वन चाइना नीति पर अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मारी पलटी

वाशिंगटन । क्या चीन के विस्तारवादी नीति के समर्थन में अमेरिका आ गया है। क्या कोई ऐसी वजह है जिससे अमेरिका अब चीन से डर रहा है। दरअसल ये सवाल जेहन में इसलिए आ रहा है क्योंकि अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से चीन की विस्तारवादी नीति का विरोध करते रहे हैं। ह्वाइट हाउस के एक प्रवक्ता के मुताबिक ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बात की और कहा कि वो वन चाइना पॉलिसी पर चीन की भावना का सम्मान करते हैं।
अमेरिका ने पहले क्या कहा था ?
दक्षिण चीन सागर और वन चाइना पॉलिसी के मुद्दे पर चीन और अमेरिकी प्रशासन आमने-सामने हैं। अमेरिका ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि दक्षिण चीन सागर और चीन की विस्तारवादी नीति का वो विरोध करता रहेगा। लेकिन अमेरिका की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चीन ने कहा कि यूएस में जो अधिकारी बैठे हुए हैं, उन्हें एक बार फिर इतिहास पढऩे की जरूरत है। चीन के विदेश मंत्री वैंग यी ने कहा कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ये साफ कहा गया था कि चीन के वो इलाके जो जापान के कब्जे में हैं उन्हें चीन को दोबारा वापस दे दिया जाएगा।
दक्षिण चीन सागर पर अमेरिका-चीन आमने-सामने
अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट रेक्स टिलरसन ने कहा कि दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा बनाए गए विवादित द्वीपों पर जाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। ह्वाइट हाउस सामरिक तौर से महत्वपूर्ण द्वीपों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि यूएस के डिफेंस सेक्रेटरी जिम मैटी ने पिछले हफ्ते कहा कि दक्षिण चीन सागर के विवादित मुद्दों को कूटनीतिक तौर पर सुलझाने की जरूरत है।
अमेरिकी पहले पढ़ें इतिहास
चीन के विदेश मंत्री वैंग यी ने कहा कि वो अपने अमेरिकी दोस्तों को एक सलाह देते हैं। अमेरिकी दोस्तों को पहले 1943 के कायरो घोषणापत्र और 1945 में पॉटसडैम समझौते को पढऩा चाहिए। उन समझौतों में साफ तौर पर ये लिखा गया है कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान के कब्जे में जो द्वीप चले गए थे, उन्हें जापान वापस कर देगा। विवाद की जड़ में स्पार्टी आइलैंड है जिसे चीन नैंशा द्वीप के नाम से पुुकारता है।
विवाद का समाधान है कूटनीति
दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर अमेरिकी रक्षा मंत्री के बयान पर वैंग यी ने कहा कि चीन का स्पष्ट मत है कि विवादित मुद्दों को कूटनीतिक ढंग से सुलझाना चाहिए। उन्होंने कहा वैश्विक शांति हो या क्षेत्रीय स्तर पर शांति हो चीन कभी भी टकराव का रास्ता नहीं चुनता है। लेकिन चीन अपने संप्रभु अधिकारों का उचित तरीके से इस्तेमाल करता रहेगा।