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संजीदगी और शब्दों के मोह्पाश में शायरी गुजरी !

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समय साक्ष्य द्वारा प्रकाशित – सुफियान बक्शी की किताब- फराग- के लोकार्पण/ रस्मे इजरा समारोह में कल बेहद – संजीदगी और शब्दों के मोह्पाश में शायरी गुजरी !

ऊपर नीला आसमान – आम के बौर की छाया – वो बगल से पसरी फाईकस बेंजामिना की पत्तियां और बहुत कुछ ! लकड़ी के रंगीन बेंच -नीले और पीले – गुनगुने गीलेपन का अहसास कराती ये बेमौसमी सर्द हवा और बारिश .

अल्फाज- जज्बात, दर्द और मायार !
उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में जन्मे सुफियान बक्शी की पुस्तक का प्रकाशन – समय साक्ष्य ने किया है .

फराग के निमंत्रण में कहा गया -दावतनामा- जज्बाती ख्यालात के शीरी मजमुए – फराग सुफियान बक्शी की रस्मे इजरा -कार्यक्रम की मेहमाने खुसुसी -डॉक्टर सय्यद फ़ारूक ने की .

कार्यक्रम में विशेष रूप से अम्बर खरबंदा, सीमा शफ़क, गिरीश लखेडा और डॉक्टर एन. एस. वोहरा ने अपने विचार रखे !

117 पेज की इस किताब में मेरा ख्याल सेक्शन में लिखते हैं लेखक-

बहुत उलझे उलझे से मरहले हैं मेरी जिंदगी के
कुछ सुलझे हैं , कुछ सुलझ रहे हैं .

पहले खंड में – अनकहे , मेरी मोहब्बत ,शब् ऐ गम, तनज और मशवरा से जात ऐ ज़िदगी तक किताब का कैनवास विभिन्न स्ट्रोकों में फैला है .

इस किताब में याद रखने के लिए जो बेहतरीन है -किताब के अनकहे सेक्शन में कहते हैं – शायर –

रोशन है तू मुझमे कहीं सितारों की तरह
कि अब अँधेरा हो जाने से डरता हूँ
सुकून मिलता है तेरे दीदार में,
कि अब भी बेकली से डरता हूँ

मेरी मोहब्बत सेक्शन में लेखक ने कहा है –

कुछ गुजरा है मेरे,
ख्याल पे अभी – अभी ,
इस तरह भी तेरे नाम ने ,
जिंदा किया हुआ है मुझे.

तनज के हिस्से में पेज नंबर 89 पर लिखा है –

“मैं लगभग
बन ही गया था तेरे क़ाबिल,
जो तेरी ख्वाहिशें
वक्त पे बदली ना होती .

अंतिम पडाव में जाते जाते लिखते हैं सुफियान –

‘ बहुत लुटे हैं अरमान मेरे
मुहब्बत की दहलीज पर,
अक्सर जब भी जमाने को वक्त के साथ
बदलते देखा है !”

शाम को चाय और काफी के साथ कार्यक्रम समाप्त होने को आया , देखा हवा से झड़ी आम की बौरों ने खाली प्लास्टिक की कुर्सियों और बेंचों पर अपनी महफ़िल सजा ली थी, अँधेरा घिर आया.और इस इस तरह किताब को बैग में भरकर मैं घर लौट आया यूँ ही लिख दिया मैंने अपनेपन की फारीगीयत को .( फराग= फारिग होना ).

इस पुस्तक को समय साक्ष्य प्रकाशन से प्राप्त किया जा सकता है मूल्य रूपये १०० .
बेहतरीन और साधारण कवर – छपाई में सुंदर .

 

( जे. पी. मैठाणी)

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