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रवाँई: उल्लास के उत्सवो की धरती थान गाँव में है कल्पवृक्ष

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दीपक बेंजवाल

रवाँई से लौटकर -2
बड़कोट से यमुनोत्री मार्ग पर 10 किमी की दूरी पर खरादी बाजार से पहले एक कच्ची सड़क थान देवग्राम को जाती है। थान जमदग्नि ऋषि की तपस्थलि है। पौराणिक आख्यानो के अनुसार जमदग्नि ऋषि यहाँ पर महादेव की उपासना करते थे कहते है एक बार शक्ति के मद में चूर राजा सहस्त्रबाहु ने उनपर हमला कर दिया और ऋषि का सर काट लिया, तपबल के प्रभाव से ऋषि जमदग्नि जीवित तो रहे लेकिन सहस्त्रबाहु का प्रतिउत्तर न दे सके फलतः उन्हेने इन्द्र को सहायता के लिऐ कहा।

लेकिन देवराज द्वारा असमर्थता प्रकट करते हुऐ अगस्त्य ऋषि के पास जाने का सुझाव दिया। अगस्त्य ऋषि के आलौकिक शक्तियो के ज्ञाता थे और उनके पास सकल मनोरथ पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय और कल्पवृक्ष भी था। तब ऋर्षि जमदग्नि के निवेदन पर अगस्त्य जी कामधेनु और कल्पवृक्ष समेत इस स्थान पर आऐ। मंदिर परिसर में अब भी उस प्राचीन कल्पवृक्ष का अवशेष मौजूद है।

थान गाँव का मुख्य मंदिर जमदग्नि ऋषि और उनकी पत्नि रेणुका का है। मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग है जिसकी आराधना स्वंय जमदग्नि जी करते थे। गर्भगृह में जमदग्नि, रेणुका, अगस्त्य, सोमेश्वर जी समेत सात मूर्तियाँ स्थापित है।
ज्येष्ठ मास की समाप्ति के उपरांत आषाण संक्रन्ति को यह मेले का आयोजन होता है। यह आयोजन रवाँई के आराध्य सोमेश्वर को समर्पित है।

कहते है जब सोमेश्वर इस गाँव में आऐ तो जमदग्नि ऋषि ने सोमेश्वर देवता से माँस भक्षण न करने का वचन लिया। तब उन्होने देवता के सम्मान में सबसे पहले मेले के आयोजन वायदा किया। जिसका पालन आज भी क्षेत्रवासी करते है। मेले के पहले दिन तीरंदाजी का आयोजन होता है। जिसके लिऐ आटे से एक बड़ा रोट ( 27 किलो )बनाया जाता है। इसे आग में पकाया जाता है। शाम को चार बजे के आसपास मेला शुरू होता है। मेले के लिऐ देवपालकी में सोमेश्वर की मूर्ति रखी जाती है।

देवता की पालकी के साथ ग्रामीण एक खेत में पहुचते है। खेत के एक कोने पर देवता के साथ तीरंदाज होते है और दूसरी ओर रोट को एक पेड़ के तने के साथ बाँधकर लक्षय बेधन के रूप मे खड़ा किया जाता है। देवपालकी एक एक कर सभी तीरो और धनुषो को देखती है और फिर मेला शुरू करने की आज्ञा देती है। ढोल की थाप पर लक्ष्य बेधन शुरू होता है। जो कुछ देर की मशक्कत के बाद पूरा होता है। पुनः देवपालकी को मंदिर परिसर में लाकर पूजा होती है। पूजा के बाद ग्रामीण देवडोली के साथ नृत्य कर उल्लास प्रकट करते है। दूसरे दिन फरसो पर देवता के पश्वा चलकर शक्ति प्रदर्शन करते है और तीसरे दिन ताँदी गीत और नृत्य के साथ मेला समाप्त हो जाता है।

रवाई यात्रा के दूसरे पड़ाव के रूप में थान जाना मेरे लिऐ इसलिऐ भी महत्वपूर्ण था क्योकि यह हमारी मन्दाकिनी घाटी के आराध्य अगस्त्य ऋषि के महत्व से भी जुड़ा था। थान रवाई घाटी का समृद्ध गाँव है जिसकी समृद्धि का अंदाजा इसके मीलो पसरे समतल खेतो को देखकर लगाया जा सकता है। भाटिया के समान रवाई का उल्लास थान गाँव में भी बरकरार था। हंसते झूमते ग्रामीणो को देखकर उनकी महान संस्कृति को नमन करने का मन होता है। सच में रवाई के लोग धन्य है जो इतनी उल्लासमयी संस्कृति के वो मालिक है। थान गाँव में भी एक अतिथि के रूप में मेरा स्नेह से स्वागत हुआ। खासकर वहाँ के बहुत से युवाओ का अपन्त्व दिल को छू गया।

रवाँई की सबसे खूबसूरत बात ये भी है कि यहा देवी देवता संस्कृति का हिस्सा होते है। कठिन धार्मिक रिवाज कर्मकांड के इतर यहा देवता एक आत्मीय स्वरूप में पूजे जाते है, उनके साथ परिवार के सदस्यो की भाँति हंसना, बोलना, रूठना, मनाना अच्छी खूबी है। कुलमिलाकर कहे तो रवाँई उत्साह, उल्लास के उत्सवो की धरती है।तो आईये रवाँई की इस खूबसूरत उल्लासमयी संस्कृति के दर्शन करे।

मेले की पूजा

Posted by दीपक बेंजवाल on Saturday, 16 June 2018

मेले का दृश्य

Posted by दीपक बेंजवाल on Saturday, 16 June 2018

देव पालकी के साथ नृत्य

Posted by दीपक बेंजवाल on Saturday, 16 June 2018

बड़कोट से यमुनोत्री मार्ग पर 10 किमी की दूरी पर खरादी बाजार से पहले एक कच्ची सड़क थान देवग्राम को जाती है। थान जमदग्नि ऋषि की तपस्थलि है। पौराणिक आख्यानो के

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