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राजधानी में घूम रहे साहब के जासूस!  कार्यवाही करने का दम नहीं !

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देहरादून । राजधानी में पूर्व पुलिस कप्तान की जैसे ही जनपद में तैनाती हुई थी तो पुलिस मुख्यालय के एक साहब ने उन्हें हटवाने के लिए चंद बडे अफसरों के साथ मिलकर साजिशों का खेल खेलना शुरू कर दिया था इतना ही नहीं राजधानी के चंद दरोगाओं को तो साहब ने पुलिस के कुछ अफसरों की जासूसी में लगा रखा था और इसकी भनक जनपद के चंद पुलिस के अफसरों को भी पता चल चुकी है

 

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिरकार मुख्यालय में बैठे साहब किस मिशन के तहत पुलिस की कुछ अफसरों की जासूसी कराने के लिए अपने चंद वफादार दरोगाओं को उनकी जासूसी कराने के लिए आगे आ रखे हैं?

 
गौरतलब है कि कई वर्षों से देखने में आ रहा है कि पुलिस मुख्यालय में तैनात चंद अफसर राजधानी के कुछ पुलिस अफसरों पर निगाह रखने के लिए आगे आते रहे हैं और वह इस बात की भी जासूसी कराने से पीछे नहीं हटते कि कौन अफसर जनपद में क्या कर रहा है और कौन थानेदार व कोतवाल किस पुलिस अफसर का करीबी है।

 

चंद बार देखने में मिल चुका है कि जिन छोटे अफसरों की साहब जासूसी कराते हैं उनके करीब रहने वाले कुछ दरोगाओं का इसका खामियाजा भी भुगतना पडा है। चर्चाएं हैं कि जब राजधानी की पूर्व पुलिस कप्तान स्वीटी अग्रवाल के हाथ में जनपद की कमान थी तो मुख्यालय में बैठे एक साहब उन्हें हमेशा अपने निशाने पर लेते रहे और जब भी उन्हें मौका मिला उन्होंने उन्हें हटवाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया।

 

इस जोर का ही परिणाम है कि जनपद में विधानसभा चुनाव से लेकर बडे-बडे वीआईपी कार्यक्रम सम्पन्न कराने वाली पूर्व पुलिस कप्तान स्वीटी अग्रवाल को जनपद से हटवा दिया गया। चर्चाएं हैं कि पुलिस मुख्यालय में बैठे इन साहब ने जनपद के चंद दरोगाओं की एक टीम को अपने साथ मिला रखा है और इस टीम के सदस्य अक्सर पुलिस मुख्यालय में इन साहब के कार्यालय में जाते हुए दिखाई दे जाते हैं।

 

चर्चाएं तो यहां तक है कि साहब के लिए जनपद के चंद अफसरों की जासूसी करने वाले कुछ दरोगाओं को महत्वपूर्ण स्थानों पर ही तैनात रखे जाने का पर्दे के पीछे से खेल खेला जाता रहा है? पुलिस महकमें में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि मुख्यालय में बैठे साहब को इस बात में बडी रूची रहती है कि कौन अफसर क्या कर रहा है?

 

सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिरकार जनपद के कुछ अफसरों पर नजर रखने के लिए यह साहब किस मिशन के तहत बडा खेल खेलने में जुटे हुए हैं? बहस तो इस बात की भी हो रही है कि साहब अपने चंद दरोगाओं को किसी भी मुसीबत के समय में उनके साथ खडे हुए दिखाई देते हैं

 

और यही कारण है कि चाहकर भी पुलिस के कुछ अफसरों की जासूसी करने वालों पर कोई भी अफसर कार्यवाही करने का दम नहीं दिखा पाता? सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिरकार जनपद के पुलिस अफसरों को खुली छूट देने के बजाए उनकी जासूसी कराने के लिए क्यों पर्दे के पीछे रहकर खेल खेलते आ रहे हैं?

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