प्रधानमंत्री मोदी के लिए उत्तराखंडी बनाएंगे चीड़ के रेशे से जैकेट !

नमोवस्त्र: मोदी के लिए जैकेट बनेगी उत्तराखंड के चीड़ के पेड़ के रेशे से !

उत्तराखंड के चीड़ के पेड़ के रेशे से बनी जैकेट पूरी दुनिया में धाक जमाने को हो रही है तैयार !

देहरादूनः प्रधानमंत्री मोदी के लिए उत्तराखंडी बनाएंगे चीड़ के रेशे से जैकेट ! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तराखंड फिर चचाओं में आने वाले है।प्रधानमंत्री के लिए उत्तराखंड में सबसे ज्यादा उत्पन्न होने वाले चीड़ के पेड़ से पीएम के लिए एक विशेष जैकेट तैयार होने वाली है। तो लाजमी है कि इसकी चर्चा पूरे विश्व में होगी और यह जल्द होने वाला है। पीएम और उत्तराखंड फिर से चर्चा में आने वाले हैं।
उल्लेखनीय है कि देवभूमि और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखंड से गहरा नाता रहा है। समय-समय पर उत्तराखंड चर्चाओं और दुनियां में सुर्खियों में रहता है। ऐसा पुनः होने वाला है। जैसा कि आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेशभूषा हमेशा चर्चा में रहती है, फिर चाहे वह उनकी जैकेट हो या कुर्ता. अब एक बार फिर पीएम मोदी की जैकेट चर्चा का विषय बनी है. पीएम मोदी के लिए चीड़ के पेड़ के रेशे से जैकेट बनाई जाएगी. इस जैकेट को केंद्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा खुद पीएम को तोहफे में देंगे.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस जैकेट का नाम ‘नमोवस्त्र’ दिया गया है. अजय टम्टा के मुताबिक, हमने साल भर पहले ही चीड़ की लकड़ी के रेशे को निकालना शुरू किया है. जिससे अब कपड़े बनाए जाएंगे. इन रेशों को फैब्रिक के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, अभी इसे अंतिम रूप दिया जा रहा है.केंद्रीय राज्य मंत्री ने बताया कि अब उसी कपड़े से ‘नमोनम:’ नाम की जैकेट तैयार की जा रही है. इस मामले पर उत्तराखंड सरकार में मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि यह साबित हो गया है कि उसका इस्तेमाल कपड़ा बनाने के लिए भी किया जा सकता है.
महाराज के अनुसार उत्तराखंड के पहाड़ों के लिए वह एक बड़े कपड़ा उद्योग को विकसित कर सकता है, जो भविष्य में पलायन को रोकने में भी वरदान साबित हो सकता है.आपको बता दें कि उत्तराखंड राज्य का अधिकतर हिस्सा जंगल का है. राज्य में करीब 16 फीसदी हिस्से में चीड़ के ही जंगल पाए जाते हैं. उत्तराखंड में चीड़ का पेड़ यहां एक त्योहार से भी जुड़ा है. गढ़वाल में इससे जुड़ा पंडवा त्योहार मनाया जाता है.
गौरतलब है कि पीएम मोदी की जैकेट काफी ट्रेंडिंग रहती हैं. दुनिया के कई नेता मोदी जैकेट में नज़र आ चुके हैं. जापानी पीएम शिंजो आबे ने भी अपने भारत दौरे के दौरान मोदी जैकेट पहनी थी.आज के दौर में मोदी के पहनावे हो या फिर उनका भाषण पूरे विश्व में हमेशा चर्चाओं में रहता है। आज के दौर में अखबार हो या फिर टीवी चैनल या फिर वेवसाइटे हर जगह मोदी की चर्चा आम हो गयी है। ऐसा ही पुनः होने वाला है।

एशिया में भारत, बर्मा, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और फिलीपींस

चीड़ (अंग्रेजी:Pine), एक सपुष्पक किन्तु अनावृतबीजी पौधा है। यह पौधा सीधा पृथ्वी पर खड़ा रहता है। इसमें शाखाएँ तथा प्रशाखाएँ निकलकर शंक्वाकार शरीर की रचना करती हैं। इसकी ११५ प्रजातियाँ हैं। ये ३ से ८० मीटर तक लम्बे हो सकते हैं। चीड़ के वृक्ष पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में पाए जाते हैं। इनकी 90 जातियाँ उत्तर में वृक्ष रेखा से लेकर दक्षिण में शीतोष्ण कटिबंध तथा उष्ण कटिबंध के ठंडे पहाड़ों पर फैली हुई हैं। इनके विस्तार के मुख्य स्थान उत्तरी यूरोप, उत्तरी अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका के शीतोष्ण भाग तथा एशिया में भारत, बर्मा, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और फिलीपींस द्वीपसमूह हैं।

मोटी और खुरदरी
कम उम्र के छोटे पौधों में निचली शाखाओं के अधिक दूर तक फैलने तथा ऊपरी शाखाओं के कम दूर तक फैलने के करण इनका सामान्य आकार पिरामिड जैसा हो जाता है। पुराने होने के कारण इनका सामान्य आकार पिरामिड जैसा हो जाता है। पुराने होने पर वृक्षों का आकार धीरे धीरे गोलाकार हो जाता है। जगलों में उगनेवाले वृक्षों की निचली शाखाएँ शीघ्र गिर जाती हैं और इनका तना काफी सीधा, ऊँचा, स्तंभ जैसा हो जाता है। इनकी कुछ जातियों में एक से अध्कि मुख्य तने पाए जाते हैं। छाल साधारणतय मोटी और खुरदरी होती है, परंतु कुछ जातियों में पतली भी होती है।

नए पौधों में पत्तियाँ एक या दो सप्ताह में ही पीली होकर गिर जाती

इनमें दो प्रकार की टहनियाँ पाई जाती हैं, एक लंबी, जिनपर शल्कपत्र लगे होते हें, तथा दूसरी छोटी टहनियाँ, जिनपर सुई के आकार की लंबी, नुकीली पत्तियाँ गुच्छों में लगी होती हैं। नए पौधों में पत्तियाँ एक या दो सप्ताह में ही पीली होकर गिर जाती हैं। वृक्षों के बड़े हो जाने पर पत्तियाँ वर्षों नहीं गिरतीं। सदा हरी रहनेवाली पत्तियों की अनुप्रस्थ काट (transverse section) तिकोनी, अर्धवृत्ताकार तथा कभी कभी वृत्ताकार भी होती है। पत्तियाँ दो, तीन, पाँच या आठ के गुच्छों में या अकेली ही टहनियों से निकलती हैं। इनकी लंबाई दो से लेकर 14 इंच तक होती है और इनके दोनों तरु रंध्र (stomata) कई पंक्तियों में पाए जाते हैं। पत्ती के अंदर एक या दो वाहिनी बंडल (vascular bundle) और दो या अधिक रेजिन नलिकाएँ होती हैं।

वसंत ऋतु में एक ही पेड़ पर नर और मादा कोन या शंकु निकलते

वसंत ऋतु में एक ही पेड़ पर नर और मादा कोन या शंकु निकलते हैं। नर शंकु कत्थई अथवा पीलें रंग का साधारणतय एक इंच से कुछ छोटा होता है। प्रत्येक नर शंकु में बहुत से द्विकोषीय लघु बीजाणुधानियाँ (Microsporangia) होती हैं। ये लघुबीजाणुधानियाँ छोटे छोटे सहस्त्रों परागकणों से भरी होती हैं। परागकणों के दोनों सिरों का भाग फूला होने से ये हवा में आसानी से उड़कर दूर दूर तक पहुँच जाते हैं। मादा शंकु चार इंच से लेकर 20 इंच तक लंबी होती है। इसमें बहुत से बीजांडी शल्क (ovuliferous scales) चारों तरफ से निकले होते हैं। प्रत्येक शल्क पर दो बीजांड (ovules) लगे होते हैं। अधिकतर जातियों में बीज पक जाने पर शंकु की शल्कें खुलकर अलग हो जाती हैं और बीज हव में उड़कर फैल जाते हैं। कुछ जातियों में शकुं नहीं भी खुलते और भूमि पर गिर जाते हैं। बीज का ऊपरी भाग कई जातियों में कागज की तरह पतला और चौड़ा हो जाता है, जो बीज को हवा द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने में सहायता करता है। बीज के चारों ओर मजबूत छिलका होता है। इसके अंदर तीन से लेकर 18 तक बीजपत्र पाए जाते हैं।

जड़ की हानि नहीं सहन

चीड़ के पौधे को उगाने के लिये काफी अच्छी भूमि तैयार करनी पड़ती है। छोटी छोटी क्यारियों में मार्च-अप्रैल के महीनों में बीज मिट्टी में एक या दो इंच नीचे बो दिया जाता है। चूहों, चिड़ियों और अन्य जंतुओं से इनकी रक्षा की विशेष आवश्यकता पड़ती है। अंकुर निकल आने पर इन्हें कड़ी धूप से बचाना चाहिए। एक या दो वर्ष पश्चात् इन्हें खोदकर उचित स्थान पर लगा देते हैं। खोदते समय सावधानी रखनी चाहिए, जिसमें जड़ों को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे, अन्यथा चीड़, जो स्वभावत: जड़ की हानि नहीं सहन कर सकता, मर जायगा।

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