udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news रहस्य : डुंडा बौडा की वड्यार अर्थात लंगड़े ताऊ की गुफा....!

रहस्य : डुंडा बौडा की वड्यार अर्थात लंगड़े ताऊ की गुफा….!

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केदारघाटी में स्थित अगस्तमुनि ब्लॉक का बहुत प्यारा गांव जिसका नाम है बेंजी-गंगतल l जो कि मेरा ननिहाल भी है l  गांव में और भी ऐसे फ़साने का कालक्रम है जिसका नाम है  डुंडा बौडा की वड्यार अर्थात लंगड़े ताऊ की गुफा….!

गाँव के सभी लोग डुंडा बौडा के वड्यार से परिचित हैं, पुराने लोगों के अनुसार डुंडा बौडा एक गुफा में रहते हैं जो कि खुद में मस्त, एकांत-प्रिय हैं, कई लोगों का ये भी मानना है कि बौडा संगीत के बहुत शौक़ीन हैं, क्योंकि कई लोगों ने गुफा से रेडियो पर चलते हुए गानों की आवाज सूनी है, तथा जो भी घस्यारी घास लेने उस बीठे(खाई) की तरफ गयी, उसने भी गानों की आवाज साफ़-साफ़ सुनी है l

साधारण रूप से देखा जाये तो  डुंडा_बौडा की छवि न तो भूत-प्रेत की तरह डरावनी लगती है और ना ही किसी फरिस्ते की तरह मददगार या चमत्कारी, शायद वो कोई रहस्यमयी इंसान या कोई शांत-चित्त आत्मा है जो अपने आप में मदमस्त है जिसको मुक्ति की चिंता नहीं, जिसको किसी द्वेष आदि मलाल नहीं l जो शायद कभी उस गुफा से बाहर ही नहीं निकला और हर समय संगीत सुनने में व्यस्त रहा है, कभी-कभी कुछ लोगों को बच्चों को डराने के लिए उनके नाम का इस्तेमाल करते देखा गया है, जैसे कि – ऐसा मत करो वरना डुंडा बौडा आ जाएगा, बस इतने तक ही सीमित है बौडा का डर l

उनकी वजह से कोई घटना कोई दुर्घटना आज तक सुनने को नहीं मिली लेकिन फिर भी लोकप्रिय हैं और गाहे-बगाहे उनका जिक्र होता ही रहता है l मगर यहाँ पर सबसे अहम् सवाल यह उठता है कि जब किसी ने डुंडा बौडा देखा ही नहीं तो क्यों इस प्रकार की धारणा लोगों के मन में है? ये क्यों कहा जाता है कि बौडा डुंडा है?

“ दरअसल इसका तर्क-संगत और वैज्ञानिक विश्लेषण यह है कि जहां यह वडयार अथवा गुफा है, उस जंगल का नाम ढोन्ड है, और यह जगह ढोन्ड के बीठे के नाम से प्रसिद्ध है, पहले लोग इसको ढोन्ड के वडयार के नाम से संबोधित करते होंगे, और कालांतर में यही ढोन्ड का वडयार से डुंडा का वडयार और फिर रहस्यात्मक या डरावना स्वरुप देने के लिए बौडा जोड़कर डुंडा बौडा का वडयार हो गया, गानों की आवाज के पीछे यह रहस्य है कि ढोन्ड के ठीक सामने नदी के पार फलाटी गाँव है,

फलाटी गाँव से काफी नीचे भी कुछ इक्के-दुक्के मकान बने हैं, पहाड़ों में आवाज का लौटकर सुनाई देना आम बात है, लेकिन उस जंगल में हम लोगों ने भी कई बार यह महसूस किया है कि फलाटी की तरफ खेतों में या रास्ते में कोई अगर बात-चीत कर रहा हो तो उनकी आवाज कभी-कभी साफ़ सुनाई देने लगती है, कुछ सेकंड तक सुनाई देने के बाद यह आवाज बंद हो जाती है, और फिर कुछ देर बाद सुनायी देने लगती है, इस प्रकार बच्चों के खेलने की अथवा खेतों में अक्सर किसी औरत के जोर-जोर से बोलने की, किसी लड़की के स्वारा जाते समय रोने की आवाज सुनायी देती रहती है,

हवा का कम या ज्यादा दबाव या हवा के बहने का प्रवाह या दिशा या नदी के आर-पार की दूरी अथवा विशिष्ट बनावट कोई न कोई प्राकृतिक कारण ही है जिसकी वजह से उस पार की आवाजें कुछ समय के लिए अचानक सुनायी दे जाती हैं, जब कोई आदमी या औरत इस गुफा के समीप लकड़ी अथवा घास लेने आया होगा तो उसे उस पार से रेडियो में बजते गानों की आवाज सुनाई दी होगी और फिर बौडा गाने सुनता है, अथवा रेडियो चलाता है, यह उसमें जुड़ गया…….!

गंगतल में बाघ अक्सर आता ही रहता है,और सबसे ज्यादा यह ढोन्ड की तरफ ही देखा गया है, क्योंकि बहुत ही सुरक्षित व खतरनाक बीठे पर इस गुफा के होने से यह बाघ का स्थाई निवास है, लोगों के उस तरफ न जाने का यह भी एक कारण है, इसीलिए गुफा के अंदरुनी स्वरुप के बारे में किसी को पता नहीं है, और रहस्य बरकरार है, लेकिन सच्चाई चाहे कुछ भी हो, बौडा के वडयार की यह गाथा बहुत मजेदार है, अमर है सुनने में अच्छी लगती है,और एक बार गुफा को देखने की उत्कंठा जाग उठती है !

साभार : हरीश चन्द्र बेंजवाल , दीपक बेंजवाल

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