udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news ना बसा घुघूती चैत की .. घुघूती आज भी घुर्र घुर्र कर घुर्रा रही है !

ना बसा घुघूती चैत की … घुघूती आज भी घुर्र घुर्र कर घुर्रा रही है !

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क्रांति भटृ
चैत्र का महीना कुछ दिनों बाद चला जायेगा । बहुत ” खुद ” लगेगी चैत्र की , चैत की ।” नरही ” लगेगी । ( गढ़वाल में खुद और कुमाऊं में नरही शब्द का प्रयोग होता है । हिन्दी में ” याद ” आना ” कह सकते हैं । पर याद शब्द में वह हृदयस्पर्शी संवेग नहीं , जो ” खुद ” लगने या ” नरही ” में है ।

” चैत्र का भारत के उत्तरी भारत के गांवों और विशेष कर उत्तराखंड के पहाड़ी गावों के जीवन और यहाँ की प्रकृति से बडा हृदयम रिश्ता था कभी । पर लगता है अब कहीं खो सा रहा है । इसी लिए मन की अभिब्यक्ति की शुरुआत में लिखा कि ” चैत्र का महीना कुछ दिन बाद चला जायेगा । पर बहुत ” खुद ” लगेगी । ” नरही ” लगेगी । ” याद ” आयेगी ।

हम सब ” शायद बहुत सभ्य हो गये हैं , सम्पन्न हो गये हैं वही वजह है कि हम हृदय की संवेदनाओं से जुडे उन सभी क्षणों . रिश्तों , आत्मीयता के रिश्तों से बुने सम्बन्धों को भूल से रहे हैं ।घर , गांव से ब्याही गयी बिटिया जब अपनी ससुराल में होती , दरख्तों पर फूटती कोंपलें , वातावरण में मीठी हवाओं के बहने , परिन्दों की चहचहाट , दूर खेतों में गेंहूं की बालों में दूध आने , फिजांओं में हवा के साथ साथ बहती अजीब सी खुशबू , जिसमें ” कुछ होता है ‘”? को महसूसती , तो उस बिटिया ” ध्याण को अपना मायका याद आ जाता ।

 

मां ईजा पिता , बबाजी याद आ जाता । भाइयों की याद आ जाती । उसका मन करता था कि ” पंछी बनू और फुर्र से थोडी देर ही सही उडूं और मायके की देहरी चूमूं । मां के गले लगूं । पिता की लाडली बन उनके सीने से लग जांऊ। भैया लोगों को मिलूं । सखियों से हिल मिलूं । उसके ससुराल के घर आंगन में , पेड़ों पर इस चैत ” चैत्र ” के महीने में जब ” घुर्र घुर्र ” करतीं ” घुघूती पक्षी घुर्र घुर्रानें लगती थीं तो ” बिटिया को ” मां की याद आ जाती । मैत की मायके की याद आ जाती ।

 

उसकी आंखों की पोर गीली होने लगतीं । मन में एक अजीब सी हूक आने लगती । ” गा उठती थी ” “” घुघतू घुराण लगी . मेरा मैत की … । उसे लगता था कि जिस घुघूती की आवाज वह सुन रही है शायद वह मेरे मायके की है । और इधर मायके में भी मां पिता को अपनी लाडली की बहुत याद आ जाती । मां पिता यथा सम्भव घर में खाने ब्यंजन तैयार करते । मां अल सुबह बाबूजी , पिता को बिटिया के ससुराल भेजती और ढेर सारा कलेऊ , विशेष कर चावलों का हलुवा , आरसे , रोटना की बुजाडी बांध कर देती कि हमारी बिटिया को मैत की यह सौगात भी देना और प्यार भी ।

 

भाईयों को भी भेजतीं ।।कोई घर ऐसा नहीं था जहां से बिटिया की ससुराल कै लिए चैत के महीने की सौगात न भेजी जाती । इसे दिशा भेंट भी कहते हैं । कुमाऊं के गांवो में ” भेंटुली ” नाम दिया जाता है । बिटिया अपने ससुराल में चाहे कितनी सम्पन्नता में क्यों न रहे ” उसे चैत के महीने में अपने मायके की सौगात की बहुत प्रतीक्षा रहती। ससुराल में इस महीने जैसे ही उसके मायके से कोई आता तो मन कुलबुला जाता कि ” मां ने क्या भेजा ? और अपने मायके से आयी सौगात को वह हाथों हाथ यूं लेती गोया कि दुनिया का सबसे स्वादिष्ट ब्यजंन आ गया हो ।.बांटती अपने ससुराल में सबको ।

 

इठलाती फुदकती शान से कहती ” मेरे मायके से आया है । और चाहे ससुराल में कृष्ण की तरह सम्पन्न क्यों न हो ” मायके से मां के हाथों से बने ब्यजंन को यूं मुंह में लेतीं जैसा कान्हा ने मित्र सुदामा के घर से आये चावलों को बडी आत्मीयता से खाया भी और परिवार में बांटा भी । बेटी या ध्याण जब चैत के महीने के कलेवू या भेंटुली स्वीकार करतीं तो टप टप आंखों में स्नेह और आत्मीयता के आंसू भी झरते ।

 

पर अब यह प्रथा बिटिया को चैत का कलेवू या भेंटुली देने या बेटी को भी इसकी कसक जाने क्यों भुला दी जा रही है । हांलाकि अभी भी कहीं न कहीं गांवों में बची है । पर बहुत कम ।चैत के महीने जब सब अपनी बिटिया , बहिन” ध्याणों की ससुराल जाते उन्हें सौगात देने । तब जिस घर में बटिया बहिन नहीं होती ऐसे मां पिता भाई कहते थे काश हमारी भी कोई बेटी होती बहिन होती ।हम भी उसे कुछ सौगात देते
चैत में चैती भी गायी जाती थी कभी। चैत की गीत धुकधुकती लगाते थे ” जिकुडी ” मे।

पर वो सब अब कहां
जाने सब क्यों खो सा रहा है । ” हर्च ” रहा है । बिखर सा रहा है ।
सच्च ! चैत की बहुत ” खुद ” लगेगी। ” नरही ” लगेगी । याद आयेगी ।
मेरे गांव में . घर से कुछ दूरी पर आडू के पेड पर ” घुघूती आज भी घुर्र घुर्र कर घुर्रा रही है ।
” मन कह रहा है । गा रहा है ” घुघूती घुराण लगी

की फेसबुक वाल से साभार

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