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भारतीय हस्तशिल्प को चीन के रूप में मिला नया मार्केट

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नई दिल्ली। ऐसे वक्त में जब चीन के सामानों से पूरा भारतीय बाजार अंटा पड़ा है, भारत बड़े पैमाने पर अपने हैंडीक्राफ्ट (हस्तशिल्प) को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। श्रम की लागत काफी ज्यादा रहने से यहां स्थानीय उत्पादकों के लिए मांग पूरी करने में मुश्किल हो रही है।

 

हस्तशिल्प निर्यात वित्त वर्ष 2015 के 308 करोड़ रुपये के दोगुने से भी ज्यादा बढक़र इस साल 650 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। दरअसल, चीन से मेटल आधारित क्राफ्ट और ब्लॉक प्रिंटेड आइटम्स की मांग ज्यादा है। एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल फॉर हैंडीक्राफ्ट्स के एग्जिक्युटिव डायरेक्टर राकेश कुमार ने बताया, चीन हमारे हैंडीक्राफ्ट में काफी दिलचस्पी ले रहा है क्योंकि वहां इस कला पर ज्यादा जोर नहीं दिख रहा है और इसके साथ ही उसे ऊंची लेबर कॉस्ट का भी सामना करना पड़ रहा है।

 
पहले चीन के लोग घर और फर्नीशिंग से जुड़े प्रॉडक्ट्स खरीदते थे, लेकिन अब वे हाई एंड एंब्रॉयडरी और डाई वर्क से जुड़े प्रॉडक्ट्स भी खरीद रहे हैं। चीन के साथ भारत के बढ़ते ट्रेड डेफिसिट के बीच यह स्थिति उम्मीद की किरण उभरकर सामने आई है। वित्त वर्ष 205-16 में भारत का चीन को एक्सपोर्ट 9 अरब डॉलर रहा, जबकि इंपोर्ट 61.7 अरब डॉलर रहा। यानी 52.7 अरब डॉलर का ट्रेड डेफिसिट रहा।

 
कुमार ने बताया कि हाल के आईएचजीएफ में 90 चाइनीज खरीदारों ने 200 करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए थे। आईएचजीएफ हैंडीक्राफ्ट और गिफ्ट के मामले में एशिया का सबसे बड़ा मेला है। पिछले मेले में चाइनीज खरीदारों की संख्या इस बार के मुकाबले तकरीबन आधी थी। अमेरिका और यूरोपीय संघ जहां इंडियन हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट के अहम ठिकाने हैं, वहीं चीन इसके नए मार्केट के तौर पर उभरकर सामने आया है।

 

इंडियन हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट में अमेरिका और यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी तकरीबन 65 फीसदी है। इजराइल, कोलंबिया, उरुग्वे और चिली ने भी भारत में हाथ से बने आइटम्स को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है।भारत के लिए नया मार्केट तलाशना जरूरी हो गया है, क्योंकि उसे स्थापित बाजारों में पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों से कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। भारत को वूडन हैंडीक्र

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