माफिक विकास प्रदेश बनना था, वो विकास को तरसता प्रदेश बनता जा रहा है।उत्तराखंड राज्य की मूल अवधारणा गैरसैण में राजधानी बनाने को लेकर थी ताकि इस केन्द्रीय स्थान से सभी जिलों में समान रूप से विकास की किरणें पहॅुचती परन्तु राष्ट्रीय दलों द्वारा जनता की कठिनाईयों को दूर करने के बजाय अपनी सुख सुविधाओं को अधिक तबज्जो दी गयी। आपसी गुटबाजी की शिकार उत्तराखंड क्रान्तिदल की आवाज राज्य बनने के बाद गुम हो गयी।

राजधानी आयोग बना कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली गयी। आयोगों द्वारा पहाड़वासियों को बेवकूफ समझ कर वर्षों सत्ता सुख भोगा, आखिर ढाक के तीन पात। वास्तविकता यह है कि जो सुख इन नेताओं एवं उत्तर प्रदेश सरकार से आयातीत हूकमरानों को देहरादून में मिल रहा है वह गैरसैण आने में नहीं मिल पाता बल्कि गैरसैण राजधानी बनाने पर इन्हें अधिक कड़ी मेहनत करनी पड़ती। हालांकि फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गैरसैंण में विधानसभा भवन के शिलान्यास का पत्थर तो लगा दिया, लेकिन क्या यह यहां के हूक्मरानों को मंजूर होगा या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता है।

यहां यह उल्लेख करना चाहूंगा कि यदि राष्ट्रीय पार्टियां एवं क्षेत्रीय संगठन पहाड़ी राज्य के हिमायती होते तो देहरादून स्थित अस्थायी राजधानी से ही सर्वप्रथम गैरसैण को जिला घोषित करा कर उसका परिसीमन कराते, लेकिन यह कुछ भी नहीं हुआ और जो कुछ हो रहा है वह भी लगता है कि राजनैतिक रोटियां सेंकी जा रही है।

अगर ऐसा नहीं है तो स्थाई राजधानी के लिए इतना लंबा समय क्यों लगा? वहीं दूसरी ओर, पूर्वोत्तर राज्यों एवं देश के अन्य राज्यों को देखें जहां उनकी राजधानी उनके मध्य मंें जनता की मांग के अनुरूप हैं वहां पहले कौन सी हवाई, रेल अथवा अन्य सुविधायें थी ? जब उत्तराखंड में उक्त सुविधायें नहीं है तभी तो राज्य स्तरीय अलग प्रशासनिक इकाई की मांग की गयी थी वरना लखनऊ क्या बुरा था ?

यह कैसी बिडंबना है कि आज सरकार अपने ही कर्मचारियों के साथ कोट केस लड़ रही है जो अत्यन्त शर्मनाक है। देहरादून राजधानी होने से आज कोई अधिकारी-कर्मचारी सच्चे मन से पहाड़ी जिलों में काम करने के लिए नहीं आना चाहता। योग्य एवं प्रशिक्षितों की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद अधिकतर विद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त है,जिससे निचले स्तर पर भी कर्मचारियों ने अपने पाल्यों को सुगम स्थानों पर दाखिला दिलाया हुआ है और उनकी देख-रेख के बहाने अधिकतर अपने मुख्यालय से गायब रहते है।

प्रदेश में बेरोजगारों की लम्बी फौज खड़ी हो गयी है और आये दिन आन्दोलन चक्का जाम आदि सामान्य बात हो गयी है। पहाड़ी क्षेत्र के कर्मठ नौजवान सेना की नौकरी को पसंद करते हैं। होना तो यह चाहिए था कि यहां की संस्कृति के अनुरूप हाईस्कूल से ही अन्य विषयों के साथ-साथ सैनिक शिक्षा लागू की जाती ताकि बच्चे शाररिक रूप से मजबूत रहते और आवश्यकता पड़ने पर सेना में भर्ती के लिए उपलब्ध रहते। उल्टे यहां के नौजवान नौकरी न मिलने के कारण डिग्री कालेजों में दाखिला लेते हैं और बेरोजगार डिग्री प्राप्त कर मोबाईक व मोबाईल के आदी हो रहे हैं। उत्तराखंड के युवा और उत्तराखंड विकास के नाम पर यहां कुछ नहीं हो पाएगा और लोग ऐसे ही रहेंगे।

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