लड़कियों को कमतर समझने वालों पर खून खौलता है: पूजा चोपड़ा

वह मां की कोख में ही थीं, जब उनके अपने पिता ने फरमान सुना दिया था कि उन्हें बेटी नहीं चाहिए। नतीजतन, जब उन्होंने इस दुनिया में आंखें खोली तो कोई अस्पताल में देखने तक नहीं आया। यही नहीं, वह महज बीस दिन की थीं जब उनके पिता ने उन्हें दुनिया में लाने के जुर्म में उनकी मां को घर से निकल जाने की सजा सुना दी।

 

तब उनकी मां अपनी 7 साल की बड़ी बेटी की उंगली थामे और 20 दिन की छोटी बेटी को सीने से लगाए घर से निकल आईं लेकिन आज वही दुधमुंही बच्ची पूर्व मिस इंडिया वर्ल्ड और बॉलिवुड अभिनेत्री पूजा चोपड़ा के नाम से मशहूर है। जल्द ही फिल्म अय्यारी में खास भूमिका में नजर आने वालीं पूजा ने हमसे दिल खोलकर की यह बेबाक बातचीत

आप काफी दिनों बाद बड़े पर्दे पर नजर आने वाली हैं, वह भी अय्यारी जैसी पुरुष प्रधान फिल्म मेंज्! मनोज बाजपेई और सिद्धार्थ मल्होत्रा के बीच इस फिल्म में आपकी क्या भूमिका है?
इस फिल्म में मेरी बहुत ही अहम भूमिका है। मैं इसमें कैप्टन माया सेमवाल का किरदार निभा रही हूं जो कर्नल अभय सिंह यानी मनोज बाजपेई और मेजर जय बख्शी यानी सिद्धार्थ मल्होत्रा के किरदार के बीच कड़ी का काम करती है। दरअसल, फिल्म में सिद्धार्थ किसी वजह से मनोज सर से अलग हो जाते हैं और माया वह इकलौती शख्स है जिसने जहां मनोज सर से ट्रेनिंग ली है, वहीं सिद्धार्थ के साथ ट्रेनिंग की है तो वह दोनों को जानती-समझती है। फिल्म में मेरा टिपिकल हीरोइन वाला रोल नहीं है। इसमें मैं एक बटालियन की मुखिया हूं, तो मर्दो की दुनिया में उन्हीं की तरह रहती हूं। उतनी ही सख्त हूं। बेफिजूल की बातें बर्दाश्त नहीं करती हूं, तो बेशक मैं काफी दिनों बाद स्क्रीन पर लौट रही हूं लेकिन दमदार रोल के साथ लौट रही हूं।

 

जैसे आपने कहा कि फिल्म में आप मर्दों की दुनिया में आप मर्द की तरह ही नजर आएंगी। आपको लगता है कि मर्दों की दुनिया में औरत बनकर सर्वाइव करना मुश्किल है?
मेरे कहने का मतलब वह नहीं था। मेरा मतलब यह था कि आर्मी पर्सन होने के नाते आपको मजबूत और सख्त होना पड़ेगा। आप वहां नजाकत नहीं दिखा सकतीं कि अरे, मैं यह नहीं कर सकती या मुझे चोट लग जाएगी, मैं तो औरत हूं। आपको उतना ही पावरफुल होना पड़ेगा और मेरे हिसाब से असल जिंदगी में भी औरतें यह साबित कर रही हैं। अब तो आर्म्ड फोर्सेस में कॉम्बैट पोजिशंस पर भी औरतें शामिल हो चुकी हैं। मुझे लगता है कि बदलाव आ चुका है और औरतें हर जगह अपना दम दिखा रही हैं।

 

फिल्म में आप पुरुष जवानों की मुखिया बनी हैं। अपने यहां महिला अधिकारियों को लेकर भी एक स्टीरियोटिपिकल धारणा होती है, उन्हें अक्षम साबित करने की कोशिश की जाती है। आपकी इस पर क्या राय है?
यार, पता नहीं कितने लोगों को यह बात पता है लेकिन मैं वह लडक़ी हूं जिसके पिता ने जन्म से पहले ही उसे मार देना चाहा था क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए था। मैं केवल 20 दिन की थी, जब मेरी मां मुझे और मेरी बड़ी बहन को लेकर मेरे पिता के घर कोलकाता से नानी के घर मुंबई आ गई थीं क्योंकि उन्होंने मां के सामने यह शर्त रखी थी कि या वह मुझे छोड़ें या घर छोड़ दें। इसीलिए, मेरा तो खून खौलता है जब कोई लड़कियों को किसी भी मायने में कमतर साबित करने की कोशिश करता है। मेरी राय आप समझ ही सकती हैं। मेरे हिसाब से औरतों हर रोल में सर्वश्रेष्ठ करती हैं। मैंने अपनी मां को एक फाइटर की तरह अकेली हम दोनों बहनों को बड़ा करते देखा है। काम और घर संभालते देखा है और उन्हीं से फाइट करना सीखा भी है। अगर मैं मिस इंडिया वर्ल्ड 2009, मिस वर्ल्ड 2009 सेमीफाइनलिस्ट या जो भी कुछ बन पाई हूं उन्हीं की बदौलत बन पाई हूं।

 

वैसे, फिल्म इंडस्ट्री में भी यह भेदभाव काफी है। वह चाहे हीरो और हीरोइन के रोल में अंतर की बात हो या मेहनताने कीज्!
अभी जो आपने कहा कि मैं काफी दिनों बाद फिल्म कर रही हूं, वह इसी वजह से तो है। मैं वैसे बेमाने से, दो सीन-चार गाने वाले रोल नहीं कर सकती। मुझे समझ ही नहीं आता कि उसमें मैं क्या करूं। हालांकि एक अच्छे रोल के लिए 4 साल तक इंतजार करना बिल्कुल आसान नहीं है, लेकिन मेरी फाइट यहां भी जारी है। मैंने जब फिल्म कमांडो: अ वन मैन आर्मी की थी तब भी मेरा रोल ऐसा सिंपल सी हीरोइन वाला नहीं था, परफॉर्मेंस वाला था। अब अय्यारी में भी मेरा रोल बहुत मजबूत है। मुझे खुशी है कि इंडस्ट्री में भी अब लड़कियों के लिए अच्छे रोल लिखे जा रहे हैं। प्रियंका, विद्या, कंगना, दीपिका दमदार भूमिकाएं कर रही हैं।

 

इस फिल्म के बाद कुछ पाइपलाइन में है?
जब तक कुछ फाइनल न हो जाए, उस पर बात करना मैं ठीक नहीं समझती। बाकी, आप बस दुआ कीजिए कि अब मुझे अच्छे रोल के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।

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