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रहस्मयी : 80 के दशक में यहां निकली थी बेताल की बारात

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नकुआ बूबू का चमत्कारिक दरबार बेतालेश्वर घाटी की यह घटना है 80 के दशक की

बेतालघाट ( नैनीताल): उत्तराखंड क्षेत्र अनेक रहस्मयी कथाओं को अपने आप में समेटे हुए है, बेताल के रहस्य को समेटे इस घाटी की रोमांचकारी कहानी व बेताल के किस्से आज भी लोगों की जुबां पर रहते है। लगभग 80 के दशक में इस इलाके में निकली बेताल की बारात का समाचार समूचे देश में सुर्खियों में रहा था।

 

 

तब से इस भूभाग को विशेष रूप से प्रसिद्वी मिली लेकिन पर्यटन व तीर्थाटन के लिहाज से बेतालघाट क्षेत्र घोर उपेक्षा व दुर्दशा का शिकार है। विक्रम व बेताल की कहानी किस्से इतिहास में जितने रोमांचकारी है, उतने ही रोमांचकारी यहां बेताल बुबू के किस्से है।आध्यात्मिक दृष्टि से बेतालेश्वर घाटी के महाप्रतापी क्षेत्रपाल के रूप में पूजित नकुआ देवता भगवान शिव के सबसे शक्तिशाली गण माने जाते हैं। इतना ही नहीं वह भगवान शिव के सहस्रों गणों-भूत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, अलाई-बलाई, राक्षस, डाकिनी-शाकिनी इत्यादि के अधिपति भी माने जाते हैं।

 

अनेकानेक दिव्य एवं चमत्कारिक शक्तियों के स्वामी नकुआ देवता मूलतः तमोगुणी स्वभाव के होने के बावजूद अत्यधिक शांत, सरल एवं अपने भक्तों से स्नेह रखने वाले देवता हैं। सम्पूर्ण बेतालेश्वर घाटी नकुआ देवता की दिव्य छांव में पूर्णतः सुरक्षित एवं संरक्षित मानी जाती है। जो कोई भी सच्चे एवं निर्मल भाव से नकुआ देवता की पूजा-उपासना करते हैं, वे हमेशा के लिए भयमुक्त जीवन जीने का आनन्द लेते है ऐसा मत स्थानीय श्रदालुओ का उनके प्रति रहता है।

 

 

स्थानीय लोगों का कहना है कि नकुआ देवता स्वभाव से उग्र होने के बाद भी सदैव जन कल्याण में तत्पर रहते हैं। शरणागत पर ये ठीक उसी तरह प्रसन्न एवं कृपालु रहते हैं। जिस तरह भगवान भोलेनाथ अपने शरण में आने वाले प्राणियों पर मुक्त कंठ से कृपा करते हैं। बेतालेश्वर घाटी के क्षेत्रपाल होने के नाते इस क्षेत्र में उनके अपने नियम एवं कायदे-कानून हैं जिनका विनम्रतापूर्वक पालन करना सभी के लिए अनिवार्य होता है।

 

नकुआ देवता द्वारा स्थापित मर्यादा एवं दिव्य परम्पराओं का जानबूझकर उल्लंघन करने वालों को वह दण्डित करने में जरा भी देर नहीं करते हैं। अर्थात गलती का दण्ड वह तत्क्षण दे देते हैं। भूल कबूल करने तथा अपनी गलती पर क्षमा याचना करने वालों को अतिशीघ्र क्षमा प्रदान भी कर देते हैं। इस तरह की एक नहीं अनेक घटनाएं आए दिन यहां देखने-सुनने में आती रहती हैं।

 

बेतालेश्वर घाटी के निवासियों की नकुआ देवता के प्रति अगाध श्रद्वा है। सभी लोग इन्हें प्रेम वश ‘नकुआ बूबू’ कह कर संबोधित करते हैं। कुमाऊंनी भाषा एवं परम्परा में ‘दादा’ को ‘बूबू’ कहा जाता है। इस तरह यहां प्रत्येक व्यक्ति नकुआ देवता को अपने पूर्वजों की भांति सम्मान व श्रद्वाभाव से देखते हैं तथा पूरी आस्था से उनका पूजन-वन्दन करते हैं।

 

नकुआ बूबू का चमत्कारिक दरबार बेतालेश्वर घाटी में पतित पावनी कौशिश गंगा नदी के पावन तट पर स्थित है। वर्तमान में कौशिकी गंगा ‘‘कौशल्या नदी’’ या फिर कोसी नदी के नाम से जानी जाती है। जिला मुख्यालय नैनीताल से लगभग 55 किमी0 की दूरी पर ‘‘बूबू’’ का यह पावन दरबार सदियों से जन-जन की आस्था एवं विश्वास का केन्द्र रहा है। छोटे से मंदिर के रूप में निर्मित इस चमत्कारिक दरबार में ‘‘बूबू’’ साक्षात विराजमान रहते हैं।

 

नकुआ देवता मूलतः एक महाप्रतापी एवं महाबलशाली ‘‘बेताल’’ है। भगवान शिव की कृपा से इन्हें अद्भुत चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त हैं। जिनका उपयोग वेे व्यापक लोकमंगल हेतु करते हैं। भोलेनाथ के इस महाशक्तिशाली गण के नाम से ही कौशिकी का यह मनोहारी क्षेत्र बेतालेश्वर घाटी के रूप में प्रसिद्व है।

 

माना जाता है, सहस्रों वर्ष पूर्व यही मनोरम घाटी ‘बेताल’ की साधना भूमि एवं कर्मभूमि रही। बेताल ने चूंकि शिव कृपा से तथा शिव प्रेरणा से अनेकानेक मंगलकारी कार्य किये, दुखियांे के दुःख दूर किये तथा भूत, पिशाच, राक्षस आदि उग्र एवं तामसी योनियों वाले शिव गणों के कोप से आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की।

 

इस तरह लगातार लोक कल्याण करने तथा नेेक कार्यों में तत्पर रहने के कारण स्थानीय लोगों ने ‘नेकुआ देवता’ के रूप में इस ‘बेताल’ की पूजा उपासना आरम्भ कर दी। नेक कार्यो के कारण ही यह नाम लोकप्रचलित हुआ और कालान्तर में यही नाम बदलकर ‘नेकुआ’ से ‘नकुआ’ हो गया जो आज भी प्रचलन में है।

 

‘बेताल’ अर्थात नकुआ देवता का इस क्षेत्र में सर्वप्रथम पदार्पण कब और कैसे हुआ, इसको लेकर अनेक पौराणिक वृतान्त मिलते हैं। शिव महापुराण अन्तर्गत ‘रूद्र संहिता’ में भगवान वेदव्यास ने स्पष्ट किया है कि जगत जननी पराम्बा पार्वती से शापित होकर भगवान शिव के महान एवं समर्पित द्वारपाल ‘‘भैरव’’ को ‘‘बेताल’’ बनकर पृथ्वी लोक में आना पड़ा।

 

पृथ्वीलोक में आगमन के साथ ही बेताल ने भारत भूमि को अपना निवास स्थल बनाया। लोक मान्यता है कि बेताल ने सर्वप्रथम मध्य द्रोणांचल क्षेत्र अन्तर्गत प्रवाहित होने वाली पतित पावनी कौशिकी गंगा नदी की इस सुंदर घाटी को अपने निवास के लिए चुना। बाद में लोक कल्याणार्थ अपने अलग-अलग 108 स्वरूपों में शस्य-श्यामला भारत भूमि में स्वयं को यत्र-तत्र विराजित किया।

 

 

प्राचीन काल में ऐसे सभी क्षेत्र जहां ‘बेताल’ ने अपनी चमत्कारिक शक्तियों से स्वयं को विराजित किया था, ‘बेतालघाट’ के नाम से ही जाने जाते थे। भारतभूमि की सभी प्रमुख पवित्र नदियों के घाट, ‘बेताल’ के साधना स्थल बन गए। चूंकि हर जगह ‘बेताल’ ने भिन्न-भिन्न रूपों में लोकमंगल के कार्य सम्पन्न किये।

 

कालान्तर में लोगों ने अपने अनुभवों, बेताल के चमत्कारों, अपनी स्थानीय बोली-भाषा के अनुरूप उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारना तथा उसकी पूजा-उपासना करना आरम्भ कर दिया। इस मान्यतानुसार आज भी देशभर में जितने भी प्राचीन स्थलों के नाम के साथ ‘घाट’ शब्द जुड़ा है, वहां भगवान शिव का महान गण ‘बेताल’ भिन्न-भिन्न नामों से विराजमान है तथा जन-जन से पूजित है। चूंकि बेतालेश्वर घाटी में ‘बेताल’ ने सर्वप्रथम पदापर्ण किया तथा अपने मूल स्वरूप में ही साक्षात् विराजमान हैं। जिन्हें अब ‘नकुआ बूबू’ कहा जाता है।

 

 

मां भगवती पराम्बा पार्वती ने भैरव को क्यों श्राप दिया, इसको लेकर एक पौराणिक प्रसंग आता है। जिसके अनुसार एक बार नारद जी ने अपने भूमण्डल भ्रमण के दौरान देखा कि सम्पूर्ण पृथ्वीवासी भूत, पिशाच, शैतान, दैत्यादि अनेक मरघटी ताकतों की बेलगाम हरकतों से दुखी हो चले हैं। नारद जी ने तत्काल शिव लोक पहुंचकर भगवान शिव को यह समाचार बताने का निश्चय किया। वहां पहुंचने पर मां पार्वती के उन्हें दर्शन हुए। माता ने बताया कि भोलेनाथ अभी अखण्ड ध्यान समाधि में डूबे हैं।

 

अतः नारद तुम्हें क्या कहना है मुझे बतायें। नारद जी ने भूमण्डल का आंखों देखा हाल माता को सुनाया तो माता पार्वती का हृदय भी करूणा से भर आया। माता ने नारद जी को यह आश्वासन देकर वापस भेज दिया कि भोले नाथ ज्योंहि अखण्ड समाधि से वापस आएंगे, उनसे इस समस्या के समाधान के लिए वह स्वयं प्रार्थना करेंगी।

 

 

समय बीतने पर जब भोले नाथ अखण्ड समाधि से वापस लौटे तो मां पार्वती ने उन्हें सारा वृतान्त सुनाया और अति शीघ्र कोई उपाय करने की प्रार्थना की। इस पर भोलेनाथ ने कुछ ही दिन बाद एक विचित्र लीला रची। उन्होंने पार्वती से एकान्तवास करने की योजना बनाई। अपने सबसे प्रियगण एवं द्वारपाल भैरव को बुलाकर भगवान शिव ने कहा – भैरव! हम और पार्वती एक गुफा में कुछ दिन एकान्तवास पर रहेंगे।

 

इस दौरान कोई भी उनसे मिलने न पाए। स्वयं ब्रह्मा तथा नारायण को भी गुफा में प्रवेश की अनुमति न मिले। भैरव ने अपने कर्तव्य का पूरा-पूरा पालन किया। एकान्तवास की अवधि बीतने पर जब माता पार्वती गुफा से बाहर निकली तो उनके रूप लावण्य देखकर भैरव के मन में विकार पैदा हो गया और उसने मां का हाथ पकड़ लिया। विकार ग्रस्त भैरव की मूर्खता पर माता पार्वती को क्रोध आ गया और उन्होंने भैरव को तत्क्षण बेताल बनने तथा नरयोनि में पृथ्वी लोक में जाने का श्राप दे डाला।

 

 

माता के श्राप के कारण भैरव को पृथ्वी पर आकर बेताल बनना पड़ा। उनके मन में प्रायश्चित का प्रबल भाव पैदा हुआ। वर्षों तक वे बेताल के रूप में विचलित होकर जहां-तहां भटकते रहे। अन्ततः शिव प्रेरणा से बेताल ने शिव भक्ति शुरू कर दी। कठोर भक्ति के पश्चात भगवान शिव ने बेताल को दर्शन दिये और कहा कि पृथ्वी में जहां भी शिव पूजा होगी। वहां तुम भैरव के रूप में ही पूजे जाओगे। तुम्हारी पूजा के बिना मेरी पूजा सम्पन्न नहीं मानी जायेगी।

 

 

इसके अलावा तुम इस भूमि में जगह-जगह भिन्न-भिन्न स्वरूपों में क्षेत्रपाल बनकर मेरे सभी गणों पर पूर्ण नियंत्रण रखोगे ताकि पृथ्वीवासी इन गणों की अवांछित गतिविधियों से परेशान न हों। बेताल ने भगवान शिव की इच्छा का सम्मान करते हुए अपने कर्तव्य को ठीक से निभाने का वचन दिया। इसी के साथ बेताल ने अपने आराध्य भगवान शिव की यहां बेतालघाट में कौशिकी के समीप बेतालेश्वर स्वरूप की स्थापना की। तबसे आज तक बेताल यानी नकुआ बूबू भगवान बेतालेश्वर के ध्यान में निमग्न रहकर भी हर पल अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।

 

 

‘नकुआ बूबू’ के बारे में हजारों-हजार लोगों के जहां बड़े-बड़े चमत्कारी अनुभव हैं। वही प्रत्यक्ष चमत्कारी घटनाओं की भी एक फेहरिस्त है। ऐसी घटनाएं जिन पर विज्ञान के इस युग में शायद ही कोई यकीन करें, परन्तु जो लोग चमत्कारों का प्रत्यक्ष दर्शन एवं अनुभव करते हैं, उन्हें फिर किसी भी तर्क-कुतर्क की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। उनके सभी संशय मिट जाते हैं।

 

 

हाल के वर्षों में दर्जन भर से अधिक ऐसी चमत्कारी घटनाएं घटी हैं, जिन पर जन सामान्य कतई विश्वास नहीं कर सकता। परन्तु प्रत्येक घटना सौ फीसदी सत्य है। अस्सी के दशक में नकुआ देवता की लड़की के विवाह का निमंत्रण तिथि व समय के साथ क्षेत्र के अनके डंगरियों तथा कुछ सामान्य लोगों को प्राप्त हुआ। कार्यक्रमानुसार खैरना-अल्मोड़ा राजमार्ग पर काकड़ीघाट के बेताल के लड़के की बारात बेतालघाट नकुआ दरबार पहुंची। दर्जनों लोग एवं साधु संत इस विवाह समारोह के प्रत्यक्षदर्शी रहे।

 

विवाह विधिवत सम्पन्न हुआ। इस घटना को तब दिल्ली, लखनऊ के समाचार पत्रों-पत्रिकाओं ने एक माह तक लगातार अपने मुख पृष्ठ में स्थान दिया। आए दिन कुछ न कुछ नयी बात समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलती थी। इसके अलावा 90 के दशक में यहां नव निर्मित लोहे का विशाल मोटर पुल का एक सिरा अचानक एक मीटर खिसक गया। इस पर तमाम तर्क दिये गए। अन्ततः विभागीय अधिकारियों तथा संबंधित ठेकेदार को अपनी भूल स्वीकारनी पड़ी और विधिवत नकुआ दरबार में पूजा अर्चना की। ऐसी अनेक घटनाएं हैं जो यहां पहुंचने पर ही अनुभव की जा सकती है।

 

 

नकुआ देवता का यह चमत्कारिक दरबार प्रचार-प्रसार के अभाव में तथा सरकारों की अनदेखी के चलते भले ही अपेक्षित प्रसिद्वि नहीं पा सकता है। परन्तु धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से यदि इस ओर जरा भी ध्यान दिया जाए तो यह देश में एक दुर्लभ दरबार के रूप श्रद्वा व विश्वास का एक महान केन्द्र बन सकता है।

 

Surendra Halsi

की फेसबुक वाल से साभार

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